सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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किन्तु प्राचीन सिद्धान्तों से उक्त मध्यम सूर्य और चन्द्र भगण से कल्प सावन दिन
के अनुसार-
अद्यावध्यर्य्य भटस्य कालात् शक्रशताब्दतः (१४००)
कलाभेदोऽपि नोलब्धस्तत् कथं प्राक् कृति र्मृषा । ३४ ।
आर्यभट्ट से १४०० वर्ष बीत जाने पर भी वर्तमान मध्यम सूर्य और चन्द्र में
कला भेद भी नहीं दीखता है । अतः प्राचीन आचार्यों का शास्त्र भ्रान्त कैसे कहा
जा सकता है ।
स्थिरत्वात् मन्द तुंगस्य भानोर्मध्य गति र्जनैः
भूच्छायादि समालोकात् पञ्चषाब्दैः प्रतीय ताम् । ३५ ।
रवि मन्दोच्च की स्थिरता (बहुत कम गति होने के कारण) तथा रवि मध्यम
गति को भू छाया आदि देखकर ५-६ वर्षों में ही जाना जा सकता है ।
चन्द्र तत्तुं गयो र्नित्यं चलनाद् भगणास्तयोः
न शक्यन्ते नृभिर्ज्ञातुं बिना सिद्धान्त दर्शनात् । ३६ ।
किन्तु चन्द्र का मन्दोच्च तेज चलने के कारण उसके उच्च की गति या मध्यम
चन्द्र गति को बिना सिद्धान्त के नहीं जाना जा सकता है ।
ज्ञायतां तत् विशेषोऽपि बहु प्रमण दर्शिभिः
मध्योच्चाभ्यं शनेर्भेदं शताब्दैज्ञायते कथम् । ३७ ।
बार बार चन्द्र का वेध करने पर ही उसका गति भेद जाना जा सकता है ।
शनि की गति अत्यन्त कम होने के कारण १०० वर्ष के भीतर उसकी मध्य और
मन्दोच्च गति में अन्तर नहीं किया जा सकता है ।
तस्माद्रवीन्दु भगणा वर्ष मास दिनानि च
लंकाद्धं रात्रः सर्वांदिरिति सिद्धान्त वाग् ध्रुवा । ३८ ।
इन कारणों से रवि और चन्द्र का भगणं, वर्ष, मास और दिन आदि की
गणना कल्प से करना असत्य नहीं, उचित है । अतः सिद्धान्त वचन भी सत्य
है ।
चन्द्रोच्च पात भौमादौ विसंवादो यदीक्ष्यते
तत्सर्वं स्थूल दृष्ट्योक्तं युग पर्ययवादतः । ३९ ।
चन्द्र के उच्च और पात की भगण तथा मंगल आदि के भगण में जो अन्तर
दीखता है वह युग आदि के कारण दीखता है । युग भगण आदि स्थूल गणना
के लिये है । सूक्ष्म गणना कल्प भगण से ही हो सकती है ।
मतिमान् भास्कराचार्यः प्रमेदं युगपर्ययैः
ग्रहाणां वीक्ष्यतत् संख्या कल्पे पूर्णामकल्पयत् । ४० ।