सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३४३
बाद में होता है । समय का यह अन्तर चर कहा जाता है) अहोरात्र वृत्त और
याम्योत्तर वृत्त के सम्पात को खार्द्ध कहते हैं । खार्द्ध से क्षितिज धरातल के उदयास्त
सूत्र पर लम्ब को हृति कहते हैं । त्रिज्या वृत्त में हृति को अन्त्यज्या कहते हैं ।
आधार विषुव कक्षा व्यपदत्त क्षिति जनाभ वृत्तानाम्
साम्येऽपि किञ्चिद धिकं क्षितिजं कार्यं चलत्वाय । २७ ।
दोनों आधार वृत्त, विषुव और क्रान्ति वृत्त और क्षितिज वृत्त इन सभी की
परिधि का परिणाम समान होने भी पर क्षितिज वृत्त थोड़ा बड़ा रखा जाता है ।
नहीं तो उसे घुमाया नहीं जा सकता ।
भू सहित ध्रुवयष्टेर्निश्चल भावो भगोल चलता च
भवति यथैवं नाभ्योस्तैलं योज्यं सुख प्रान्त्यै । २८ ।
पृथ्वी के साथ ध्रुव यष्टि को निश्चल रखा जायेगा । भगोल इस प्रकार किया
जायेगा, कि उसे घुमाया जा सकें । वृत्तों के जोड़ो पर थोड़ा तेल देने से उन्हें
सरलता से
३४४ सिद्धान्त दर्पण
कोणाख्य वृत्त युगलं दिङ् मण्डलं नामकं षडेतानि
निश्चल खगोल मध्ये भगोल चलनं भवेदत्र । ३३ ।
दो कोणवृत्त तथा दिङ् मण्डल वृत्त । खगोल में ये ६ वृत्त दृढ़ और अचल
होंगे पर उसके भीतर भगोल घुमाने लायक स्थिर किया जायेगा ।
अथनिज देशे भादिन उदयास्त मयादि वीक्षितुं साक्षात्
स्तम्भ युगोर्द्धाधरयोर्ध्रुव यष्टी रन्ध्रयोः स्थाप्याः । ३४ ।
अब अपने स्थान पर दिन में छाया तथा ग्रहों का उदय और अस्त प्रत्यक्ष
देखने के लिए दो स्थम्भों के ऊपर और नीचे के छेद में ध्रुव और यष्टि को
लगायेंगे ।
गोलद्वये स्वदेशानुसारि सममण्डलं तथा क्षितिजम्
बद्ध्वा खगोल कान्तर्याम्योत्तर मण्डलस्य पुनः । ३५ ।
खगोल और भगोल दोनों में अपने स्थान का पूर्व पश्चिम क्षितिज वृत्त बान्ध
कर खगोल वृत्त के याम्योत्तर
सममण्डलस्य योग स्थान युगे कीलक द्वयं न्यस्य
दृग् गोलाख्यं
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३४५
कोणेषु दिक्षुः परितः प्रोतैः कीलैर्धृतः समिद् वलयः
क्षितिज समोन्नति रंशुक वेष्टित इदमर्द्धलुग् देयः । ४० ।
गोल क्षितिज के आठ दिशाओं में छोटी छोटी कीलं देकर नीचे से कपड़ा
से क्षितिज तक कपड़ा से ढंक देंगे । क्षितिज के ऊपर थोड़ा छोड़कर एक काठ
का क्षितिज कर नीचे से वहां तक ढंकेंगे जिससे गोल का ऊपरी आधा भाग
दीखे ।
किं वार्द्ध मग्न वपुषं गोलं खाते निधाय तद् भ्रमणात्
क्षितिजोपरिगत भार्द्धं भूस्थिति कृत्य बूधैर्दृश्यम् । ४१ ।
अथवा गोल रचना समाप्त होने पर उसको गड्ढे के भीतर इस प्रकार रखेंगे
जिससे क्षितिज का निचला आधा भाग गढे में रहेगा तथा ऊपरी भाग बाहर
रहेगा । इतना करने पर गोल को घुमा कर भूगोल स्थिति की कल्पना कर क्षितिज
के ऊपर के चक्रार्द्ध को देखा जा सकता है । जो कि दृश्य चक्रार्द्ध होगा ।
सिद्धान्त शिरोमणेः-बद्ध्वा भगोल एवं यष्ट्यां खगोल नलिकोक्तम्
प्रक्षिप्य भ्रमयेतं यष्ट्याधार स्थिरौ खदृग् गोलौ । इति । ४२ ।
(सिद्धान्त शिरोमणि के अनुसार) भगोल को ध्रुव यष्टि से बान्धकर यष्टि को
खगोल नली के भीतर घुसाकर भगोल को घुमायेंगे । यष्टि के अग्र भाग में दो
नलिका से खगोल और दृग्गोल को स्थिर और अचल कर स्थापित करना होगा ।
एक कक्ष यन्त्र का वर्णन -
धरणी गोल भगोल क दृग् गोल खगोल सन्निपातेऽपि
यन्त्रमिदमेक कक्षं ज्योतिश्चक्रं यदेकत्र । ४३ ।
भूगोल, भगोल दृग् गोल और आकाश गोलों से मिलकर बना यह द्विकक्ष
गोल एक कक्ष भी किया जा सकता है । ज्योतिश्चक्र
दृश्यं विधुकक्षात्मक भगोल एवाथ वा कुशाग्रधिय
पृथुलतरः क्षुद्रतरो गोलः कार्यः सुकल्पनया । ४४ ।
चन्द्रगोल में दीखने के कारण एक भगोल (चन्द्र के भगोल) में ही यह सब
लगाकर पहले के समान देखा जा सकता है । अति बुद्धिमान व्यक्ति अपनी
कल्पना के द्वारा इन गोलों का आकार बड़ा या छोटा भी बना सकते हैं ।
अथाभिधास्ये बहुकक्षयन्त्रं यत्प्रेक्षणादेव नभश्चराणाम्
सञ्चार बिम्बा शुगमान वक्रा वक्रादि साक्षाद् भवति क्षमायाम् । ४५ ।
अब मैं बहुकक्ष यन्त्र के बारे में कहता हूँ, जिसको देखने से ही ग्रहों का
सञ्चार, बिम्ब, शरमान, वक्रता, अवक्रता आदि पृथिवी पर रहकर ही प्रत्यक्ष भाव
से देखा जा सकता है ।
३४६ सिद्धान्त दर्पण
कृत्वैषसादौ घन चक्र युग्मं हस्तोन्मितं व्यास मुदीच्य वाच्यो
बहिः स्थितस्तम्भयुग प्रगाढ़ प्रोताक्षयुग्मापि तनाभि देशम् । ४६ ।
एक हाथ व्यास का काठका दो घन चक्र करेंगे । दो खूंटा गाड़कर उसके
बाहर दक्षिण और उत्तर में यह दोनों चक्र लगाकर कर रखें । दोनों खूंट उत्तर
दक्षिण दिशा में लगाया जायेगा । खूंट के ऊपर धूरी का कील रखकर उसी कील
को दो चक्रों के केन्द्र में लगा कर रखना होगा ।
धारादृढ़प्रोत निचार वार प्रान्तस्फुरद् वर्तुल नेमि युग्म्
खाङ्गा (९०) ङ् गुलाक्ष प्रधिकान्तरा लं संस्थाप्यहस्तत्रयदूरगंतत् । ४७ ।
दोनों काठ के गोलों में छेद कर शर (लकड़ी की छड़ी) लगायेंगे और शरों
के अगले भाग में एक नेमि (काठ की वृत्ता कर पट्टी जिसमें ३६० अंश चिन्हहों)
लगाकर रखेंगे । नेमि और अक्ष के बीच ९० अंगुल की दूरी होगी । काठ के
गोलों को एक दूसरे से ३ हाथ दूर रखेंगे ।
नेमिद्वयस्यूति दृढ़ा शलाकाश्चक्रद्वयं भ्रान्ति कृते ह्यवक्राः
देयास्त्रि हस्ताभ्यधिकास्तदन्तः क्ष्मा खेटकक्षाः परिकल्पनीयाः । ४८ ।
इन दो गोलों (नेमि सहित) को घुमाने के लिए ३ हाथ से अधिक दृढ़ काठ
का डण्डा इन दो तुम्बियों के भीतर घुसा कर रखेंगे । इन दोनों चक्रों के बीच (३
हाथ की दूरी पर ) पृथ्वी और ग्रह कक्षा आदि रहेंगे ।
याम्या रितश्चाङ्ग गुणा (३६) निवेश्य दीर्घस्य सौम्याभिमुखस्यसूक्ष्मे
अक्षस्यामूर्द्धन्यनुवेश्य पृथ्वीं तन्वीं विधोस्तत्त्वरितश्च कक्षा । ४९ ।
दक्षिण चक्र (गोला) से ३६ अंगुल दूर (बीच की तरफ) उत्तर दिशा में मुख
किया हुआ अक्ष (उत्तर दिशा में कील का डण्डा) लगायेंगे । उस अक्ष में छोटे
आकार की पृथ्वी लगा देंगे । पृथ्वी के चारों तरफ चन्द्र कक्षा होगी ।
षडंगुलाद्धर्द्धांगुल राशि युक्ता क्रान्त्युच्च पातानू गता श्लथा च
याम्यरि संसक्त चतुः शलाका कार्योर्द्ध र्व सूत्र प्रथिताणु चन्द्रा । ५० ।
पृथ्वी के चारो तरफ चन्द्र कक्षा शिथिल होगी, उसका माप ६ अंगुल होगा
तथा आधे आधे अंगुल पर १ राशि चिह्नित होगी । चन्द्र कक्षा में क्रान्ति, मन्दोच्च,
पात और चन्द्र का स्थान चिह्नित कर दक्षिण चक्र से इनके ऊपर ४ मजबूत काठी
लगाकर रखेंगे ।
चक्रांकित द्वादश राशि रेखानुसारतश्चन्द्र मृदूच्चपातौ
स्वकालजौ दक्षिण चक्रमध्ये देया वुदीच्यन्यनभश्चराणाम् । ५१ ।
दक्षिण चक्र में १२ राशि का चिह्न दिया जायेगा । उसी क्रम में इष्ट काल
में चन्द्र मन्दोच्च और पात दक्षिण चक्र में देगें । उत्तर चक्र में अन्य ग्रहों की कक्षा
देंगे ।
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम ३४७
ततो विधेया ग्रह चक्र यष्टि रुदीच्य चक्रोदर भेद योग्या
सूक्ष्माग्र तिष्ठा पृथुमध्य भानुर्मूले पृथुः खेतर चक्र धृतौ । ५२ ।
इसके बाद उत्तरी चक्र में छेद कर उसमें लगाने के लिए ग्रह चक्र यष्टि
(डण्डा) तैयार करना होगा । यह यष्टि पतली होगी । और इसके अग्र भाग में
सूर्य रहेगा । यष्टि मूल की तरफ मोटा होगा जिससे अन्य ग्रहों को भी उसमें
लगाया जा सके ।
तद प्रजा पत्तनु कीलकाग्रे मध्यार्कतश्चाङ्गुल पाददूरे ।
न्यस्यौ रविस्तुङ्ग दिशि स्फुटाक्षः पृथुः पृथिव्या विमलः सुवृत्तः । ५३ ।
इस ग्रह चक्र यष्टि के छोर पर एक पतले कील पर मध्यम सूर्य लगाया
जायेगा तथा उससे १/४० अंगुल (१५ कला) दूरी पर उच्च की तरफ स्फुट रवि
लगाया जायेगा । यह पृथ्वी से बड़ा, चिकना और पूर्ण गोलाकार होगा ।
आधार दारू ग्रहचक्र यष्ट्यां सपादहस्तान्तर तोतरस्थम्
विन्यस्यतत् प्रोत दृढ़ारकाष्ठे स्त्रिहस्त कै द्वादशभिर्विधेयम् । ५४ ।
ग्रह चक्र यष्टि से ३० अंगुल (१ १/४ हाथ ) उत्तर आधार काठ देकर १२ अर
दिया जायेगा । प्रत्येक अर की लम्बाई ३ हाथ होगी ।
आधार चक्रं उदरस्थ रन्ध्र प्रस्यूत तिर्यग् यमदिङ् मुखस्य
अग्रेषु कील प्रचयस्य मध्य सूर्याभिवेष्ट ग्रह चक्र कक्षाः । ५५ ।
आधार चक्र के केन्द्र से निकले दक्षिण दिशा में तिरछी कील के बीच में
सूर्य तथा उसके चारों ओर ग्रहों की कक्षा का चक्र लगाया जायेगा ।
आमोचनीया वलयैः सुवृत्ता भासाक्षयोश्चापमपात जातैः
सक्षांशचिह्नाः स्पृहयात्र नेया तत्पृष्ठसूत्र प्रथितो प्रहालिः । ५६ ।
यह सभी ग्रह कक्षा उच्च, अपम, पात इत्यादि द्वारा चिह्नित किया जायेगा ।
उसमें राशि, अंश का चिह्न भी होगा । इसके भीतर (सतह पर) मंगल आदि ५
ग्रह होंगे । इसमें इच्छानुसार ग्रहों को यथा स्थान रखकर कक्षा चक्र (काठ की
वृत्ताकार पट्टी) को घुमाया जा सकता है ।
मध्यार्क संवेष्टन कृज्ज्ञ कक्षा धृत्य (१८)
ङ्गुला स्थाञ्चिपिटात्मपृष्ठा ।
तद्वत् सितस्यार्थगुणा (३५) ङ्गुला सद्यद्राङ्गुला
(७२) मंगल कक्षिकैव । ५७ ।
मध्यम सूर्य के चारों तरफ पहली कक्षा बुध की होगी जिसकी परिधि १८
अंगुल की होगी । दूसरी कक्षा शुक्र की ३५ अंगुल की तथा तीसरी कक्षा मंगल
की ७२ अंगुल की होगी ।
३४८ सिद्धान्त दर्पण
गुरो रसोम्भाधिभुजा (२४६) ङ्गूलाथ रूपाब्धि
वेद (४४१) ङ्गुल कार्क सूनोः ।
विमण्डलाख्या इति खेट कक्षाः पूर्वोक्त
कीलेष्व समेषु योज्याः । ५८ ।
वृस्पति कक्षा की परिधि २४६ अंगुल तथा शनि कक्षा की परिधि ४४१ अंगुल
होगी । इन कक्षाओं को असमान कीलों से जोड़कर रखेंगे । इनका दूसरा नाम
विमण्डल है ।
कीलेष्वयो दक्षिणदिङ्मुखो यत् विमण्डलानुक्र मतोनि कृतः
स्याद् गोल सन्धौ सममण्डलग्रो मध्यार्कतोऽवागयनान्त संस्थः । ५९ ।
दक्षिण की तरफ मुंह किये कीलों में क्रम से जो विमण्डल काटा गया है,
वह मध्यम सूर्य से गोल सन्धि में पूर्व पश्चिम दिशा में रहेगा । दक्षिण अयनान्त
में यह कीलें अधिक लम्बी होंगी ।
दीर्घोऽथ सौम्यायन पूर्तनिष्ठः क्षुद्रो न्यराशावनुपात सिद्धः
प्रत्येक भिन्नो मृदु पात भेदात् कक्षानुसारार्द्दर मण्डलस्थः । ६० ।
दक्षिण अयन में ये कीले बड़ी तथा उत्तर अयन में छोटी होंगी । उत्तर अयन
से दक्षिण अयन के बीच की दूरी के अनुपात से उनकी लम्बाई निकालनी होगी ।
मन्दोच्च भेद से कक्षा के अनुसार अर भिन्न भिन्न होंगे ।
अथार्क कक्षा भ्रमणाय सौम्ये निशायचक्रोपरितः स्वमध्यात्
साष्टाग्नि लिप्ताद्रि (७/३८) मितांगुलान्तेमध्यं
यथास्यातु विभिद्यकाष्ठम् । ६१ ।
सूर्य कक्षा को घुमाने के लिए उत्तर के चक्र में केन्द्र से (७/३८) अंगुल पर
एक गोलाकार छेद करेंगे ।
तथैव गत्र्तं वलयायमानं सौम्यायनान्ते विततावकाशम्
याम्यायनान्तेऽल्पमिता न्तरालं तस्मिन् प्रवेश्या ग्रह चक्रयष्टिः । ६२ ।
यह छेद उत्तरायण अर्थात् सायन कर्क आदि में थोड़ा बड़ा तथा दक्षिणायन
अर्थात् सायन मकर आदि में थोड़ा छोटा होगा । इस छेद में ग्रह चक्र यष्टि को
घुसा देंगे ।
सौम्यारि बाह्यस्थ जनेन सैव प्रचालिता चेद्वलयाभगर्ते
[
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३४९
यथा तद ग्रस्थ रविर्धरित्र्य स्याद् गोल सन्धौ सममण्डलस्थः सिद्धांश (२४)
युञ्त्र्यंगुल (३।२।३०) सौम्य भागे युग्मान्त गस्तावदवाक् प्रदेशे । ६४ ।
जिससे यष्टि के अग्र भाग में स्थित पूर्वापर वृत्त में तथा पृथ्वी गोल सन्धि
सायन मेषादि में रहे । सायन कर्क के आरम्भ में रवि इससे (३।२।३०) अंगुल
उत्तर तथा सायन मकर के आरम्भ में इतना थी दक्षिण जायेगा।
चापान्तगस्तिष्ठत तद् वदेष्क कार्योऽ ल्पभूरिवलयावकाशः
याम्यार्यरान्त र्विशतान्तरं वा धृत्वां प्रचाल्य पुरुषेण यष्टिः । ६५ ।
वलयाकार छेद इसी प्रकार अधिक या कम मोटा होगा । अथवा दक्षिण
चक्र के अरों के बीच हाथ डालकर ग्रह चक्र यष्टि को घुमाया जा सकता है ।
नक्षत्र चक्रं प्रकृतं न भस्यं प्रत्यर्क मध्यान्निज कालयातान्
कृत्वा ग्रहां स्तत् समयानुसारान्द भूमध्यतो भानुमपि प्रचाल्य । ६६ ।
सूर्य केन्द्र से आकाश के नक्षत्र चक्र में अभीष्ट काल का ग्रह निकाल कर
(अभीष्ट काल का मन्द स्फुट ग्रह निकाल कर) उसी समय के अनुसार भूमध्य
दृष्टि से सूर्य को देखकर घुमायेंगे ।
भूखेट सूत्रे क्षितिभांशकादौ दृश्याः स्फुटः खेट इतीषु बिम्बौ
ततोबहि र्भूय जनेन तेन यन्त्रस्य पश्चाद् भ्रमणं विधेयम् । ६७ ।
पृथ्वी से ग्रह की सीध में देखने पर ग्रह का स्फुट राशि अंश (मन्द स्फुट)
आदि इस गोल में दीखेगा । ग्रह का शर और बिम्ब भी गणित के अनुसार
दीखेगा । इसके बाद यन्त्र के बाहर आकर पुनः इसे पश्चिम को घुमायेंगे ।
यन्त्रस्यवा सूक्ष्मधिया समन्तात् कार्या भकक्षा शरवेद (४५ ) हस्ता
स्थानेऽर्पिता योग्यतमे ततोऽस्यां वक्रार्जवाद्यं सकलं हि लक्ष्यम् । ६८ ।
अथवा अति बुद्धिमान व्यक्ति यन्त्र के चारों तरफ ४५ हाथ का एक कक्षावृत्त
कर उसमें अश्विनी आदि २७ नक्षत्र चिह्नित करेंगे । इसको भगोल में उचित
स्थान पर (विषुव से २३° ३०', झुका हुआ कान्तिवृत्त के तल में) स्थापित करेंगे ।
इस भ कक्षा में ग्रह की वक्र और सरल गति सभी देखा और दिखाया जा सकता
है ।
किं्वार्कतः खेचर चक्र सूत्रे कृताब्धिरामा (३४४) ङ्गुलदूर मुर्व्याः ।
स्तम्भद्वयं प्राक् परयोर्निवेश्य तत्रांशकानं गुल षट्क तुल्यान् । ६९ ।
अथवा रवि से ग्रह चक्र की दिशा में पृथ्वी से पूर्व और पश्चिम की तरफ
(३४४) अंगुल दूरी पर दो स्तम्भ स्थापित करेंगे । उसमें क्रान्ति वृत्तरीति से ६
अंगुल के बराबर अंश (प्रायः ६ अंश) अंकन करेंगे ।
३५० सिद्धान्त दर्पण
वक्रेऽप्रवृत्तोपमयांक यित्वा कृत्वार्क मध्यं क्षिति पश्चिमस्थम्
मध्यार्यमाक्रान्त गृहादि भार्द्धे निवेश्य भौमं निजकक्षिकायाम् । ७० ।
पृथ्वी के पश्चिम मध्यम सूर्य को रखकर मध्य सूर्य की राशि अंश से ६ राशि
अन्तर पर मंगल को अपनी कक्षा में स्थापित करेंगे ।
तद् भूमि संसक्तगुणं प्रसार्य प्राक् स्तम्भ पर्यन्त मयं यमंशम्
तत्रस्पृशेदंक मिहार्पयित्वा गजाम्बु (४८) राश्यंगुलकक्षिकायाम् । ७१ ।
मंगल और पृथ्वी से होकर जाती रेखा को पूर्व दिशा के चिह्न तक (पूर्व
स्तम्भ तक) बढ़ायेंगे । यह रेखा जिस अंश आदि को स्पर्श करे, वहां चिह्न देकर
उससे ४८ अंगुल की कक्षा में -
मध्येर वावं गुल मात्र भुक्ति निक्षिप्य पक्षार्द्ध गतिं कुजेऽर्कात्
पूर्वार्पितांकात् कुज भूमि सूत्र मूर्धांशगं वीक्ष्य महीस्थ दृष्ट् या । ७२ ।
मध्यम रवि को रखेंगे । रवि की गति एक अंगुल का (अर्थात् ७/ ३०) तथा
मंगल का एक अंगुल (२-१/२) गति होगी । सूर्य से पूर्वोक्त चिह्न (पृथ्वी मंगल
रेखा का पूर्व स्तम्भ की दिशा में) तक की रेखा से पृथ्वी मंगल रेखा ऊपर की
तरफ होगी ।
दृष्ट्येतवक्रागतिरेव मन्यनभश्चराणामृजुवक्रतापि
गतिर्विशोध ग्रहणादि सर्वं प्रेक्ष्यं निरक्षानुसृतेक्षणेन । ७३ ।
पृथ्वी से देखने पर मंगल की वक्र गति दिखेगी । इसी प्रकार अन्य ग्रहों की
भी सरल और वक्र गति देखी जा सकती है । चन्द्र का ग्रहण और गति आदि
विषुव वृत्त धरातल की दृष्टि से देखना होगा ।
सितार कक्षान्तरेन्दु कक्षा संघष्ट्यमाना न भवेद यथाभ्याम्
तथा बुधैना वहितेन खेट चक्रं पुरो नेयम धीष्ट भादौ । ७४ ।
शुक्र और मंगल कक्षा के बीच में चन्द्र कक्षा इस प्रकार रखनी होगी जिससे
दोनों लड़े नहीं । ग्रह मण्डल को इष्ट राशि आदि में पूर्व और पश्चिम को लेते
समय बहुत सावधानी करनी होगी ।
इदं मदुक्तम् बहुकक्षिकाख्यं यन्त्रं यदत्राखिल खेचराणाम् ।
पृथक् पृथक् सूत्र परीत वृत्ते दृश्या गतिर्नैक विधादिवीव । ७५ ।
यह मेरा बहु कक्षा यन्त्र का वर्णन हुआ । इसमें आकाश के दृश्य के समान
ग्रहों की विभिन्न गति देखी जा सकती है । यह अलग अलग और सूत्र की
सहायता से देखी जा सकती है ।
गोलारूढं यन्त्र द्वितीये निजांश छायाभ्रमाद् यन्त्र परिभ्रमाच्च
कालस्य बोधे सुगमेऽपि बाल व्युत्पत्तये वच्मि पृथक् कियन्ति । ७६ ।
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३५१
एक कक्ष और बहुकक्ष - दो प्रकार के गोल यन्त्रों का वर्णन हुआ । अपनी
(या किसी अन्य वस्तु) की छाया भ्रम (छाया की दिशा और लम्बाई) या यन्त्र
घूमने से भी काल का ज्ञान आसानी से हो सकता है । तथापि अल्पज्ञ लोगों को
समय ज्ञान के लिए कालयन्त्र के बारे में कहता हूं ।
चक्रेण यष्ट्या धनुषा नरेण तूर्येण घट् या फलकादिना च
काचैः परोभिः सिकतादिभिश्च सूत्रैः स्वकालं कलयन्तितज्ज्ञाः ७७ ।
चक्र यन्त्र से (नाड़ी मण्डल का या दृङ् मण्डल में) यष्टि यन्त्र में, वृत्तार्द्ध
चाप यन्त्र से, शंकु से, वृत्त चतुर्थांश से, घड़ी यन्त्र से, भास्कर द्वारा वर्णित
फलकादियन्त्र से, काठी से, पानी से, बालू से, या सूत्र यन्त्र से भी समय का
ज्ञान हो सकता है । यन्त्र जानने वाले व्यक्ति प्रत्येक यन्त्र से काल ज्ञान कर सकते
हैं ।
गोलार्द्ध यन्त्रं समया वगत्त्यै कृत्वामृदाकुम्भ दलस्वरूपम्
दृक् सिद्ध मत्यामवनौ निघाय तदूर्ध्व वक्रं खलु भार्द्धबुद्धया । ७८ ।
मिट्टी के घड़ने के निचले आधे भाग के समान एक गोलार्द्ध यन्त्र बनायें ।
उसको जमीन पर ऊपरकी तरफ मुंह कर रख उसमें उस स्थान का पूर्व पश्चिम
आदि दिशा का साधन कर चिह्न देंगे । पृथ्वी के ऊपर उसका जो वक्र भाग है ।
उसको वृत्तार्द्ध मानें ।
उदग् ध्रुवं दक्षिण भित्तिमस्तकादधोऽक्ष भागे रुदरे निवेश्यच ।
ततो ध्रुवाक्रान्तर भाग तुल्य शलाकयोन्मुखया ध्रुवस्थया । ७९ ।
उसके उदर (भीतरी भाग) में पूर्वापर और याम्योत्तर वृत्त खींचेंगे । दक्षिण
उत्तर मस्तक से नीचे अक्षांश अन्तर से उत्तर ध्रुव देकर कलश के पेट में चिह्न
देंगे । तब ध्रुव और सूर्य की अन्तर रेखा व्यासार्द्ध से ध्रुव को केन्द्र मान एक वृत्त
खींचेंगे ।
विलिख्यतत् पश्चिमभित्तिमूर्ध्वतः पुरः स्थभित्यन्त विसर्पिरेखिकाम् ।
निघाय तद् व्यास दल प्रमाणकं नरञ्च साध्ये सरलं दिनादितः । ८० ।
यह वृत्त उस समय के लिए अहोरात्र वृत्त होगा । इस अहोरात्र वृत्त के
व्यासार्द्ध के बराबर ऊंचाई का एक सरल शंकु गोलार्द्ध के बीच में रखेंगे । जो
अहोरात्र वृत्त होगा । उसको भी
स्वघस्र नाड़ी पल लक्ष लक्षिते पुरोक्त रेखावलयार्द्ध केऽन्वितात्
नरप्रभाप्राप्तसमयं प्रतीयतां सितांश्रुतो निश्यपि सूक्ष्म बुद्धिना । ८१ ।
नाड़ी पल आदि से चिह्नित करेंगे । उस पर शंकु छाया की स्थिति से समय
का ज्ञान हो जायेगा । बुद्धिमान् लोग इसी यन्त्र द्वारा रात में भी चैन्द्र से समय
का ज्ञान कर सकते हैं ।
३५२ सिद्धान्त दर्पण
नभसि निरवलम्बे खेचराणामुडुनां
ग्रहलव घटिकादौ रन्तरं यन्त्र वेधैः
परिकलयितुमिष्टं मानयन्त्रं प्रवक्ष्ये
धर धरणीरुहादि स्याद् यतेऽपिप्रमेयम् । ८२ ।
निराधार आकाश में ग्रह तथा नक्षत्रों का अन्तर राशि, अंश, कला, आदि
निकालने के लिए अब मानयन्त्र के विषय में कहता हूँ । इस यन्त्र से पर्वत और
वृक्ष आदि का मान भी जाना जा सकता है ।
घनरस समभूमौ वृत्तमालिख्य भांशां (३६०)
गुल परिमिति मेतत्स्वां शकैरंकयित्वा
ऋजुलघुमिह दत्वा पट्टिकां पृष्ठलग्नां
परिधि लवलगद्भिः केन्द्र निर्यात सूत्रैः । ८३ ।
समतल भूमि को गाढ़े रससे लीपकर चिकना करते हैं । और उसमें ३६०
अंगुल का एक वृत्त बनाकर उसके प्रत्येक अंश (परिधि पर १ अंगुल की दूरी)
पर एक चिह्न देते हैं । ठीक इसी वृत्त के बराबर एक काठ पट्टा का वृत्त बनाते
हैं, जो इसे ढंक सके । काठ पट्टा में भी केन्द्र और अंशों को चिह्नित कर केन्द्र
से परिधि के ३६० अंश चिह्नों तक एक एक रेखा खींचते हैं । भूमि के वृत्त को
भी ३६० भाग में बांटते हैं ।
विरचयितु बहि स्थे पट्टिकान्तेलवाङ्का
स्तनुलवन समुत्थां स्तत्र सोपान कल्पान्
लगयतु पुनरस्या मध्य भागेऽपिदण्डम् ।
दृढ़मृजु मथ वृत्त व्यासतोऽर्द्ध प्रमाणम् । ८४ ।
पट्टी के प्रति अंश का विभाग कर कला आदि भी किया जा सकता है ।
इस पट्टे के केन्द्र में एक दृढ़ और सीधी छड़ी लगाते हैं, जिसका प्रमाण उस वृत्त
के व्यासार्द्ध के बराबर होगा ।
सदल गृह समावा पट्टिका राशि तुल्या
तिथिलव कलिता वा वाञ्छितां शैर्मिता स्यात्
पुनरिह लवनांकाद् व्यंशकाख्यं शका वा
कृतःशर लवका वा स्वेच्छया निर्मिताःस्युः । ८५ ।
इस पट्टे का परिमाण ४,५,३०,१५ वा इष्टांश भी हो सकता है ।
नयन तलगमूलं पाणिनादाय दण्डं
द्विवर विवर मग्रे पट्टिकांशैः प्रमातात्
ग्रह भव सति चिह्नात् प्रत्यगा गामि तत्त-
द्विवर लवकषट्कैस्त्रिज्यया (३४३८) ताड़ितैस्तु । ८६ ।
गोलाधिकार गोलादि वर्णनम् ३५३
पट्टे के कोणों को दो ग्रहों या ग्रहनक्षत्र की सीध में रखकर यष्टि और कोण
को ग्रह की सीध में देखते हैं । पट्टी के कोण का जो अन्तर होता है, उसे ६ से
भाग देते हैं तथा त्रिज्या से गुणा करते हैं ।
निजनिजदिन जीवा भाजितै नाड़िकास्यु
र्गिरि मुख नर मूल स्वान्तरा हस्त संघात्
सकल लवक शंकु ज्या हता दृग् ज्ययाप्ता
भवति फलक राद्यं मानम द्विद्रुमादैः । ८७ ।
फल को उस दिन के अहोरात्र वृत्त के व्यासार्द्ध से भाग देने पर वह अन्तर
की नाड़ी होगी । पर्वत का अग्रभाग और शंकु मूल के बीच की दूरी को शंकुज्या
से गुणा कर दृग्ज्या से भाग देने पर पर्वत की उच्चता आयेगी । वृक्ष की उच्चता
भी इसी प्रकार निकाली जा सकती है ।
वहल सलिल वर्षं वीक्ष्यतस्योर्ध्व सीमो
न्नतनत लवकेभ्यः शंकुदृग्ज्ये विधाय
ख खशरकर (२५००) हस्ता दृग्ज्य काघ्ना नराप्ताः ।
स्व जलद तल भूम्योरन्तरं प्रायशः स्यात् । ८८ ।
खूब वर्षा करने वाले मेघ को भी देखकर मानयन्त्र से उसका उन्नतांश या
नतांश निकाला जा सकता है । उसकी दृग्ज्या को ( २५००) हाथ से गुणा करने
पर शंकु से भाग देने पर अपने और मेघ के केन्द्र तल के बीच की दूरी होगी ।
(नतज्या से भूमि की दूरी और उन्नतज्या से मेघ की जमीन से ऊंचाई ज्ञात होगी ।)
नर युगल सुसाध्यं मानमानेतु मस्मा-
दपि कलयितुशंकुस्थानयोः सन्निविष्टः
नगमुख समदृश्यं पट्टिकान्तः प्रदेशं
नरमिरितिरिति दण्ड भेदमेयान्ति कस्थम् । ८९ ।
दो शंकु द्वारा पर्वत और वृक्ष आदि की ऊंचाई निकालने की विधि में शंकु
के समान स्वयं बैठकर मान यन्त्र से पर्वत को देखा है । इस यन्त्र का डण्डा ही
शंकु है । मेघ पर्वत आदि के निकट स्थित शंकु को छाया माने)
अनिकट भुवि सिद्धे शंकु भे संस्कृते स्तः
प्रथमनर विनिघ्न्यौ दूरशंकु प्रभक्ते
कथितमपरकर्म क्ष्मा समात्रास्तु नो वा
भवति सम भगा दे रूर्ध्वं तिर्यक् प्रमाणम् । ९० ।
इस प्रकार दूर स्थान के शंकु और उसकी छाया को प्रथम शंकु से गुणा कर
२ य या दूरस्थ शंकु से भाग देने पर दो छाया आयेगी । इसके बाद की विधि
पहले कही जा चुकी है । इस विधि में पृथ्वी समतल या तिरछी हो तब भी पर्वत
की उच्चता और उसका विस्तार आयेगा ।
३५४ सिद्धान्त दर्पण
स्फुटतर परिमाण स्ववगतौ तु दण्ड
शर (५) करमित दैर्घ्यः कार्य्यतत् शिखायाम्
विकलयिषित साम्य प्रापिताक्ष्णा शलाका
नर इति लगनीया संस्कृतिः स्यात्तथैव । ९१ ।
यदि वृक्ष और पर्वत आदि का अति स्पष्ट परिमाण जानना हो तो यष्टि को
५ हाथ लम्बा कर देंगे । इस दण्ड के अग्रभाग की सीध में पर्वत की चोटी को
देखेंगे । इसके बाद आंख और पर्वत के बीच एक और शंकु रखेंगे जिसका अग्र
भाग भी पर्वत की चोटी की सीध में हो । तब पहले की विधि से इसका सभी
संस्कार करेंगे ।
ध्रुव समनग शृंगं वीक्ष्य तत् प्राक् प्रतीच्यो
क्वचिदुमविवरज्यां चोन्नतज्यां तथाद्रे
स्थिति युगविवरघ्नो सोन्नतज्या द्वयाप्ता
भवति शिखर मानं दूरता दृग् ज्याकान्तः । ९२ ।
ध्रुव देखने की विधि से (याम्योत्तर वृत्त में) पर्वत शृंग को देखेगे । उसी पर्वत
के पूर्व पश्चिम अन्तरज्या और उन्नतज्या निकालेंगे । उस उन्नत ज्या को पूर्वापर
अन्तरज्या से गुणा कर २ से भाग देने में फल पर्वत आदि की उच्चता होगी । दृग्
ज्या (नतज्या) से दूरता आयेगी अर्थात् नतज्या को उसी पूर्वा पर अन्तर से गुणा
कर २ से भाग देने पर पर्वत की दृगे ज्ञान होगी ।
चक्रवृत्तं तदलं चाप संज्ञं चापस्यार्द्धं यष्टि नामास्ति यन्त्रम् ।
चक्रेणा हो रात्रा कालस्तदर्द्धं चापेनां द्विज्ज्ञायते तस्य यष्ट्या । ९३ ।
चक्रयन्त्र वृत्ताकार है । उसका आधार या वृत्तार्द्धाकार चाप यन्त्र कहा जाता
है ।
पुनः चाप के आधा को यष्टि यन्त्र या तुरीय (चतुर्थांश) यन्त्र कहा जाता है ।
चक्र यन्त्र से दिन और रात का समय, चाप या वृत्ताद्धं यन्त्र से अहोरात्र का आधा,
पुन, यष्टि यन्त्र से (तुरीय यन्त्र से) दिन का अहोरात्र का चतुर्थांश (दिनार्द्ध)
निकाला जा सकता है ।
काच पात्रं युगलं परस्परं सम्मुखीन मणु मध्यरन्ध्रकम्
सं विधाय जल पूरितैकतानिः सरेदपर पात्र के जलम् । ९४ ।
ऊपर नीचे के दो कांच के बर्तनों के बीच में एक छोटा छेद होगा । जिससे
ऊपर के पात्र का जल नीचे के बर्तन में जा सके ।
यावताथ समये नतावता व्यस्त संस्थिति वशात् पुनस्ततः
ऊर्ध्वत स्थल गतेऽपि नःसरेदित्य मत्र सिकतापि निःसृतिः । ९५ ।
पहला पात्र ऊपर रहने पर उससे नीचे के पात्र में जल गिरने में जितना समय
लगता है, उसे उल्टा रखने पर ऊपर के दूसरे पात्र से उतने ही समय में पहले
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३५५
पात्र में जल जायेगा । इसमें जल के बदले बालू का भी व्यवहार किया जा सकता
है । इस समय के अनुसार दिन का समय भी जान सकते हैं ।
मयूर नर वानराः कुशल शिल्पिना कल्पिताः
ससूत्र नलको दराः सलिल गामि पात्र स्थिताैः
रसादिभ रनुद्भूतं निजमुखैश्च मण्यादिकं
गिलन्ति गुण गुम्फितं प्रतिमुहूर्त मिच्छा वशात् । ९६ ।
अच्छे शिल्पी द्वारा खोखला नर या वानर मूर्ति बनाकर उसके पेट में नली
लगाकर उसके भीतर एक लोहा का तार लगायेंगे । एक पानी से भरे बर्तन में
रखने पर पारद की तरह आकर्षण (Surface tension) के कारण उसमें बूंद बूंद
जल जाय इसकी व्यवस्था करेंगे । छेद की लम्बाई और मोटाई इस प्रकार स्थिर
करेंगे जिससे २ दण्ड (एक मुहूर्त) में एक बूंद (या कोई स्थिर चिह्न तक) पानी
जाय ।
गोलार्द्धाकृति घटितं सुताम्रपात्रम्
छिद्रेणाप्यति तनना तले समेतम्
कुण्डाम्भस्य बहलभित्ति पतितं सद्
घट्या मज्जति यदिदं कपालयन्त्रम् । ९७ ।
अर्द्ध गोलाकार ताम्बे का एक बर्तन तैयार करेंगे, जिसका तल थोड़ा चिपटा
हो (जिससे वह स्थिर रह सके) । उसके तल में एक छोटा छेद कर उसको पानी
के ऊपर रखने पर पात्र में धीरे धीरे पानी भरने लगेगा । छेद का आकार ऐसा
होगा जिससे एक घड़ी में पूरा पात्र भर जाय । इसे कपाल यन्त्र कहते हैं ।
भास्करेणोदितं यस्मात् फलकाक्षं सुविस्तरात्
यन्त्रं तदत्र न मया गदितं विदितं पुनः । ९८ ।
भास्कर ने फलक यन्त्र के बारे में विस्तार से कहा है अतः मैं पुनः नहीं कह
रहा हूँ ।
यन्त्रं स्वयं वह मिहाभिदधामि चक्रं
षष्टयं गुलावर्त्मल तुल्य नेमि
निर्माय यष्टि घटिकात्मक रेखिकाष्टयं
रेखान्तरे द्विषु (५) मिते वृत मंश चिहैः । ९९ ।
स्वयंवह यन्त्र के लिए ६० अंगुल परिधि का एक चक्र बनायेंगे । उसकी
परिधि पर प्रति अंगुल पर एक एक रेखा देंगे । नेमि की ६० रेखायें दिन-रात की
६० घटी के समान हैं । ५-५ अंश पर और एक चिह्न उस पर बनायेंगे ।
हस्तत्रयोन्नति मदुत्तर दक्षिणस्थ-
स्थूलाग्ररन्ध्र युग निश्चल सन्निवेशे
३५६ सिद्धान्त दर्पण
अक्षे सुवृत्त मसृणे विनियोज्यनाभिं
चक्रस्य तुल्य लघुता खिल वेष्टनस्य । १०० ।
चक्र के केन्द्र में एक छेद कर उसके भीतर एक गोल और चिकना आंख
(चिकनी नली) लगायेंगे, जिससे वह धुरी पर आसानी से घूम सके । उत्तर दक्षिण
दिशा में ३ हाथ ऊंचा दो खूंटा गाड़ कर उस पर एक धुरी पर यह चक्र लगायेंगे ।
चक्र का वजन समान होना चाहिये नहीं तो वह आसानी से नहीं घूमेगा ।
प्राक् पश्चिमाक्षि तिजयो रविचन्द्र चिह्ने
दत्वास्य वासर निशा परिवर्त हेतोः
प्रत्यग् भ्रमार्थ मपरक्षितिजाधर स्थं
ताम्रादि निर्मित मृजुनलकं निदध्यात् । १०१ ।
पूर्व और पश्चिम क्षितिज में सूर्य और चन्द्रचिह्न देकर यह दिन रात घुमाने के
लिए पश्चिम क्षितिज के नीचे ताम्बा आदि धातु की बनी एक सीधी नली स्थापित
करेंगे ।
षष्ट्यंगुल प्रमित तन्नलकोदरस्थ
तोयं यथा स्रवति षष्टि घटि भिरेवम्
[L1
गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३५७
धीरे धीरे चक्के को अहोरात्र में एक बार घुमायेगा ।
प्रातः पुरः स्थितिरवेः सविधे शलाकां
तिर्यग् ददत् क्षणघटी रूदिताः प्रमातुम्
अंकै र्घुरात्र्य वयवान् कलयेत्पुरेद्युः
प्राग् वन्नियो जयतु जीवन पूरणायैः । १०५ ।
सवेरे सूर्योदय के समय पूर्व क्षितिज में रवि चिह्न के निकट उसी चक्र से
तिरछे दक्षिणोत्तर दिशा में एक काठी रखेंगे । सूर्योदय से आरंभ कर चक्र के पूर्व
दिशा में घूमने से चक्र (नेमि) का जो चिह्न काठी से लगता है उससे अहोरात्र
का अवयव (घटी, पल आदि) जाना जा सकता है । अगले दिन भी उस चक्र
को उसी प्रकार स्थापित करेंगे ।
चक्रार्द्धतोऽवनितलावधि गोपनीयं
सर्वं भ्रमोपकरणं खलु दर्शकेभ्यः
तेषां भवेन्नहि चमत्कृतिरन्यथात्र
सच्छात्र नेत्रपतनार्ह मदो यदेव । १०६ ।
निचला चक्रार्द्ध जमीन के नीचे रखेंगे । जिससे यह दर्शकों को दिखायी
नहीं दे, नहीं तो दर्शकों की चमत्कार देखने की इच्छा नष्ट हो जायेगी । यह
गोपनीय विधि सिर्फ अच्छे छात्र को ही दिखानी चाहिये ।
अथ पुरोदित गोल परिभ्रमो भवति चक्र वदत्र मतान्तरम्
ब्रूत इह ध्रुव चक्र विलान्तगौ पृथुल दारु मयौ वलयौ क्रियात् । १०७ ।
पहले कहे गये गोल यन्त्र का भ्रमण भी इस स्वयंवह यन्त्र के समान होगा ।
इसके बारे में अन्य मत कहता हूँ । सायन मेषादि से ध्रुव (चक्र) मण्डल के भीतर
पतली लकड़ी का दो वृत्त बनायेंगे ।
विमलतैल मिलद् विल युग्मके समसुवृत्त शिखां ध्रुव यष्टिकाम्
अभिनिवेश्य पुनस्तन कीलकौ वलय पश्चिमगौनलकावधः । १०८ ।
ध्रुव चक्र के दोनों रन्ध्रो (काष्ठ के वृत्ताकार छेदो) में अच्छी तरह तेल देकर
समभाग से उसमें ध्रुव यष्टि को लगायेंगे) पुनः गोल के पश्चिम में दो छोटी कीलें
देकर कील के नीचे दो नली स्थापित करेंगे ।
तदनुसारि रसान्वित तुम्बिका युगलकृष्ट गुणौ रचयेत्तथा
इति कृते ऽखिल कर्मणि गोल को भ्रमति संस्थिति पूर्व निरक्षके । १०९ ।
नली से दो तुम्बी लटकायेंगे और उसमें पारद देंगे । तुम्बी द्वारा खींचने के
लिये गोल और तुम्बी के बीच सूत्र बान्धेंगे । इससे गोल यन्त्र विषुव वृत्त में
पूर्वापर वृत्त की तरह घूमेगा ।
३५८ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते- ग्रह नक्षत्र चरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः
ग्रहलोकमवाप्नोति पर्ययेणात्मवान्नरः । इति । ११० ।
ग्रह नक्षत्र तथा गोल का ज्ञान होने से व्यक्ति धनी होता है तथा मरने के
बाद ग्रह लोक में जाता है ।
सिद्धान्त शिरोमणै-दिव्य ज्ञान मतीन्द्रियं यदृषिभिर्ब्राह्म्यवशिष्ठादिभि
पारम्पर्य वशाद् रहस्य मवनीं नीतं प्रकाश्यं ततः
नैतद् वेषि कृतघ्न दुर्जन दुरा राराचिरा वासिनां
स्यादायुः सुकृतक्षयो मुनिकृतां सीमामिमामुज्झतः । इति । १११ ।
ग्रहज्ञान दिव्य और अतीन्द्रिय है । यह पहले ब्रह्मा ने कहा था उसके बाद
वशिष्ठ आदि ऋषियों के क्रम. से पृथ्वी पर इसका विस्तार हुआ । इस प्रकार
पवित्र ज्ञान को हिंसक, कृतघ्न, दुर्वृत्त तथा अधिक दिन ज्ञान न रख सकने वाले
व्यक्ति को नहीं देना चाहिये ।
ऋषि मुनियो का यह आदेश नहीं मानने से आयु तथा पुण्य का नाश होता
है ।
कृति प्रति निवृत्यौ मनु जवीययो यन्महा
प्रसाद परिपूरितोदर कराननाः पावनाः
पुनन्ति पतितान् पथि स्वतनु मारुतौ मद्द्दृशौ
दृशो र्वहतु मेऽन्वहं महमदो महान्तं महः । ११२ ।
जिसका महाप्रसाद हाथ में, मुंह या पेट में लेने से पुनः जन्म नहीं होता,
जिसके द्वारा मेरे जैसे पतित भी पावन हो जाते हैं, उस महाप्रभु का तेज सदा मेरी
दृष्टि में रह कर आनन्द दे ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
विंशोऽगमत्पाटित यन्त्रकथः प्रकाशः । ११३ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालको की शिक्षा के लिए सिद्धान्त दर्पण का यन्त्र
वर्णन सम्बन्धी २० वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
एक विंशः प्रकाशः
वासना शेष रहस्य वर्णन
कृत्वा ग्रहाणां गोलानां गणितक्रम वर्णनम्
प्रत्युक्ति शेषमिषतो वासनादिक् प्रदर्श्यते । १ ।
ग्रह और गोल का वर्णन पूरा करने के बाद प्रश्नोत्तर रूप में वासना (गणितं
विधियों का रहस्य या तर्क) दिखाया जा रहा है ।
व्यक्षे क्षितिज वृत्तम् यत्तदुन्मण्डलान्यतः
स्वदेशे क्षितिजे सूर्योदयोऽस्मात् स्वनिरक्षयोः । २ ।
निरक्ष देश (विषुव वृत्त स्थान) के क्षितिज वृत्त को अन्य स्थानों पर उन्मण्डल
कहा जाता है । अपने अपने स्थान के क्षितिज वृत्त में ही सूर्योदय होता है । अपने
स्थान के क्षितिज और निरक्ष के क्षितिज (जो अपने स्थान का उन्मण्डल है) के
बीच
द्युरात्र वृत्तानुसृतेश्वरं सूर्योदयान्तरम्
द्युरात्र मण्डले यस्मात् क्षितिजादुपरि स्थिते । ३ ।
अहोरात्र वृत्त का खण्ड ही चर है । यह दोनों स्थान के सूर्योदयों में समय
का अन्तर है । सूर्य अहोरात्र वृत्त में अपने क्षितिज के ऊपर रहने पर
दिनं भवेदधः संस्थे ततो भवति यामिनी
तस्मात् समत्वं सततं द्युनिशो व्यक्ष देशके । ४ ।
दिन होता है । तथा नीचे रहने पर रात होती है । निरक्षवृत्त ही सबसे बड़ा
अहोरात्र वृत्त है । इसको सभी देशों का क्षितिज दो समान भागों में बांदता है ।
अतः सूर्य निरक्ष वृत्त में घूमने पर दिन और रात हर स्थान पर समान होते हैं ।
निरक्ष देश में दिन रात...सदा समान होते हैं ।
निरक्षोदयतः पूर्वं सौम्य गोले स्वदेशजः
उदयोऽस्तमयः पश्चाद् याम्य गोले विपर्ययः । ५ ।
विषुव रेखा से उत्तर-सूर्य रहने पर उत्तर के स्थानों में विषुव क्षेत्र से पहले
सूर्योदय तथा पीछे सूर्यास्त होता है । दक्षिणीगोल में इसका विपरीत होता है ।
क्षितिजोर्ध्वाधरः स्थित्वा दृक्वृत्तस्य च गोलयोः
सौम्ये महद्दिनं रात्रिस्तनुर्याम्ये तु वाम्यतः । ६ ।
इसका कारण है कि उत्तर गोल में उन्मण्डल अपने क्षितिज से ऊपर रहता
है, उन्मण्डल तक पहंचने (निरक्ष सूर्योदय) से पहले ही सूर्य अपने क्षितिज पर
आ जाता है । और अपने स्थान का सूर्योदय होता है। दक्षिण गोल में उन्मण्डल
अपने क्षितिज से नीचे होता है।
३६० सिद्धांत दर्पण
सार्द्धषट् षष्टि (६६।३०) भागेभ्यो देशे यत्र पलांशकाः
भवन्त्य ध्यधिकास्तत्र विशेषोऽपर उच्यते । ७ ।
जिसका स्थान का अक्षांश ६६ १/२ अंश से अधिक है वहां विशेष घटना
होती है । जिसके बारे में यहां कहा जा रहा है ।
लम्बाधिकोत्तर क्रान्ति र्यावत्तावत् सदादिनम्
याम्य क्रान्ति स्तथा यावत् तावत्तत्र निशानिशम् । ८ ।
सूर्य की उत्तर क्रान्ति जितने दिनों तक रहती है । तब तक यहां दिन होता
है तथा जब तक दक्षिण क्रान्ति होती है तब तक रात्रि (अर्थात् ६ मास का दिन
तथा उतनी ही रात्रि) ।
देवासुराणां क्षितिजं विषुवद् वलयं यतः
सौम्य याम्य ध्रुवौ तेषां मस्तकोर्ध्व स्थितौ ततः । ९ ।
विषुव वृत्त देव और असुरों का क्षितिज है । अतः उत्तर ध्रुव देवताओं का
तथा दक्षिण असुरों का ख स्वस्तिक है ।
उर्ध्वे भ्रमन्तं क्षितिजादुदग् दक्षिण गोल योः
सव्यगं सूर्यमीक्ष्यन्ते देवा दैत्या स्त्व सव्यगम् । १० ।
सूर्य उत्तर गोल में रहने पर देवता लोग उसे दक्षिणी क्षितिज पर घूमता हुआ
देखते हैं । सूर्य दक्षिण क्रान्ति होने पर असुर उसे उत्तरी क्षितिज पर घूमता हुआ
देखते हैं ।
अस्मादुत्तर गोलस्थे भानौ दिविषदां दिनम् ।
रात्रि रन्यत्र दैत्यानां वैपरी त्यादहर्निशम् । ११ ।
क्रान्ति वृत्त का आधा भाग (सायन मेष से सायन तुला आदि तक) विषुव
के उत्तर है । अतः वर्ष के आधे भाग में जब सूर्य उत्तरायण होता है, देवताओं
का दिन और असुरों की रात होती है । सूर्य दक्षिणी गोल में रहने पर इसका
उल्टा होता है ।
सुराणां दिन यामिन्यौ सौम्य याम्या यने इति ।
स्मृति र्दिनोन्मुखे रात्र्यमुखेऽर्कं समतातयोः । १२ ।
अतः स्मृतियों में कहा गया है सूर्य के उत्तर या दक्षिण अयन में रहने से सुरों
का दिन या रात होता है । दिनार्द्ध के बाद सूर्य क्षितिज से नीचे की दिशा में
जाने लगता है । तथा रात्रि अर्द्ध के बात ऊपर उठता है, या दिन की दिशा में
जाता है ।
निशाहर्दलयो र्भानो र्यदारोहा वरोहयो
स्यादारम्भस्ततः कृत्यं देवानां स्याद् द्युरात्रजम् । १३ ।
वासना शेष रहस्य वर्णन ३६१
इस प्रकार अर्द्ध रात्रि से ही दिन का आरम्भ हो जाता है । अतः उत्तरायण
आरम्भ होने पर देवताओं के दिन का आरम्भ माना जाता है । और उस समय
देवताओं के दिनारम्भ कृत्य मनुष्य करने पर देवता गण प्रसन्न होते हैं ।
ब्रह्मयाति दूरगं भूमेः पश्येदा प्रलयं रविम्
दिनान्तेऽस्तमिते शेते तत्रेत्युक्तिः पुराविदाम् । १४ ।
भूमि से ब्रह्मा बहुत दूर रहने के कारण वह प्रलय होने तक सदा रवि को
देखते हैं । और उनका दिन रहता है । प्रलय होने पर सूर्य अस्त (वा नष्ट) होता
है तब ब्रह्मा की रात्रि होती है और वह शयन करते हैं ऐसा पुराणों में कहा है ।
अन्यस्य तदहः कर्तुमनेन सति भास्वतः
भ्रान्तिर्युग सहस्राभ्या मेका तस्यापि मन्यताम् । १५ ।
अन्यों का (देव, दानव और मनुष्यों का) दिन-रात एक ही सूर्य से होता है ।
ब्रह्मा की रात्रि समाप्त होने पर एक अन्य सूर्य का उदय होता है । (क्यों कि पिछला
सूर्य प्रलय में नष्ट हो जाता है )
दिनं स्याद्दर्शने भानोर्यतो रात्रि रदर्शने
पितॄणां तद्दिनं मासाशशि पृष्ठ निवासिनाम् । १६ ।
सूर्य का दर्शन होने से दिन तथा अदर्शन (छिप जाने) से रात्रि होती है ।
अतः पितृ लोक चन्द्र की सतह पर रहने के कारण एक चान्द्र मास उनका दिन
-रात होता है ।
मध्यन्दिनंस्याद्धशान्ति पूर्णिमान्ते निशादिनम्
सितेऽसिते पक्ष दले सायं प्रात रितः क्रमात् । १७ ।
अमान्त में पितरों का दिनार्द्ध तथा पूर्णान्त में उन लोगों का निशार्द्ध होता
है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी में उन लोगों की सन्ध्या तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी :
(आधा में) उनका सूर्योदय होता है ।
यत्रापमण्डलं प्राच्यां लगति क्षितिजे लवे
लग्नस्तद्राशि भागाद्यमस्त लग्नः परे कजे । १८ ।
पूर्व क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो अंश लगता है वही उस समय का (उस
स्थान का) लग्न है । पश्चिम क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो भाग लगता है वह
उस समय का अन्त लग्न है ।
क्षितिजद्वय मध्यस्थौ प्रदेशा दधरोर्द्धव गौ
पाताल मध्य लग्ना रूयौज्ञेयौ त्रिप्रश्न दर्शनात् । १९ ।
पूर्व और पश्चिम क्षितिज के बीच में नीचे और ऊपर की दिशा में क्रान्ति वृत्त
का जो अंश लगता है उसे क्रमशः चतुर्थ और दशम् लग्न कहते हैं । इसका ज्ञान
त्रिप्रश्नाधिकार से होता है ।
यात्यल्प कालेन ऋजु र्बहुना समयेन यत् । २० ।
Wait, line 3:
"यात्यल्प कालेन ऋजु र्बहुना समयेन यत् । २० ।"
Notice the space: "ऋजु" then "र्बहुना" (र् on बहुना with space). Exactly as printed!
Line 4-5:
क्रान्ति वृत्त का तिरछा स्थान जल्दी उदय और अस्त होता है किन्तु सरल
भाग (लम्बा होने के कारण) उदय और अस्त होने में अधिक समय लगता है ।
Line 6-7:
ततोन तुल्या उदया व्यक्षे चक्रांश्रयः पृथक्
Wait, "ततोन": is it "ततोन" or "ततो न"?
Looking at line 6: "ततोन" is joined! "ततोन तुल्या उदया व्यक्षे चक्रांश्रयः पृथक्"
Line 7:
"उद्यन्ति तिथिनाड़ी भिभाद्र्द्धे सर्वत्रखाग्निभिः (३०) । २१ ।"
Wait, look at "भिभाद्र्द्धे":
भ + ि = भि
भ + ा = भा
द + ् + र् + द् + ध + े = द्र्द्धे?
Look at it: "भिभाद्र्द्धे" -> 'भि' then 'भा' then 'द्र्द्धे' (द with halanta/