सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३४९
यथा तद ग्रस्थ रविर्धरित्र्य स्याद् गोल सन्धौ सममण्डलस्थः सिद्धांश (२४)
युञ्त्र्यंगुल (३।२।३०) सौम्य भागे युग्मान्त गस्तावदवाक् प्रदेशे । ६४ ।
जिससे यष्टि के अग्र भाग में स्थित पूर्वापर वृत्त में तथा पृथ्वी गोल सन्धि
सायन मेषादि में रहे । सायन कर्क के आरम्भ में रवि इससे (३।२।३०) अंगुल
उत्तर तथा सायन मकर के आरम्भ में इतना थी दक्षिण जायेगा।
चापान्तगस्तिष्ठत तद् वदेष्क कार्योऽ ल्पभूरिवलयावकाशः
याम्यार्यरान्त र्विशतान्तरं वा धृत्वां प्रचाल्य पुरुषेण यष्टिः । ६५ ।
वलयाकार छेद इसी प्रकार अधिक या कम मोटा होगा । अथवा दक्षिण
चक्र के अरों के बीच हाथ डालकर ग्रह चक्र यष्टि को घुमाया जा सकता है ।
नक्षत्र चक्रं प्रकृतं न भस्यं प्रत्यर्क मध्यान्निज कालयातान्
कृत्वा ग्रहां स्तत् समयानुसारान्द भूमध्यतो भानुमपि प्रचाल्य । ६६ ।
सूर्य केन्द्र से आकाश के नक्षत्र चक्र में अभीष्ट काल का ग्रह निकाल कर
(अभीष्ट काल का मन्द स्फुट ग्रह निकाल कर) उसी समय के अनुसार भूमध्य
दृष्टि से सूर्य को देखकर घुमायेंगे ।
भूखेट सूत्रे क्षितिभांशकादौ दृश्याः स्फुटः खेट इतीषु बिम्बौ
ततोबहि र्भूय जनेन तेन यन्त्रस्य पश्चाद् भ्रमणं विधेयम् । ६७ ।
पृथ्वी से ग्रह की सीध में देखने पर ग्रह का स्फुट राशि अंश (मन्द स्फुट)
आदि इस गोल में दीखेगा । ग्रह का शर और बिम्ब भी गणित के अनुसार
दीखेगा । इसके बाद यन्त्र के बाहर आकर पुनः इसे पश्चिम को घुमायेंगे ।
यन्त्रस्यवा सूक्ष्मधिया समन्तात् कार्या भकक्षा शरवेद (४५ ) हस्ता
स्थानेऽर्पिता योग्यतमे ततोऽस्यां वक्रार्जवाद्यं सकलं हि लक्ष्यम् । ६८ ।
अथवा अति बुद्धिमान व्यक्ति यन्त्र के चारों तरफ ४५ हाथ का एक कक्षावृत्त
कर उसमें अश्विनी आदि २७ नक्षत्र चिह्नित करेंगे । इसको भगोल में उचित
स्थान पर (विषुव से २३° ३०', झुका हुआ कान्तिवृत्त के तल में) स्थापित करेंगे ।
इस भ कक्षा में ग्रह की वक्र और सरल गति सभी देखा और दिखाया जा सकता
है ।
किं्वार्कतः खेचर चक्र सूत्रे कृताब्धिरामा (३४४) ङ्गुलदूर मुर्व्याः ।
स्तम्भद्वयं प्राक् परयोर्निवेश्य तत्रांशकानं गुल षट्क तुल्यान् । ६९ ।
अथवा रवि से ग्रह चक्र की दिशा में पृथ्वी से पूर्व और पश्चिम की तरफ
(३४४) अंगुल दूरी पर दो स्तम्भ स्थापित करेंगे । उसमें क्रान्ति वृत्तरीति से ६
अंगुल के बराबर अंश (प्रायः ६ अंश) अंकन करेंगे ।