सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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कृत्वैषसादौ घन चक्र युग्मं हस्तोन्मितं व्यास मुदीच्य वाच्यो
बहिः स्थितस्तम्भयुग प्रगाढ़ प्रोताक्षयुग्मापि तनाभि देशम् । ४६ ।
एक हाथ व्यास का काठका दो घन चक्र करेंगे । दो खूंटा गाड़कर उसके
बाहर दक्षिण और उत्तर में यह दोनों चक्र लगाकर कर रखें । दोनों खूंट उत्तर
दक्षिण दिशा में लगाया जायेगा । खूंट के ऊपर धूरी का कील रखकर उसी कील
को दो चक्रों के केन्द्र में लगा कर रखना होगा ।
धारादृढ़प्रोत निचार वार प्रान्तस्फुरद् वर्तुल नेमि युग्म्
खाङ्गा (९०) ङ् गुलाक्ष प्रधिकान्तरा लं संस्थाप्यहस्तत्रयदूरगंतत् । ४७ ।
दोनों काठ के गोलों में छेद कर शर (लकड़ी की छड़ी) लगायेंगे और शरों
के अगले भाग में एक नेमि (काठ की वृत्ता कर पट्टी जिसमें ३६० अंश चिन्हहों)
लगाकर रखेंगे । नेमि और अक्ष के बीच ९० अंगुल की दूरी होगी । काठ के
गोलों को एक दूसरे से ३ हाथ दूर रखेंगे ।
नेमिद्वयस्यूति दृढ़ा शलाकाश्चक्रद्वयं भ्रान्ति कृते ह्यवक्राः
देयास्त्रि हस्ताभ्यधिकास्तदन्तः क्ष्मा खेटकक्षाः परिकल्पनीयाः । ४८ ।
इन दो गोलों (नेमि सहित) को घुमाने के लिए ३ हाथ से अधिक दृढ़ काठ
का डण्डा इन दो तुम्बियों के भीतर घुसा कर रखेंगे । इन दोनों चक्रों के बीच (३
हाथ की दूरी पर ) पृथ्वी और ग्रह कक्षा आदि रहेंगे ।
याम्या रितश्चाङ्ग गुणा (३६) निवेश्य दीर्घस्य सौम्याभिमुखस्यसूक्ष्मे
अक्षस्यामूर्द्धन्यनुवेश्य पृथ्वीं तन्वीं विधोस्तत्त्वरितश्च कक्षा । ४९ ।
दक्षिण चक्र (गोला) से ३६ अंगुल दूर (बीच की तरफ) उत्तर दिशा में मुख
किया हुआ अक्ष (उत्तर दिशा में कील का डण्डा) लगायेंगे । उस अक्ष में छोटे
आकार की पृथ्वी लगा देंगे । पृथ्वी के चारों तरफ चन्द्र कक्षा होगी ।
षडंगुलाद्धर्द्धांगुल राशि युक्ता क्रान्त्युच्च पातानू गता श्लथा च
याम्यरि संसक्त चतुः शलाका कार्योर्द्ध र्व सूत्र प्रथिताणु चन्द्रा । ५० ।
पृथ्वी के चारो तरफ चन्द्र कक्षा शिथिल होगी, उसका माप ६ अंगुल होगा
तथा आधे आधे अंगुल पर १ राशि चिह्नित होगी । चन्द्र कक्षा में क्रान्ति, मन्दोच्च,
पात और चन्द्र का स्थान चिह्नित कर दक्षिण चक्र से इनके ऊपर ४ मजबूत काठी
लगाकर रखेंगे ।
चक्रांकित द्वादश राशि रेखानुसारतश्चन्द्र मृदूच्चपातौ
स्वकालजौ दक्षिण चक्रमध्ये देया वुदीच्यन्यनभश्चराणाम् । ५१ ।
दक्षिण चक्र में १२ राशि का चिह्न दिया जायेगा । उसी क्रम में इष्ट काल
में चन्द्र मन्दोच्च और पात दक्षिण चक्र में देगें । उत्तर चक्र में अन्य ग्रहों की कक्षा
देंगे ।