सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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वक्रेऽप्रवृत्तोपमयांक यित्वा कृत्वार्क मध्यं क्षिति पश्चिमस्थम्
मध्यार्यमाक्रान्त गृहादि भार्द्धे निवेश्य भौमं निजकक्षिकायाम् । ७० ।
पृथ्वी के पश्चिम मध्यम सूर्य को रखकर मध्य सूर्य की राशि अंश से ६ राशि
अन्तर पर मंगल को अपनी कक्षा में स्थापित करेंगे ।
तद् भूमि संसक्तगुणं प्रसार्य प्राक् स्तम्भ पर्यन्त मयं यमंशम्
तत्रस्पृशेदंक मिहार्पयित्वा गजाम्बु (४८) राश्यंगुलकक्षिकायाम् । ७१ ।
मंगल और पृथ्वी से होकर जाती रेखा को पूर्व दिशा के चिह्न तक (पूर्व
स्तम्भ तक) बढ़ायेंगे । यह रेखा जिस अंश आदि को स्पर्श करे, वहां चिह्न देकर
उससे ४८ अंगुल की कक्षा में -
मध्येर वावं गुल मात्र भुक्ति निक्षिप्य पक्षार्द्ध गतिं कुजेऽर्कात्
पूर्वार्पितांकात् कुज भूमि सूत्र मूर्धांशगं वीक्ष्य महीस्थ दृष्ट् या । ७२ ।
मध्यम रवि को रखेंगे । रवि की गति एक अंगुल का (अर्थात् ७/ ३०) तथा
मंगल का एक अंगुल (२-१/२) गति होगी । सूर्य से पूर्वोक्त चिह्न (पृथ्वी मंगल
रेखा का पूर्व स्तम्भ की दिशा में) तक की रेखा से पृथ्वी मंगल रेखा ऊपर की
तरफ होगी ।
दृष्ट्येतवक्रागतिरेव मन्यनभश्चराणामृजुवक्रतापि
गतिर्विशोध ग्रहणादि सर्वं प्रेक्ष्यं निरक्षानुसृतेक्षणेन । ७३ ।
पृथ्वी से देखने पर मंगल की वक्र गति दिखेगी । इसी प्रकार अन्य ग्रहों की
भी सरल और वक्र गति देखी जा सकती है । चन्द्र का ग्रहण और गति आदि
विषुव वृत्त धरातल की दृष्टि से देखना होगा ।
सितार कक्षान्तरेन्दु कक्षा संघष्ट्यमाना न भवेद यथाभ्याम्
तथा बुधैना वहितेन खेट चक्रं पुरो नेयम धीष्ट भादौ । ७४ ।
शुक्र और मंगल कक्षा के बीच में चन्द्र कक्षा इस प्रकार रखनी होगी जिससे
दोनों लड़े नहीं । ग्रह मण्डल को इष्ट राशि आदि में पूर्व और पश्चिम को लेते
समय बहुत सावधानी करनी होगी ।
इदं मदुक्तम् बहुकक्षिकाख्यं यन्त्रं यदत्राखिल खेचराणाम् ।
पृथक् पृथक् सूत्र परीत वृत्ते दृश्या गतिर्नैक विधादिवीव । ७५ ।
यह मेरा बहु कक्षा यन्त्र का वर्णन हुआ । इसमें आकाश के दृश्य के समान
ग्रहों की विभिन्न गति देखी जा सकती है । यह अलग अलग और सूत्र की
सहायता से देखी जा सकती है ।
गोलारूढं यन्त्र द्वितीये निजांश छायाभ्रमाद् यन्त्र परिभ्रमाच्च
कालस्य बोधे सुगमेऽपि बाल व्युत्पत्तये वच्मि पृथक् कियन्ति । ७६ ।