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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३४८ सिद्धान्त दर्पण
गुरो रसोम्भाधिभुजा (२४६) ङ्गूलाथ रूपाब्धि
वेद (४४१) ङ्गुल कार्क सूनोः ।
विमण्डलाख्या इति खेट कक्षाः पूर्वोक्त
कीलेष्व समेषु योज्याः । ५८ ।
वृस्पति कक्षा की परिधि २४६ अंगुल तथा शनि कक्षा की परिधि ४४१ अंगुल
होगी । इन कक्षाओं को असमान कीलों से जोड़कर रखेंगे । इनका दूसरा नाम
विमण्डल है ।
कीलेष्वयो दक्षिणदिङ्मुखो यत् विमण्डलानुक्र मतोनि कृतः
स्याद् गोल सन्धौ सममण्डलग्रो मध्यार्कतोऽवागयनान्त संस्थः । ५९ ।
दक्षिण की तरफ मुंह किये कीलों में क्रम से जो विमण्डल काटा गया है,
वह मध्यम सूर्य से गोल सन्धि में पूर्व पश्चिम दिशा में रहेगा । दक्षिण अयनान्त
में यह कीलें अधिक लम्बी होंगी ।
दीर्घोऽथ सौम्यायन पूर्तनिष्ठः क्षुद्रो न्यराशावनुपात सिद्धः
प्रत्येक भिन्नो मृदु पात भेदात् कक्षानुसारार्द्दर मण्डलस्थः । ६० ।
दक्षिण अयन में ये कीले बड़ी तथा उत्तर अयन में छोटी होंगी । उत्तर अयन
से दक्षिण अयन के बीच की दूरी के अनुपात से उनकी लम्बाई निकालनी होगी ।
मन्दोच्च भेद से कक्षा के अनुसार अर भिन्न भिन्न होंगे ।
अथार्क कक्षा भ्रमणाय सौम्ये निशायचक्रोपरितः स्वमध्यात्
साष्टाग्नि लिप्ताद्रि (७/३८) मितांगुलान्तेमध्यं
यथास्यातु विभिद्यकाष्ठम् । ६१ ।
सूर्य कक्षा को घुमाने के लिए उत्तर के चक्र में केन्द्र से (७/३८) अंगुल पर
एक गोलाकार छेद करेंगे ।
तथैव गत्र्तं वलयायमानं सौम्यायनान्ते विततावकाशम्
याम्यायनान्तेऽल्पमिता न्तरालं तस्मिन् प्रवेश्या ग्रह चक्रयष्टिः । ६२ ।
यह छेद उत्तरायण अर्थात् सायन कर्क आदि में थोड़ा बड़ा तथा दक्षिणायन
अर्थात् सायन मकर आदि में थोड़ा छोटा होगा । इस छेद में ग्रह चक्र यष्टि को
घुसा देंगे ।
सौम्यारि बाह्यस्थ जनेन सैव प्रचालिता चेद्वलयाभगर्ते
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