सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३७
चन्द्र तथा उससे शर निकालेंगे। इस शर और समपर्वकालिक शर के अन्तर का
विकला का वर्गकर
अर्द्धान् मूल मिहादि पर्व शरतः संशोध्य शेषः स्फुटः
स्याद् बाण स्तत आगते स्थिति दले स्यानां समेविस्फुटे
ग्रासो दृक् समता मुपैतित ततः स्पर्शादयःस्युः सकृत्
पश्चाद् या कथमिष्यते धरणीभा सा दृक् समा गृह्यताम् । ४५ ।
उसका आधा करते हैं और वर्ग मूल निकालते हैं। इस मूल को समपर्व
कालीन शर से घटाने पर स्फुट शर होता है। इससे पहले की तरह स्थिति काल
निकालते हैं। इस शर से जो ग्रास आदि का समय आता है वह दृक् सिद्ध होता
है। इस शर से स्पर्श आदि समय एक ही बार में स्फुट हो जाते हैं। अब जो
भूछाया कही जा रही है वह दृक् सिद्ध छाया है। (पहले की भूछाया स्थूल थी।)
अथेष्ट कालाद् ग्रसनं प्रमाणं ग्रासाद भीष्टात्समयं प्रवक्षे ।
पूर्वत्रभागे ग्रहणेष्ट नाड़ी स्थित्यर्द्धतः प्रोज्भ्य ततोऽवशिष्टैः । ४६ ।
अब इष्ट काल से ग्रास तथा ग्रास को देख कर समय निकालने की विधि
कही जाती है। मध्य ग्रहण से पूर्व का समय होने से उसको स्पर्श स्थिति अर्द्ध
से घटाते हैं।
दण्डैर्निहन्याद् ग्रहकाल हारं षष्ट्यां भजेत्कोटिकलाविधोः स्युः
भानोर्ग्रहे कोटि कलाश्च मध्य स्थित्यर्द्ध निघ्ना स्फुट लम्बनोत्थैः । ४७ ।
शेष दण्ड आदि को ग्रहकाल हार (सूर्य ग्रहण में ग्रह काल का हार वर्णित
है) से गुणा कर ६० से भाग दें। यह चन्द्र ग्रहण में कोटि कला होगी। सूर्य
ग्रहण में इसको पुनः मध्य स्थिति अर्द्ध से गुणा कर स्फुट स्थिति अर्द्ध से भाग
देने पर स्फुट कोटि कला आती है।
स्थित्यर्द्धदण्डै र्विहताः स्फुटाः स्युः तत्काल विक्षेप कला भुजोऽत्रे
दोः कोटि वर्गैक्य पदञ्च कर्णस्तदून मानैक्य दलं पिधानम् । ४८ ।
उस समय के शर के भुज की कला बनायेंगे। कोटि और भुजकला के वर्ग
का योग कर उसका वर्ग मूल निकालें। यह कर्ण होगा। उसे बिम्ब मान योग
के आधे से घटाने पर ग्रास मान निकलेगा।
भागे परस्मिन् ग्रहणस्य मोक्ष स्थित्यर्द्धतः स्वेष्ट घटी विशोध्या
शेषो रवीन्दु स्फुट सूक्ष्म भुक्त्यन्त राहतः षष्ठिहतः सकोटिः । ४९ ।
मध्य ग्रहण के बाद मोक्ष स्थिति अर्द्ध में यदि इष्ट काल लिया जाय तो मोक्ष
स्थिति अर्द्ध से इस इष्ट काल को घटा कर रवि और चन्द्र के सूक्ष्म गति अन्तर
से गुणा कर ६० से भाग देने पर कोटि होगा।
:
स् + थ + ि = स्थि
त = त
त् + य = त्य
र् + ध = र्ध
Yes, it literally has an extra 'त': "स्थितत्यर्ध"!
And look at "सन्ताड़ित":
स + न् + त + ा + ड़/द? + ि + त
It has 'ड़' with a dot: "सन्ताड़ित" or "सन्ताडित"?
It looks like "सन्ताड़ित" (or सन्ताडित, in modern Hindi fonts ड़/ड). In Devanagari: "सन्ताड़ित".
Let's check Line 16:
"मध्य स्थितार्द्धेन हताः स्फुटाः स्युः षष्ट्या हताः कोटि कलारवेन्दोः । ५२ ।"
Look at "स्थितार्द्धेन":
स् + थ + ि + त + ा + र् + द्ध + े + न = स्थितार्द्धेन.
Yes!
"कलारवेन्दोः" - कला-रवेन्दोः.
Let's check Line 20:
"भुक्त्यन्तराप्ता फल नाड़िकाभिः स्थित्यर्द्धमूनं सद धीष्ट नाड्यः."
Wait, look at "सद धीष्ट":
स + द (sad) space ध + ी + ष + ् + ट (dhīṣṭa) -> "सद धीष्ट" or "यदभीष्ट"?
Wait!
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३९
सूर्य ग्रहण में वलन (संशोधन) कला के बारे में कहता हूँ । इन दोनों प्रभावों के
कारण आकाश के पूर्व पश्चिम कपाल (क्षितिज के ऊपर आकाश गोलार्द्ध के
याम्योत्तर वृत्त द्वारा दो भाग) में ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष की दिशा का
ज्ञान होता है ।
चलांश संस्कार वदर्क चन्द्रयोः स्वकोटि
लिप्ता खमहीन्द्र (१४१०) ताड़िताः ।
खखाब्धि बाणै (५४००) विहृता स्ततः
फलं कलात्मकं स्याद्वलनं स्वमायनम् । ५६ ।
चन्द्र ग्रहण में अयन संस्कृत चन्द्र और सूर्य ग्रहण में अयन संस्कृत सूर्य की
कोटि कला को परम क्रान्ति (१४१०) से गुणा कर तीन राशि की कला (५४००)
से भाग देने प्राप्त फल कला आयन वलन होता है । जिस दिशा (पूर्व या पश्चिम
कपाल) में यह ग्रहण होता है । उसी दिशा में यह वलन होता है ।
हिमांश भान्वोः स्वदिनार्द्धतोनतं पलात्मकं खांक (९०) हतं दिनार्द्धजै
निजैः पलै र्भाजितमंश कादिकं नतः पुरः पश्चिमजं दिनार्द्धयोः । ५७ ।
(सूर्य ग्रहण में रवि और चन्द्र समान होने के कारण केवल चन्द्र द्वारा दोनों
ग्रहों का आयन वलन निकाला जा सकता है ।)
चन्द्र ग्रहण में चन्द्र दिनार्द्ध से नत और सूर्य ग्रहण में सूर्य दिनार्द्ध से नत
निकाल कर उसका पल बनायेंगे । उसको ९० से गुणा कर अपने अपने दिनार्द्ध
पल से भाग देने पर अंशादि फल आता है । यह पूर्व पश्चिम दिनार्द्ध के अनुसार
पूर्व या पश्चिम दिशा में नत होगा ।
निजाक्ष भागा गत भाग ताड़िता नवत्य (९०) वाप्ताः फलमेष सम्भवम्
पुरो नतेस्याद् वलनं तदन्तरं गते च पश्चाजनितेहि दक्षिणम् । ५८ ।
इस नत को अपने देश के अक्षांश से गुणा कर ९० से भाग देकर जो फल
आयेगा वह पूर्वनत में उत्तर और पश्चिम नत में दक्षिण अक्ष वलन होगा ।
तयोः पलोत्थायनयोः समांशयोर्युते वियोगात्तु विभिन्नकोष्ठयोः ।
स्वकं भवे दिग्वलनांशकादिकं तदंगुलाज्यं परिलेख इष्यते । ५९ ।
अक्ष और आयन वलन दोनों एक दिशा में होने पर योग और भिन्न दिशा
में होने पर अन्तर किया जाता है । फल चन्द्रग्रहण में चन्द्र का और सूर्य ग्रहण
का सूर्य का अंशादि दिग्वलन होगा । यह स्पष्ट वलन हुआ । स्पर्श, मोक्ष, आदि
किस दिशा से किस प्रकार होगा । इससे मालूम होगा । इसका अंगुल आदि
मान परिलेख में कहा गया है ।
सुरोदितं सूर्य दिनं विधूदया स्तयोस्तु मध्ये दिनमस्य सम्मतम् ।
दिनान्त सिद्धावयनांश संस्कृतौ विधायभास्वच्छशि नौ तु दृक्षयोः । ६० ।
१४० सिद्धान्त दर्पण
सूर्य का दिन परिणाम कहा जा चुका है । चन्द्रम के उदय से उसके अस्त
तक का समय चन्द्र दिन होता है । सूर्य के दिनान्त में रवि और चन्द्रस्फुट कर
उसमें अयनांश जोड़ते हैं । रवि और चन्द्र की अपनी अपनी शशि के
रवे भुक्ताः शशिनो गता लवा निजोदयाघ्नाः खगुणे (३०) हृता फले
तदन्तरो त्थास्त नवश्वषट् शरा (५६) सवश्व युक्ता घटिका ऽह्वये । ६१ ।
रवि का भाग्यांश तथा चन्द्रमा भुक्त अंश उन राशियों के उदयासु से गुणा
कर ३० से भाग देंगे । जो दो उदयासु आयेंगे उनमे रवि राशि से चन्द्रमा की
राशि के बीच की राशियों के उदयासु जोड़ेंगे । योगफल में ५६ असु जोड़कर
३६० से भाग देकर घटिका बनायेंगे ।
दिनादिवस्तत्र भवेद् विधूदय पदद्युर र्कोदय कालिकौ स्तया
विधाय सूर्यस्य सषड्भ शीतगो समेग्रह भुक्त लवोदयन्तरम् । ६२ ।
सूर्योदय से इतनी घटिका के बाद चन्द्रमा का उदय होगा । चन्द्र अस्त काल
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४१
याम्यायनान्त हरति ध्रुवतो यदेव
स्थानं दलोन कृत बाहु (२३।३०) तवान्तरस्थम् ।
तत्प्रोदितं ध्रुव कदम्ब इति ग्रहाणां
क्रान्ते स्तदुत्तर दिशो निरचापि चिह्नम् । ६६ ।
उत्तर की ध्रुव से दक्षिण अयन को तरफ अयन प्रोत वृत्त (वृहद् वृत्त जो
क्रान्ति वृत्त के सबसे दक्षिणी विन्दु तक जाता है ) पर (२३° ३०') दक्षिण की
तरफ ग्रहों का (क्रान्ति वृत्त जिसमें ग्रह घूमते हैं) ध्रुव कदम्ब होता है । यह क्रान्ति
वृत्त का उत्त दिशा में पृष्ठ केन्द्र है ।
तद् व्यस्त दिग् विनिहितो समदिक् कदम्ब
स्तर्क्यः कदम्ब दनुजादिशिखः कलम्बः ।
तत्पार्श्व को ह्यपम सम्मुख एव बिम्ब
प्राग् याति सर्वस्व शशिनेऽविलम्बः । ६७ ।
क्रान्ति वृत्त से उल्टी (दक्षिणी) दिशा में पृष्ठ केन्द्र जो दक्षिणी ध्रुव से अयन
प्रोत वृत्त पर उतना (२३° ३
[१४२] [सिद्धान्त दर्पण]
और नत अंश द्वारा क्रमश आयन और अक्ष वलन करना चाहिये ।
अष्टादशांगुल गुण प्रमणेन वृत्त द्वन्द्वं
पुरन्दर जलेश दिशोर्विलिख्य
अन्याऽन्य लग्नमनतोन्नत भूप्रदेशे
तत्केन्द्रयोः प्रतिदिशंञ्च दिशैव बिन्दून । ७० ।
परिलेख लिखने के स्थान को समतल (जल के समान) कर उसमें एक वृत्त
(१८ अंगुल व्यासार्द्ध का) बना कर वृत्त परिधि में दिशा ज्ञान विधि से दो बिन्दु
देते हैं । (पूर्व और पश्चिम) इन बिंदुओं से १८ अंगुल व्यासार्द्ध का परस्पर सटे
हुए दो वृत्त खींचते हैं । इन दोनों वृत्तों के प्रति दिशा और कोण का विन्दु देते
हैं ।
मध्ये पुरः पर गतां निद धीत रेखां
प्राङ् मण्डलात् बहिरुदग् दिशि चांगुलान्ते
बिन्दून्तथा वरुण दिग्गत मण्डलस्य बाह्येऽ
ङ्गुलान्तरित दक्षिण भाग केऽन्यम् । ७१ ।
दोनों वृत्तों के केन्द्र से होकर पूर्वा पर (पूर्व पश्चिम) रेखा खींचते हैं । पूर्व
बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के उत्तर बिन्दु से और उत्तर एक अंगुल की दूरी पर
एक बिन्दु तथा पश्चिमी वृत्त के दक्षिण बिन्दु से १ अंगुल दक्षिण एक बिन्दु देते
हैं ।
बाह्यस्थ दक्षिण गविन्दुत एव पश्चात्
पुरश्चरम बिन्दुग कोटि युग्मम् ।
षष्ठांश संयुत रसाक्षि (१६।१०) मितांगुलेन
सूत्रेण चाप मथ पूर्वग बिम्बमध्ये । ७२ ।
ग्रह बिम्ब पश्चिम कपाल में रहने पर दक्षिण बिन्दु से १६।१० अंगुल व्यासार्द्ध
का पश्चिम वृत्त में तथा पूर्व कपाल में रहने पर पूर्व वृत्त के बाहर उत्तर बिन्दु से
१६।१० अंगुल का चाप पश्चिम वृत्त में खींचतेहैं ।
तद् वद् वहि र्विलिखतोत्तर बिन्दुतो ऽपि चापं लिखेत्परपुरोगतविन्दुलग्नम्
चापद्वयं भवति सम्मिलितं कपाल-द्वन्द्व स्थिता पम पथप्रतिम द्वयान्तः । ७३।
इन दोनों चापों से पूर्व और पश्चिम कपाल में क्रान्तिवृत्त का आकार बनेगा ।
प्रत्यग् दिशो हरिदिगन्त मथार्क (१२)
संख्यैश्चिह्नः क्रियादिनिलयान्कलयेन्निजांशैः
तत्रार्द्ध खण्डिततनुं शशिनं निवेश्य
तच्छृंगयुग्म परिलग्न गुणेन भूयः । ७४ ।
दोनों चापों के मिलन के जो क्रान्ति वृत्त बनता है । उसमें पश्चिम से पूर्व १२
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४३
भाग कर मेष आदि राशियों का चिन्ह देंगे । क्रान्तिवृत्त से चन्द्र केन्द्र उस राशि
में रखकर अर्द्ध खण्डित चन्द्र बिम्ब बनाते हैं । इसके दोनों श्रृंगों को मिलाते हुए
एक रेखा खींचते हैं ।
बाह्यास्थ बिन्दु परिवेष्टन कं विदध्यादित्थं
निजापमपथा भिमुखः खगः स्यात्
प्राग् वृत्त केन्द्र यमदि गोत्तर रेखिकाया
पश्चाद् भ्रमं प्रवहजं विषुवद्दिनोत्थम् । ७५ ।
श्रृंगों को मिलाने वाली रेखा (चन्द्र व्यास) के बराबर व्यास से दोनों बाहरी
बिन्दुओं के केन्द्र से वृत्त खींचेंगे । इससे चन्द्रमा अपने क्रान्ति मार्ग पर चलता
हुआ लगेगा । पूर्व बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के केन्द्र से जाती दक्षिणोत्तर
रेखा पर (याम्योत्तर वृत्त पर )
व्यक्षोत्तरे वसुभुजानल (३२८) योजनस्थे देशेऽगच्छत धनः पथ सम्मुखीनम् ।
तस्मान्नतस्य पलजेवलनेन जीवा ग्राह्यानोत्थ वलनेऽपिन कोटि जीवा ।७६।
निरक्ष (विषुव रेखा) से ३२८ योजन उत्तर (२३° २७' अक्षांश - कर्क रेखा)
के स्थान पर क्रान्ति वृत्त की पूर्व से पश्चिम गति चाप आकार में ही (विषुव दिन
को) दिखाई देगी । यह वास्तव में सीधी रेखा (गोल पर) है जो समतल के चित्र
में वक्र दिखायी देती है अतः अक्ष या आयन वलन में ज्या या कोटिज्या की
जरूरत नहीं है ।
मध्यसूत्रादुदिग् दक्षिणान्तावधि ज्यात्मकं मानमेवात्र निश्चीयते ।
मध्यसूत्रादवः क्रान्तिमार्गान्तरं क्रान्ति जीवाक्ष जीवातु के न्द्रोद् भवेत् ।७७।
पूर्व पश्चिम वृत्तों की ज्या रूप रेखा, वृत्त की परिधि तथा दोनों ध्रुवों के बीच
सभी याम्योत्तर रेखाओं पर लम्ब है । अतः इस रेखा पर पूर्व से पश्चिम (मध्य सूत्र
से दूरी से क्रान्ति ज्या का मान होता है (यह अक्षांश वृत्त हुआ) अतः क्रान्ति ज्या
पूर्व पश्चिम रेखा (वृत्त केन्द्र से) की दूरी से निकाली जाती है । इसी प्रकार अक्षज्या
उत्तर दक्षिण रेखा (देशान्तर रेखा) पर की दूरी से निकाली जाती हैं ।
स्फुरति धरणी भाया बिम्ब बाह्ये समन्ता
द् वलय सदृश मस्या अञ्चलं पञ्च लिप्तम्
तद वतमस संज्ञयं तत्कुभाक दिक् (१०) कलाढ्या
मलिनयति सितांशो रन्तम ग्रस्तमूर्तेः । ७८ ।
(चन्द्र कक्षा में ) पृथ्वी की छाया के चारों ओर ५ कला अवतमस (कम
अन्धकार वाली छाया) होती है । इसको जोड़ने पर भूभा (पृथ्वी की छाया) का
व्यास १० कला अधिक होता है । १० कलायुक्त भूछाया चन्द्रमा को (ग्रहण के
अतिरिक्त) अन्य समय भी ढंकती है (इस समय ग्रहण नहीं दिखता है पर चन्द्रमा
का प्रकाश कुछ मन्द होगा)
ग्रहण-द्वय प्रकाश: चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण सूक्ष्म-साधन (अध्याय ९-१२)
१४४ सिद्धान्त दर्पण
अथ त्रिभाग स्तमसो विपूर्वतः कुभान्तलग्नोऽपि घनस्तमस्तया
मतस्तदाढ्या क्रियतं तमोमितः पुनर्विधोरन्तर दूरवृत्तिजात् । ७९ ।
पृथ्वी की छाया से लगा अवतमस का १/३ भाग अत्यन्त काला है अतः मुख्य
छाया से मिल जाता है। अतः भू छाया बिम्ब में अवतमस का १/३ भाग (अर्थात्
१०/३ कला) जोड़कर बिम्ब मान गिना जाता है। चन्द्रमा पृथ्वी से दूर या निकट
होने पर भी उस कक्षा में पृथ्वी की छाया में अन्तर होता है ।
तमः क्षयर्दीक्षणतः क्रमेणत द्वनर्णगत्यादिफलाष्ट दो (२८) र्लवः
वियुक्त युक्त स्तमसीति तत् स्फुटं भवेत्ततः स्पष्टतमः शशिग्रहः । ८० ।
भू छाया बिम्ब का परिणाम रवि के पात के निकट रहने पर घटता है और
पात से दूर (९०°) जाने पर बढ़ता है। अतः रवि गति फल का १/२८ भाग छाया
बिम्ब में घटाया या जोड़ा जाता है (मध्य मान से)
विधोर्मानं तस्मात् शरगुण (३५) हतं विश्व (१३) विहृतं
पुनः सूर्य स्वर्णाभिध गतिफलाद्धौ नित युतम् ।
तमोमानं तत् स्यदिति नयन सिद्धं शशिनिति
प्रभृत्युक्तं पूर्वं मतमिद मुथा देय मखिलात् । ८१ ।
अतः चन्द्र बिम्ब कला को ३५ से गुणा कर १३ से भाग देते हैं । फल में
सूर्य गति फल (धन या ऋण) क्रम से घटाते या जोड़ते हैं (उल्टे क्रम से) इससे
भूछाया का दृक् सिद्धमान आयेगा) चन्द्र बिम्ब का कला मान निकालने की विधि
पहले कही जा चुकी है। यह रीति अत्यन्त उपयोगी और स्मरण करने लायक
है।
कक्षायां शशिन स्तिरोहिततनोःस्याद् गोल केन क्षिते
र्भानो र्यावदनीक्षणं भवति तन्मानं कुभा यद्यपि ।
दृष्टेऽर्कस्य नखां (२०) शकेऽपि परित श्छाया समेवेक्ष्यते
मध्येन्दोः पथि दूर सन्निधि जुषोऽनल्पल्प सूर्यांशयोः । ८२' ।
पृथ्वी सूर्य के चारों और घूमने के कारण पृथ्वी की छाया घूमती है, चन्द्र
कक्षा में इसके मान के अनुसार ही वहां पर के बिम्ब को ढंकता है। अतः चन्द्र
कक्षा में ही इसका मान लिया जाता है। सूर्य से दूरी घटने बढ़ने के कारण बिम्ब
छाया में १/२० भाग का अंतर आता है। चन्द्रमा की दूरी घटने बढ़ने से भी
चन्द्रकक्षा में इस बिम्ब मान में अन्तर आता है। पर यह सूर्य के अन्तर की तुलना
में अत्यन्त कम होने के कारण इसकी गणना नहीं होती ।
. अत्रायं गणित क्रमः स्वदश भागो ( ७२००) नार्क
बिम्बः (६४८००) क्षिति व्यासो (१६००) नः
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४५
(६३, २००) शशि मध्य कर्ण (४८७०५) गुणितः
(३०७,८१,५६,०००) स्पष्टार्क कर्णोद्धृतः
लब्धो नाक्षिति विस्तृतिः शशभृतः कक्षागतक्ष्माप्रभा
मानं स्या त्रिगुणा (३४३८) हतं स्फुट शशिश्रुत्याप्त मेतत्कलाः । ८३ ।
अब भूभा गणना की विधि दी जाती है । सूर्य बिम्ब व्यास से उसका १/१०
घटाकर (७२,०००-७,२०० = ६४,८००) उससे भूव्यास (१६०० घटाते हैं )
(६४,८००-१,६०० = ६३,२००) इसको मध्यम चन्द्र कर्ण (४८,७०५) से गुणा कर
(३,०७,८१,५६,०००) स्पष्ट सूर्य कर्ण से भाग देते हैं । फल को पृथ्वी व्यास से
घटाकर चन्द्र कक्षा में पृथ्वी छाया का बिम्ब मान होगा । इसको त्रिज्या (३४३८)
से गुणा कर स्फुट चन्द्र कर्ण से भाग देने पर पृथ्वी छाया बिम्ब (चन्द्र कक्षा में)
का कला मान होगा ।
तमो बिम्ब व्यासेऽम्बरकृतः (४०) कलो ने स्फुरतियो-
ऽन्तरे वृत्तः सारः सघनतर उक्तोऽन्धतमसम् ।
शरेऽल्पे तस्यान्तः प्रविशति यदा शीत किरण
स्तदातिम्लानः स्यान्निविड़ तम घूमां वृत इव । ८४ ।
पृथ्वी का छाया बिम्ब मान निकाल कर उससे ४० कला घटाने पर पृथ्वी
छाया का अन्धतमस मान होगा । यह अत्यन्त काला है । शरकला बहुत कम
होने पर चन्द्र इस अन्धतमस में प्रवेश कर अविम्लान या अति काला दिखता है ।
ग्रस्तेऽल्पीयसि भाग के सितरुचो वर्णो नभः साम्यभा-
र्गल्पे धूम निभो दले कवलिते कृष्णोऽर्द्ध भागधिके
रक्त श्याम रुचि र्भवेच्च सकल ग्रासक्षणे पाटलो ।
भू भा मध्यगतस्य पिङ्गल रुचि र्भानोः सदैवासितः । ८५ ।
अति अल्प चन्द्र ग्रहण होने से ग्रस्त आकाश नीला पड़ जाता है । अर्द्ध
ग्रहण में काला दिखता है । आधा से अधिक ग्रहण में लाला काला दिखता है ।
पूर्ण चन्द्र ग्रहण में ग्रस्त अंश पाटल पड़ जाता है । पृथ्वी छाया के बीच में चन्द्र
रहने पर उसका रंग पीला हो जाता है । सूर्य ग्रहण में यह सब नहीं होकर हर
समय ग्रस्त अंश (चन्द्रमा) काला दिखता है ।
क्षुद्रक्षपाकर त्वनुः क्षयितार्द्ध बिम्बो
भानुर्भवेन्निशित शृंग युगोऽतिनिम्नः
चन्द्रोऽर्द्ध खण्डित तनु स्तमसो महत्वा
दीषद् गभीर इव कुण्ठित शृंग युग्मः । ८६ ।
सूर्य बिम्ब की तुलना में चन्द्र बिम्ब हमेशा छोटा होता है । अतः सूर्य ग्रहण
के अर्द्धग्रास के समय सूर्य शृंग तीक्ष्ण होता है । पर चन्द्र ग्रहण में चन्द्र बिम्ब की
तुलना में पृथ्वी छाया का बिम्ब बड़ा होता है । अतः चन्द्र के अर्द्ध ग्रास के समय
१४६ सिद्धान्त दर्पण
शृंग मोटा दिखता है । छोटे वृत्त में बड़े वृत्त से काटने के कारण ऐसा होता है ।
अकृत कृतक राहुं यस्तमस्त्वात् कुभारूपं
विशति शशिनितस्मिन् नागमैर्दीक्षितानाम् ।
वितरति मन्त्रसिद्धि यश्च सद् वैष्णवानां
सदिशतु कुशलं नः श्याम शैलावनीशः । ८७ ।
कृष्ण वर्ण होने के कारण पृथ्वी की छाया राहु के समान है जिसमें चन्द्र
प्रवेश करने के समय नीलाचल वैष्णवों और तान्त्रिकों को मन्त्र सिद्धि देते हैं, वे
हम लोगों का मंगल करें ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृते गणितेऽसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
चन्द्र ग्रहोऽष्टम इतः सुभगः प्रकाशः । ८८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
और फल में समानता तथा बच्चों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण में चन्द्र
ग्रहण के विस्तृत विवरण सहित आठवां अध्याय समाप्त हुआ ।
नवमः प्रकाशः
सूर्य ग्रहण वर्णनम्
पूर्व प्रकाश उदितम् ग्रहणद्वयस्य साधारणं सकल कर्मरवि ग्रहेतु
यल्लम्बनावनतिकर्म ततोऽविशिष्टं मानान्तरञ्चशशिनस्तिदिह प्रवक्षे । १ ।
पिछले प्रकाश में चन्द्र और सूर्य दोनों के ग्रहण की सामान्य चर्चा हुयी है ।
लेकिन इसके अतिरिक्त सूर्य ग्रहण में लम्बन तथा नत निकालने की आवश्यकता
होती है तथा चन्द्र का बिम्बमान भी सूर्य ग्रहण के लिए दूसरा होता है । अतः
इन तीन बातों की विशेष व्याख्या इस अध्याय में होगी ।
दर्शान्तगौ समकलौ क्षितिगर्भसूत्र,
स्युतावपि द्युमणि चन्द्रमसौ न पश्येत्
यद्रोल पृष्ठ गतमानव एक सूत्रे,
सार्द्धान्यतोऽवनति लम्बन सम्भवोस्यात् । २ ।
अमान्त में रवि और चन्द्र दोनों की राशि अंश कला आदि समान होने पर
भी केवल मध्याह्न समय में एक सीध में दीखते हैं । अन्य समय पृथिवी केन्द्र तथा
पृष्ठ के सूत्र में वे नहीं दीखते हैं । अन्य समय में ऐसा क्यों और कब होता है ।
यह इस अध्याय में कहा जायेगा । आकाश में मध्य क्षेत्र में सूर्य चन्द्र रहने पर
लम्बन और नत (केन्द्र तथा पृष्ठ से दिशा में अन्तर) नहीं होता है ।
सूक्ष्मेन्दु सूर्य जनित स्फुट दर्शनाशो
यस्मिन् सकाल उदितः समपर्व नामा
तत्संस्कृतः स निजलम्बनानाड़िका द्यै
र्भास्वद् ग्रहच्छदन मध्य इहस्फुट स्यात् । ३ ।
रवि और चन्द्र को स्फुट करने पर उससे जो स्फुट दर्शान्त होगा उसी को
समपर्व काल कहा जाता है । इस समपर्व काल में लम्बन संस्कार करने पर वह
सूर्य ग्रहण में ग्रास मध्यकाल होता है । यही स्फुट अमान्तकाल होता है ।
एकानतिश्चन्द्र मसोऽपिसूर्यात् प्राक् पश्चिम्स्ते द्विह लम्बनाख्या
याम्योत्तरस्थेऽवनितिः स्वमध्य स्थिते सितांशौ न हिते भवेताम् । ४ ।
अमान्त काल में सूर्य से चन्द्र की दिशा में अन्तर होता है उसे ही लम्बन
कहते हैं । यह अन्तर (पृष्ठ देश से देखने के कारण) पूर्व पश्चिम दिशा में होने पर
लम्बन कहलाता है । दक्षिण उत्तर दिशा में होने पर इसका नाम नत कहलाता
है । आकाश मध्य में रविचन्द्र दोनों रहने पर दोनों का केन्द्र से जो सूत्र है उसी
पर पृष्ठ देश रहता है अतः लम्बन या नत नहीं होता ।
सलम्बनं वित्रिभ लग्न तुल्ये भवेद् विधौवित्रिभ लग्न जाते
सौम्यापमे स्वाक्ष समान भाग सम्भवे ञ्चावनति र्हिमांशोः । ५ ।
१४८ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र वित्रीभ (दशम लग्न) समान होने पर स्फुट लम्बन नहीं होता है। वित्रीभ
लग्न की उत्तर क्रान्ति देश के अक्षांश के समान होने पर चन्द्र का नत भी नहीं
होता।
त्रिभोन लग्नोदगपक्रमेक्षोऽधिके च सौम्यानत रन्यथा सौ
याम्या भवेत् पर्वणि चन्द्र भान्वोः साम्या न्नतो ते रवितः सुसाध्ये । ६ ।
वित्रीभ (दशम) लग्न की उत्तर क्रान्ति अपने अक्षांश से अधिक होने से चन्द्र
की उत्तर नति होती है। वित्रीभ लग्न की उत्तर क्रांति अक्षांश उत्तर से कम हो
या दक्षिण क्रान्ति हो तो दक्षिण नति होती है।
अमावास्या में चन्द्र और सूर्य की राशि आदि अवयव समान होने के कारण
नति (उत्तर और दक्षिण दिशा) से ही साधन करना सुविधाजनक है।
तात्कालिकाकार्त् समपर्वलग्नमानीय तस्मात् सदन त्रयोनात्
क्रान्तिं समानीय निजाक्ष भागैस्त्याग योगौ पृथगेक दिक्त्वे । ७ ।
स्फुटाधिकार के नियम से तात्कालिक रवि का साधन कर उससे समपर्व
काल का लग्न निकालेंगे। उससे ३ राशि घटाकर (वित्रीभ) लग्न से पुनः क्रान्ति
साधन होगा। यह क्रान्ति और अक्षांश भिन्न दिशा में होने से अन्तर और एक
दिशा में होने से योग होगा।
कार्यावितस्यु स्त्रिभहीन लग्न नतांशकास्ते नवते र्विशोध्याः
शेषो भवत्युन्नत भाग संह क्रमज्यकास्य स्फुट दृग् गति स्यात् । ८ ।
फल वित्रीभ लग्न का नतांश होगा (उसको ३ राशि (९०°) से घटाने पर
वित्रीभ का उन्नतांश होगा। इस उन्नतांश की क्रमज्या को ही स्फुट दृग् गति
कहा जाता है।
विश्वम्भरा गोल दलं रविन्दोः कक्षागतं कल्पित मुक्तरीत्या
लिप्तीकृतं चे त्परमे नतीस्त स्तदन्तरं चान्य नति र्ग्रहे स्यात् । ९ ।
सार्द्ध योजन को रवि और चन्द्र कक्षा में मान कर उसकी कला निकालने
पर वह कुच्छन्न कला होती है। इतना ही क्रमशः रवि और चन्द्र की परम नति
होती है। इन दोनों नतिका अन्तर सूर्यग्रहण में परम नति होती है।
यद् वार्क भुक्तेः कृतभूप (१६४) भागः शक्रांश (१४) ऋक्षे शगतेर्नति
स्यात् परातयो रन्तर जा विलिप्ता श्रन्द्रार्क गत्यान्तर लिप्तिकाप्ताः । १० ।
सूर्य की दैनिक गति
सूर्य परम नति = ——————————
१६४
चन्द्र की दैनिक गति
चन्द्र परम नति = ——————————
१४
रवि और चन्द्र की परम नति के अन्तर की विकला बनाकर उसमें रवि और
सूर्य ग्रहण वर्णनम् १४९
चन्द्र की गति के अन्तर की कला से भाग देने पर दण्ड आदि परम लम्बन होगा ।
नाड्यादिलब्धं स्फुट दृग् गतिघ्नं राशित्रयज्या विहृतं फलञ्च
अन्त्यं भवेल्लम्बन नाड़िकाद्यं तत्प्राणतो ज्या पर संज्ञका स्यात् । ११ ।
दण्ड आदि परम लम्बन को इष्ट काल के वित्रीभ शंकु (दृग् गति ) से गुणा
कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर यह लम्बन का अन्त्या होता है । इसका असु
बनाकर उस की ज्या को पर कहा जाता है ।
शताहता भूप भुजै (२१६) विभक्ता सादृग् गतिर्लम्बन कृत्यरोवा
त्रिभोनतग्नोष्ण करान्तरोत्था दोर्ज्या परघ्नी त्रिगुणे ( ३४३८) हृताचा । १२ ।
स्फुट दृग् गति (विचित्र शंकु) को (१००) से गुणा कर (२१६) से भाग देने
से भी यही 'पर' आयेगा अब वित्रीभ लग्न तथा रवि की अन्तर ज्या को पर से
गुण कर त्रिज्या से भाग देने पर-
स्याल्लम्बन ज्या फल मस्य चापं प्राणात्मकं लम्बन मेतदर्के
त्रिभोन लग्नात् पर पूर्व दिक् स्थे क्रमाद् युतोनं समपर्व काले । १३ ।
लम्बन ज्या होती है । इसका चाप (असु या प्राण में) स्फुट लम्बन है ।
वित्रीभ लग्न से सूर्य पश्चिम (कम राशि होने पर लम्बन को समपर्व काल में
जोड़कर या सूर्य से पूर्व (वित्रीभ लग्न का राशि अंश सूर्य से कम होने पर)
समपर्व काल से उसे घटाकर स्फुट समपर्व काल बनाते हैं ।
तत्काल सम्भूत रवि त्रिभोन लग्नो नत ज्या पर मौर्विकाभिः
अर्क त्रिभोनान्तरतोऽपि भूयस्तल्लम्बनं पूर्ववदेव साध्यम् । १४ ।
इस प्रकार स्फुट समपर्व काल से स्फुट रवि और वित्रीभ लग्न निकालते
हैं । तथा उसके अन्तर से पुनः पहले की तरह लम्बन का साधन करते हैं ।
तत्संस्कृतात् तत्समपर्व कालात् पुनर्नतादौ रवि लम्बनञ्च
स्थिरेऽसकृत्कर्म वशादि हेतत् संस्कार योग्यं स्फुट लम्बनं स्यात् । १५ ।
इस प्रकार बार बार करने पर दो पर्वकाल के बीच अन्तर नहीं रहने पर वह
स्फुट पर्व सम काल होगा । दो लम्बनों के बीच भी अन्तर नहीं रहने पर वह
स्फुट लम्बन कहा जायेगा ।
वक्ष्ये सकृल्लम्बन कर्मसूक्ष्म लग्नार्क यो रन्तरतः प्रसाध्ये
दोः कोटिजीवे परबाहु जीवान्तरस्य वर्गाद्युत कोटिवर्गात् । १६ ।
एक बार में सूक्ष्म लम्बन निकालने की विधि अब मैं कहता हूँ । सम पर्व
काल के लग्न तथा रवि निकाल कर दोनों के अन्तर की भुजज्या ओर कोटिज्या
निकालें ।
१५० सिद्धान्त दर्पण
पूर्व श्रुतिः कोटिगुणा त्परघ्नात् श्रुत्या हृताद्यत्फलमस्य चापः
मध्यो भवेल्लम्बन जासु संघस्थ त्संस्कृता मान्तज दृग् गतिघ्नः । १७ ।
पहले कहे गये परज्या और भुजज्या के अन्तर का वर्ग तथा कोटिज्या का
वर्ग जोड़कर उसका वर्ग मूल लेने से कर्ण होगा । कोटिज्या को ‘पर’ से गुणा
कर लम्बन का कर्ण से भाग देने पर मध्यम क असु आता है । इस मध्यम लम्बन
में से समपर्व काल का संस्कार कर उसका की दृग् गति से मध्यम लम्बन का
गुणा करेंगे । तथा
स आद्यया दृग् गति जीवयाप्तो विस्पष्ट तां गच्छत भास्करोक्त-
किन्त्वेषमध्यादधिको यदिस्यात्तदा स्वमध्यान्तर जा सुवर्गात् । १८ ।
आद्य दृग् गति से भाग देने से स्फुट मध्यम (भास्करोक्त) लम्बन आता है ।
यह मध्यम लम्बन से अधिक होने पर दोनों के अन्तर असु से वर्ग को-
द्वाभ्या हतान्मध्यम लम्बनामात् फलेन युक्तः करणीय एव
तल्लम्बनं भूयइनेन्दु मध्य गत्यन्तर (७३१) घ्नं प्रथमेन्दु भान्वो । १९ ।
दो से गुणा कर मध्य लम्बन से भाग देकर लब्धि को मध्य स्फुट लम्बन में
जोड़ेंगे । इस प्रथम और द्वितीय स्फुट लम्बन से किसी को लेकर उसे रवि और
चन्द्र की मध्यम गति के अन्तर ( ७३१) से गुणा कर प्रथम स्फुट चन्द्र तथा रवि
के
गत्यन्तरेणोद् धृत मेव कार्य द्विधोदितं स्पष्टतमं भवेद्धि ।
परिष्कृतो लम्बन नाड़ि काद्यै दर्शान्त एव स्फुट पर्वनामा । २० ।
गति अन्तर से भाग देंगे । इससे भास्करीय स्फुट लम्बन अति स्फुट होता
है । इसी प्रकार स्फुट लम्बन नाड़िका द्वारा पहले की भांति दर्शान्त का संस्कार
करने से स्फुटतम पर्वकाल आता है ।
षड् भै (२७६) र्हता लम्बन सिद्ध काल लग्नस्फुटाक्र्कान्तर कोटि जीवा
त्रिज्या हतं दृग् गति ताड़िताप्ता त्रिभज्य या लम्बन जा विनाड्यः । २१ ।
(अथवा) स्फुट पर्व काल के स्फुट लग्न और रवि मिल कर दोनों के अन्तर
की कोटिज्या को (२७६) से दृग् गति से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर लम्बन
की विनाड़ी आती है ।
भवन्तिताः प्राग्व दिनेन्दु मध्य गत्यन्तर (७३१) घ्नाः स्फुटजान्तराप्ताः
काले स्फुटे योग वियोग वाम्यात् परिष्कृताश्चेत्सम पर्वकालः । २२ ।
इस लम्बन विनाड़ी को पहले की तरह रविचन्द्र के गति अन्तर ( ७३१) से
गुणा कर दोनों के स्फुट गति अन्तर से भाग देने पर प्राप्त फल से स्फुट पर्व का
विपरीत संस्कार करने से समपर्व काल होगा ।
सूर्य ग्रहण वर्णनम् १५१
इत्थं प्रसाध्य ग्रहमध्यकालं चन्द्र ग्रहेया स्थित खण्ड सिद्धयै
अन्त्या स्फुटा चन्द्र गतिः पुरोक्ताः तयाहतं लम्बन नाड़िका द्यम् । २३ ।
इस प्रकार ग्रह मध्यकाल का साधन करने पर चन्द्र ग्रहण स्थित्यर्द्ध जानने
के लिए ग्रहण के लिए उपयोगी चन्द्र की अन्तिम स्फुट गति (पहले दिया गया
है-षष्ठ अध्याय में ) निकाल कर उसमें लम्बन स्फुट घटिका को गुणा करेंगे।
षष्ट्याप्तमेतत् फलहीन युक् चेत् प्रोक्त पर्व जार्कः स्फुट शीतगुः स्यात्
पातो दिगंशाक्ष फलेन सिद्धः कार्यस्तदूनात् शशिनः शरश्च । २४ ।
गुणनफल को ६० से भाग देकर लब्धि को समपर्व काल के सूर्य में जोड़ेगे
या घटायेंगे जिस प्रकार लम्बन का करते हैं। चन्द्र पात का दिगंशफल से संस्कार
उसे स्फुट चन्द्र से घटाकर शर निकालेंगे।
आनीय भानो स्फुट पर्व लग्नं त्रिभोन लग्नं तदपक्रमौ च
उदक् शरो ना यमदिक् शराढ्यः स्वदेश जाक्ष स्तुभवेत्
१५२ सिद्धान्त दर्पण
इस वित्रिभ नतासु की उत्क्रमज्या (या नतासु की ज्या को अन्त्या से घटाने
पर प्राप्त इष्ट अन्त्या) निकालें) इसके बाद सप्तम प्रकाश की विधि से छेद, इष्ट
हृति, वित्रिभ शंकु उसकी दृक् ज्या आदि निकालेंगे । दृक् ज्याका चाप वित्रिभ
नतांश होगा । वित्रिभ उत्तर क्रान्ति अपने अक्षांश से उत्तर हो
स्याच्चेद् बहुः सौम्य नतांशकास्तेऽन्यथैव याम्याः शरसंस्कृताःस्युः
दिक् साम्य भेदोत्य युति च्छिदाभ्या तज्ज्याच दृक् क्षेप इति द्विधैक्षाः । ३० ।
तो नतांश उत्तर है अन्यथा दक्षिण होगा । यह नतांश और चन्द्र शर एक
दिशा में होने पर जोड़ा जायेगा नहीं तो अन्तर होगा । फल की ज्या दृक् क्षेप
होगा । इस प्रकार दो तरह का दृक् क्षेप है ।
पृथक् स्थितश्च प्रथमेन्दु भुक्ति फलेन निघ्नकलिकात्मना सः
त्रिज्याहतः कर्कि मृगादिमन्द केन्द्रे स्फुटः स्यात् फल युग्वियुक्तः । ३१ ।
दोनों दृक् क्षेप अलग अलग रखकर उसे कलात्मक चन्द्रगति से गुणा कर
त्रिज्या से भाग देकर फलों को जोड़ते हैं (चन्द्र मन्द केन्द्र कर्क आदि ६ राशि में
रहने पर) या घटाते (मन्दकेन्द्र मकर आदि ६ राशि में है) इसके दृक् क्षेत्र स्फुट
होते हैं ।
द्विधोक योऽत्र कलाल्पनाने ग्रासेऽष्टि चक्षुः (२८) कलिकाधिके च
दृक् क्षेपयो सूक्ष्मतया द्वितीयो ग्राह्योऽन्यथा स्थूलतया पिवाहाः । ३२ ।
दो प्रकार का स्फुट दृक् क्षेप में कहा गया है । १ कला से कम और २८
कला से अधिक ग्राहण ग्राह्य में द्वितीय दृक् क्षेप जो वित्रिभ नतांश से संस्कृत है
लिया जाता है । १ से २८ कला तक ग्रास रहने पर प्रथम दृक् क्षेप लिया जाता
है, जो शराक्ष वित्रिभ क्रान्ति से संस्कृत है ।
मध्यार्क चन्द्रान्त्य नतिद्वयस्य (रवि २१।३८, चन्द्र ५६।२८।१३)
दृक् क्षेप निघ्नं विवरं (५६।६।३५) त्रिभौर्व्या (३४३८)
हृतं नतिस्तत्व यमांश (२२५) हीन दृक् क्षेप
भूतर्क (६१) लवं स्फुटा वा । ३३ ।
मध्यम रवि (३१।३८) और चन्द्र नति (५६।२८।१३) का अन्तर ( ५६।६।३५)को
दृक् क्षेप से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने से फल स्फुट नति होता है । अन्य
विधि-
दृक् क्षेप
दृक् क्षेप - ---------
२२५
स्फुट नति = ----------------------
६१
यह दृक् क्षेप की दिशा में होता है ।
सूर्य ग्रहण वर्णनम् १५३
एकांशयोश्चन्द्र शरावनत्योर्योगः पुनः भिन्नदिशोवियोगात्
शेषोऽधिकांश स्फुट दृक् शरःस्याद् ग्रासादि बिन्दु ग्रह वद् विचिन्त्यः ।३४।
चन्द्र शर तथा स्फुट न ति का समान दिशा में होने पर योग तथा भिन्न दिशा
में होने पर अन्तर करने पर स्फुट शर होता है । जिसका मान अधिक होता है
उसी की दिशा में स्फुट होगा । उससे चन्द्र ग्रहण अध्याय में लिखे नियम के
अनुसार ग्रास तथा स्थिति अर्द्ध का साधन होगा ।
देशेक्वचित्सौम्य शरोधिकै श्वेदक्षा तदाक्षं प्रतिशोध्य बाणात्
शेषः शराक्षो भवतीह सौम्यः सौम्येऽपमे वित्रिभजे ततोऽल्पे । ३५ ।
चन्द्र का उत्तर शर अपने स्थान के आक्षांश से अधिक होने पर शर से अक्षांश
घटायेंगे । शेष को उत्तर शराक्ष कहा जायेगा । वित्रिभ की उत्तर क्रान्ति इस शराक्ष
से कम तथा
स्वाक्षाधिकेऽक्षं परिवर्ज्य तस्माच्छेषा शराक्षाट्य उदंगतः स्यात् ।
सौम्येऽपमे तत्र निपक्षतोऽल्पे तदक्ष लिप्ता विवराच्छराक्षः । ३६ ।
अक्षांश से अधिक रहने पर वित्रिभ की उत्तर क्रान्ति से अक्षांश घटाकर शेष
को शराक्ष में जोड़ने से उत्तर नत होता है । वित्रिभ की उत्तर क्रान्ति अक्षांश से
कम होने पर अक्षांश से यह क्रान्ति घटाकर शेष से शराक्ष
विशोधितो याम्य नतोऽवशेष सौम्यः शराक्षाद् विवरे विशुद्धे
याम्येऽपमे वित्रिभ लग्न जाते स्वाक्षान्वते सौम्य शराक्षतोऽल्पे । ३७ ।
घटाने से शेष दक्षिण नत होगा । शराक्ष से अन्तर घटाने पर उत्तरनत होगा ।
वित्रिभ की दक्षिण क्रान्ति में अक्षांश जोड़ने से वह यदि उत्तर शराक्ष से कम हो
शराक्षतः प्रोज्म्यतदक्षयोगं लिप्तादिकः साम्य नतोऽवशेष
भागल्पकाक्षेषु विशेष एष देशेषु दृश्यो हि कुशाग्रधोभिः । ३८ ।
तो क्रान्ति और अक्षांश के योग को शराक्ष से घटाते हैं । शेष कला आदि
उत्तर नत होगा । एक अंश से अधिक अक्षांश वाले स्थान से ये सब संस्कार
करने के लिए मेरा विद्वानों से अनुरोध है ।
अतः शराक्ष प्रति संस्कृतायाः क्रान्तेः सदा वित्रिभ लग्नजायाः ।
नतांश याम्योत्तर तानुसारा दृक् क्षेप मध्या नतयोऽ खिलास्युः । ३९ ।
अतः प्रायः सभी स्थानों में (विषुवत् वृत्त क्षेत्र को छोड़कर) शराक्ष संस्कृत
वित्रिभ क्रान्ति से नतांश साधन होगा । (उत्तर दक्षिण दिशा में) तथा दृक् क्षेप,
मध्य तथा नत आदि सभी निकलें ।
प्राग् वद्गवेर्मान मथेन्दु मानं साध्यं विधावस्ति कियान् विशेषः ।
सूक्ष्मं तमो मान मतः प्रवक्ष्ये दृक् सिद्धये यद् गदितं न पूर्वे । ४० ।
१५४ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र ग्रहण अध्याय में लिखे गये नियम से रवि और चन्द्र का बिम्ब साधन
होगा । इस प्रकार प्राप्त चन्द्र बिम्बमान को सूक्ष्मतम कैसे किया जायेगा इस की
विधि बतायी जा रही है । यह पहले किसी आचार्य ने नहीं कहा है ।
कर्कादि नक्रादिक केन्द्रकोटिफलेन युक्तत्रिगुण (३४३८) स्वघातात्
मूलेन तद् दोः फल वर्गयुक्ताद् द्विघ्न त्रिजीवा (६८७६) वियुतान शेषः।४१।
चन्द्र का मन्दकेन्द्र कर्क आदि ६ राशि में रहने पर त्रिज्या से उसका कोटिफल
घटायेंगे, अन्यथा (मन्द केन्द्र मकर आदि ६ राशि में रहने पर) त्रिज्या और कोटिफल
को जोड़ेगे । फल के वर्ग को मन्दभुजफल के वर्ग में जोड़कर उसका मूल त्रिज्या
के दो गुणा से घटायेंगे ।
यस्तेन भक्ता त्रिगुणस्यवर्गात् फलं
हि लिप्तामय मन्द कर्णः
त्रिज्याघ्न मध्येन्दु कलात्मबिम्ब (१०७७२४)
स्तत्कर्ण भक्तः स्फुटमिन्दु मानम् । ४२ ।
शेष से त्रिज्या वर्ग में भाग देंगे, फल मन्द कर्ण की लिप्ता होगी । चन्द्र के
मध्य बिन्दु कला मान (३१।२०) को त्रिज्या (३४३८) से गुणा कर गुणनफल
(१०७७२४) में मन्दकर्ण से भाग देने पर चन्द्र का स्फुट बिम्बमान होगा ।
आनीय शंकु स्फुट पर्वकाल सूर्यस्य दृग्ज्याञ्च परेन्दु नत्या (५६।२८)
हीनस्य शंकोः कृतियुक्त दृग् ज्यावर्गात्पदं यत्तमसः सकर्णः । ४३ ।
स्फुट अमान्त काल निकाल कर उस समय के स्पष्ट रवि से पूर्व नियम के
अनुसार शंकु और दृग्ज्या निकालते हैं । चन्द्र का लम्बन (५६।२८) शंकु से घटाते
हैं । शेष का वर्ग और दृग्ज्या का वर्ग जोड़कर उसका मूल निकालने से वह तम
कर्ण (छाया कर्ण) होगा ।
स्फुटेन्दुमान त्रिगुणघ्न मेतत् कर्णोद्धतं स्यात्तमस प्रमाणम् ।
यद्वेन्दु षष्ठ्यंश विनिघ्न शंकु त्रिज्याप्तयुक्ते न्दुमितस्तमःस्यात् । ४४ ।
स्फुट चन्द्र बिम्ब को त्रिज्या से गुणा कर तम कर्ण से भाग देने पर सूर्य ग्रहण
में तमोमान या ग्राहक मान होगा । स्फुट चन्द्र बिम्ब मान का १/६० में स्फुट
पर्वकाल शंकु से गुणा कर त्रिज्या से भाग दे कर लब्धि को स्फुट चन्द्र बिम्ब
मान में जोड़ने से भी मध्य तमोमान होगा ।
किंवा दिनस्योन्नत दण्ड संख्या द्विघ्ना विलिप्तास्तमसि प्रदेया ।
स्पर्शे विमोक्षे त्विदमेव कर्म कार्य हि शंकौ सु बहुप्रयासात् । ४५ ।
शंकु आदि के द्वारा तमो बिम्ब आदि निकालने में बहुत परिश्रम के कारण
मैने इसकी एक सरल विधि भी निकाली है । स्फुट पर्वकाल में दिन की उन्नत
घटी को २ से गुणा कर उसे विकला मान कर स्फुट चन्द्र बिम्ब की कला आदि
सूर्य ग्रहण वर्णनम् १५५
में जोड़ने से तमोमान होगा ।
आद्येन्दु भुक्ते रथ षष्टि भागः शंकवा हतो व्यास दलेन (३४३८) भक्तः
फलेन चन्द्रान्त्य गतिः समेतार्क भुक्ति हीना ग्रह कालहारः । ४६ ।
प्रथम प्रकार से स्फुट चन्द्र गति के १/६० को स्फुट पर्व कालिक रवि शंकु
में गुण कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर प्राप्त लब्धि में स्फुट चन्द्र की अन्त्य
गति जोड़ेंगे । योगफल को सूर्य गति से घटाने पर शेष ग्रहण कालिक हार होगा ।
यद्वाष्टमांशेन दिनोन्नताक्ष नाड़ी समाभिः कलिका भिराढ्या
अन्त्वेन्दु भुक्ती रवि भुक्ति हीना हृतिर्मदा स्पर्श विमोक्ष कालेः । ४७ ।
दिन के उन्नति काल (घटी आदि) को उसका १/८ भाग कम कर शेष को
कला मान कर चन्द्र की अन्त्यगति में जोड़ने से प्राप्तफल में रवि की स्फुट गति
घटाने से स्पर्श और मोक्ष काल का हार होगा ।
त्रियेयमिन्दु ग्रहणेनतूक्ता यदेककक्षा स्थ कुमेन्दुमानात्
ग्रासोनभिन्नोऽत्र तुभिन्न कक्षा स्थिते रवीन्दो श्छदनस्य भेदः । ४८ ।
चन्द्रग्रहण में पृथ्वी छाया और चन्द्र बिम्ब एक कक्षा में रहने कें कारण ग्रास
मान स्थान भेद से भिन्न नहीं होता है । अतः चन्द्र ग्रहण में यह काम नहीं करना
पड़ता है । सूर्य ग्रहण में छाद्य सूर्य तथा छादक चन्द्र भिन्न भिन्न कक्षा में होने
के कारण स्थान भेद से ग्रास भेद होता है ।
तस्मात् पुरः पश्चिम याम्य सौम्य परस्पराल्पान्तर देशकेषु
अत्यन्त सर्वग्रह कंकणा भग्रासा पृथक् सूक्ष्मतयैव साध्याः । ४९ ।
सूर्य ग्रहण में छाद्य और छादक की अलग कक्षा होने के कारण अलग अलग
स्थानों में ग्रास भेद होता है । पूर्व पश्चिम या उत्तर दक्षिण थोड़ा अन्तर होने पर
भी उनका अल्पग्रास सर्वग्रास और वलयाकार ग्रास अलग अलग साधन करना
होगा ।
स्फुटेषु मानैक्य दलस्वकाल हारैर्हिमांशू ग्रहण क्रमेण
स्थित्यर्द्ध मर्दार्द्ध घटी फलानि सकृत् समानीय तदू नयुक्तात् । ५० ।
चन्द्रग्रहण अध्याय के नियमों के अनुसार समपर्वकालिक स्फुट शर, मानैक्यार्द्ध
(छाद्य छादक बिम्बों के योग का आधा), ग्रहण काल हार द्वारा पहले स्पर्श, मोक्ष,
स्थित्यार्द्ध तथा मर्दार्द्ध घटीफल निकालेंगे । (शर या तुंग से) यह स्पर्श , मोक्ष,
स्थित्यार्द्ध और मर्दार्द्ध समपर्व काल से घटाने पर (या जोड़ने पर) सम्मीलन और
उन्मीलन समय होगा ।
स्पर्शादिकालान् समपर्व कालात् संस्थाप्यतत्त त्समयोत्थ लग्नैः
त्रिभोन लग्नात् पर पूर्व दिक् कं नतं समालोच्य गति क्रमेण । ५१ ।
इसके बाद तात्कालिक और वित्रिभ लग्न साधकर पूर्व और पश्चिम नत
१५६ सिद्धान्त दर्पण
निकालेंगे, उससे
संसाध्य तत् तत् हरिजानितैः स्तुतैः संस्कृत्यता स्थान तथा विधाय
तत्काल दृक् पेक्ष नतीषु सिद्धैः स्थित्य र्द्धकालैः समपर्वकालात् । ५२ ।
इस स्फुट लम्बन काल में स्पर्श, मोक्ष आदि काल का संस्कार करते हैं ।
इस प्रकार संस्कार होने पर स्पर्श, आदि काल से फिर उस काल का स्फुट शर
और उससे स्थित्यर्द्ध निकाल कर समपर्वकाल का संशोधन करें ।
परिष्कृतातत् हरिजैः पुनः तान् स्पर्शादिका नित्य सकृत् क्रियाभिः
स्थिरं भवेत् स्पर्श विमोक्ष मर्द निमीलनोन्मीलन काल जालम् । ५३ ।
इस समपर्वकाल से पुनः लम्बन निकाल कर स्पर्श आदि समय का पुनः
संस्कार करेंगे । इस प्रकार बार बार करने से क्रमानुसार दो स्पर्श या दो मोक्ष
कालों में कोई अन्तर नहीं होगा । इस प्रकार स्पर्श, मोक्ष, उन्मीलन निमीलन
समय स्पष्ट होगा ।
तत् स्पष्ट पर्वान्तर नाड़िकाद्यं स्थित्यर्द्ध मर्दार्द्ध युगं स्फुटं स्यात्
सकृत् कृति स्पर्श विमोक्ष जे ष्ण्याः मध्येषुतः कालज मन्तरंयत् । ५४ ।
इस स्पर्शादि काल और स्फुट पर्व काल के अन्तर से दोनों स्थिति अर्द्ध तथा
दोनों मर्द अर्द्ध की स्पष्ट नाड़ी आदि का मान प्राप्त होगा । अथवा एक बार की
विधि से स्पर्श और मोक्षकाल का स्फुट शर निकाल कर मध्यम शर से इन दोनों
का अन्तर निकालें ।
तस्यानुपातात् शर सिद्धिरस्या स्थित्यर्द्ध के वाप्यसकृद्विधेये
आद्य द्वितीय स्थिति खण्ड सिद्ध पर्वोद्भव ल्लम्बन जान्तरस्य । ५५ ।
इसके अनुपात से स्पर्श और मोक्ष काल का शर सिद्ध होता है । एक धनात्मक
एक ऋणात्मक अन्तर होता है । उनके योग के आधे के बराबर दोनों अन्तर करने
से स्पर्श और मोक्ष काल का शर निकलेगा ।
इस शर से एक बार के नियम से (दूसरा) स्थिति अर्द्ध काल निकालेंगे ।
उससे स्पर्श, मोक्ष काल तथा तात्कालिक स्फुट शर (मध्यम काल का) का साधन
करते हैं । फिर मध्य कालीन स्फुट शर से स्पर्श और मोक्षकाल के शर का अन्तर
निकालते हैं ।
तथा नुपातात् समयान्तरोत्थाद् भवे तृतीयादिक लम्बनाप्ति
किं वा व्यसंस्कार भवाल्प भूरि स्थित्यर्द्धयो र्मध्यत एव यत्स्यात् । ५६ ।
इन अन्तरों के अनुपात से (दोनों अन्तरों को उनके योगार्द्ध के बराबर कर)
फिर स्पर्श और मोक्षकाल का स्फुट शर (तीसरा) निकालते हैं । पुनः इससे स्थिति
अर्द्ध निकालते हैं । यह क्रिया बार बार करने से शर (लम्बन) स्फुट हो जाता
है ।