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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

सूर्य ग्रहण वर्णनम् १४९
चन्द्र की गति के अन्तर की कला से भाग देने पर दण्ड आदि परम लम्बन होगा ।
नाड्यादिलब्धं स्फुट दृग् गतिघ्नं राशित्रयज्या विहृतं फलञ्च
अन्त्यं भवेल्लम्बन नाड़िकाद्यं तत्प्राणतो ज्या पर संज्ञका स्यात् । ११ ।
दण्ड आदि परम लम्बन को इष्ट काल के वित्रीभ शंकु (दृग् गति ) से गुणा
कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर यह लम्बन का अन्त्या होता है । इसका असु
बनाकर उस की ज्या को पर कहा जाता है ।
शताहता भूप भुजै (२१६) विभक्ता सादृग् गतिर्लम्बन कृत्यरोवा
त्रिभोनतग्नोष्ण करान्तरोत्था दोर्ज्या परघ्नी त्रिगुणे ( ३४३८) हृताचा । १२ ।
स्फुट दृग् गति (विचित्र शंकु) को (१००) से गुणा कर (२१६) से भाग देने
से भी यही 'पर' आयेगा अब वित्रीभ लग्न तथा रवि की अन्तर ज्या को पर से
गुण कर त्रिज्या से भाग देने पर-
स्याल्लम्बन ज्या फल मस्य चापं प्राणात्मकं लम्बन मेतदर्के
त्रिभोन लग्नात् पर पूर्व दिक् स्थे क्रमाद् युतोनं समपर्व काले । १३ ।
लम्बन ज्या होती है । इसका चाप (असु या प्राण में) स्फुट लम्बन है ।
वित्रीभ लग्न से सूर्य पश्चिम (कम राशि होने पर लम्बन को समपर्व काल में
जोड़कर या सूर्य से पूर्व (वित्रीभ लग्न का राशि अंश सूर्य से कम होने पर)
समपर्व काल से उसे घटाकर स्फुट समपर्व काल बनाते हैं ।
तत्काल सम्भूत रवि त्रिभोन लग्नो नत ज्या पर मौर्विकाभिः
अर्क त्रिभोनान्तरतोऽपि भूयस्तल्लम्बनं पूर्ववदेव साध्यम् । १४ ।
इस प्रकार स्फुट समपर्व काल से स्फुट रवि और वित्रीभ लग्न निकालते
हैं । तथा उसके अन्तर से पुनः पहले की तरह लम्बन का साधन करते हैं ।
तत्संस्कृतात् तत्समपर्व कालात् पुनर्नतादौ रवि लम्बनञ्च
स्थिरेऽसकृत्कर्म वशादि हेतत् संस्कार योग्यं स्फुट लम्बनं स्यात् । १५ ।
इस प्रकार बार बार करने पर दो पर्वकाल के बीच अन्तर नहीं रहने पर वह
स्फुट पर्व सम काल होगा । दो लम्बनों के बीच भी अन्तर नहीं रहने पर वह
स्फुट लम्बन कहा जायेगा ।
वक्ष्ये सकृल्लम्बन कर्मसूक्ष्म लग्नार्क यो रन्तरतः प्रसाध्ये
दोः कोटिजीवे परबाहु जीवान्तरस्य वर्गाद्युत कोटिवर्गात् । १६ ।
एक बार में सूक्ष्म लम्बन निकालने की विधि अब मैं कहता हूँ । सम पर्व
काल के लग्न तथा रवि निकाल कर दोनों के अन्तर की भुजज्या ओर कोटिज्या
निकालें ।