सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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निकालेंगे, उससे
संसाध्य तत् तत् हरिजानितैः स्तुतैः संस्कृत्यता स्थान तथा विधाय
तत्काल दृक् पेक्ष नतीषु सिद्धैः स्थित्य र्द्धकालैः समपर्वकालात् । ५२ ।
इस स्फुट लम्बन काल में स्पर्श, मोक्ष आदि काल का संस्कार करते हैं ।
इस प्रकार संस्कार होने पर स्पर्श, आदि काल से फिर उस काल का स्फुट शर
और उससे स्थित्यर्द्ध निकाल कर समपर्वकाल का संशोधन करें ।
परिष्कृतातत् हरिजैः पुनः तान् स्पर्शादिका नित्य सकृत् क्रियाभिः
स्थिरं भवेत् स्पर्श विमोक्ष मर्द निमीलनोन्मीलन काल जालम् । ५३ ।
इस समपर्वकाल से पुनः लम्बन निकाल कर स्पर्श आदि समय का पुनः
संस्कार करेंगे । इस प्रकार बार बार करने से क्रमानुसार दो स्पर्श या दो मोक्ष
कालों में कोई अन्तर नहीं होगा । इस प्रकार स्पर्श, मोक्ष, उन्मीलन निमीलन
समय स्पष्ट होगा ।
तत् स्पष्ट पर्वान्तर नाड़िकाद्यं स्थित्यर्द्ध मर्दार्द्ध युगं स्फुटं स्यात्
सकृत् कृति स्पर्श विमोक्ष जे ष्ण्याः मध्येषुतः कालज मन्तरंयत् । ५४ ।
इस स्पर्शादि काल और स्फुट पर्व काल के अन्तर से दोनों स्थिति अर्द्ध तथा
दोनों मर्द अर्द्ध की स्पष्ट नाड़ी आदि का मान प्राप्त होगा । अथवा एक बार की
विधि से स्पर्श और मोक्षकाल का स्फुट शर निकाल कर मध्यम शर से इन दोनों
का अन्तर निकालें ।
तस्यानुपातात् शर सिद्धिरस्या स्थित्यर्द्ध के वाप्यसकृद्विधेये
आद्य द्वितीय स्थिति खण्ड सिद्ध पर्वोद्भव ल्लम्बन जान्तरस्य । ५५ ।
इसके अनुपात से स्पर्श और मोक्ष काल का शर सिद्ध होता है । एक धनात्मक
एक ऋणात्मक अन्तर होता है । उनके योग के आधे के बराबर दोनों अन्तर करने
से स्पर्श और मोक्ष काल का शर निकलेगा ।
इस शर से एक बार के नियम से (दूसरा) स्थिति अर्द्ध काल निकालेंगे ।
उससे स्पर्श, मोक्ष काल तथा तात्कालिक स्फुट शर (मध्यम काल का) का साधन
करते हैं । फिर मध्य कालीन स्फुट शर से स्पर्श और मोक्षकाल के शर का अन्तर
निकालते हैं ।
तथा नुपातात् समयान्तरोत्थाद् भवे तृतीयादिक लम्बनाप्ति
किं वा व्यसंस्कार भवाल्प भूरि स्थित्यर्द्धयो र्मध्यत एव यत्स्यात् । ५६ ।
इन अन्तरों के अनुपात से (दोनों अन्तरों को उनके योगार्द्ध के बराबर कर)
फिर स्पर्श और मोक्षकाल का स्फुट शर (तीसरा) निकालते हैं । पुनः इससे स्थिति
अर्द्ध निकालते हैं । यह क्रिया बार बार करने से शर (लम्बन) स्फुट हो जाता
है ।