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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

१५० सिद्धान्त दर्पण
पूर्व श्रुतिः कोटिगुणा त्परघ्नात् श्रुत्या हृताद्यत्फलमस्य चापः
मध्यो भवेल्लम्बन जासु संघस्थ त्संस्कृता मान्तज दृग् गतिघ्नः । १७ ।
पहले कहे गये परज्या और भुजज्या के अन्तर का वर्ग तथा कोटिज्‍या का
वर्ग जोड़कर उसका वर्ग मूल लेने से कर्ण होगा । कोटिज्‍या को ‘पर’ से गुणा
कर लम्बन का कर्ण से भाग देने पर मध्यम क असु आता है । इस मध्यम लम्बन
में से समपर्व काल का संस्कार कर उसका की दृग् गति से मध्यम लम्बन का
गुणा करेंगे । तथा
स आद्यया दृग् गति जीवयाप्तो विस्पष्ट तां गच्छत भास्करोक्त-
किन्त्वेषमध्यादधिको यदिस्यात्तदा स्वमध्यान्तर जा सुवर्गात् । १८ ।
आद्य दृग् गति से भाग देने से स्फुट मध्यम (भास्करोक्त) लम्बन आता है ।
यह मध्यम लम्बन से अधिक होने पर दोनों के अन्तर असु से वर्ग को-
द्वाभ्या हतान्मध्यम लम्बनामात् फलेन युक्तः करणीय एव
तल्लम्बनं भूयइनेन्दु मध्य गत्यन्तर (७३१) घ्नं प्रथमेन्दु भान्वो । १९ ।
दो से गुणा कर मध्य लम्बन से भाग देकर लब्धि को मध्य स्फुट लम्बन में
जोड़ेंगे । इस प्रथम और द्वितीय स्फुट लम्बन से किसी को लेकर उसे रवि और
चन्द्र की मध्यम गति के अन्तर ( ७३१) से गुणा कर प्रथम स्फुट चन्द्र तथा रवि
के
गत्यन्तरेणोद् धृत मेव कार्य द्विधोदितं स्पष्टतमं भवेद्धि ।
परिष्कृतो लम्बन नाड़ि काद्यै दर्शान्त एव स्फुट पर्वनामा । २० ।
गति अन्तर से भाग देंगे । इससे भास्करीय स्फुट लम्बन अति स्फुट होता
है । इसी प्रकार स्फुट लम्बन नाड़िका द्वारा पहले की भांति दर्शान्त का संस्कार
करने से स्फुटतम पर्वकाल आता है ।
षड् भै (२७६) र्हता लम्बन सिद्ध काल लग्नस्फुटाक्र्कान्तर कोटि जीवा
त्रिज्या हतं दृग् गति ताड़िताप्ता त्रिभज्य या लम्बन जा विनाड्यः । २१ ।
(अथवा) स्फुट पर्व काल के स्फुट लग्न और रवि मिल कर दोनों के अन्तर
की कोटिज्‍या को (२७६) से दृग् गति से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर लम्बन
की विनाड़ी आती है ।
भवन्तिताः प्राग्व दिनेन्दु मध्य गत्यन्तर (७३१) घ्नाः स्फुटजान्तराप्ताः
काले स्फुटे योग वियोग वाम्यात् परिष्कृताश्चेत्सम पर्वकालः । २२ ।
इस लम्बन विनाड़ी को पहले की तरह रविचन्द्र के गति अन्तर ( ७३१) से
गुणा कर दोनों के स्फुट गति अन्तर से भाग देने पर प्राप्त फल से स्फुट पर्व का
विपरीत संस्कार करने से समपर्व काल होगा ।