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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४३
भाग कर मेष आदि राशियों का चिन्ह देंगे । क्रान्तिवृत्त से चन्द्र केन्द्र उस राशि
में रखकर अर्द्ध खण्डित चन्द्र बिम्ब बनाते हैं । इसके दोनों श्रृंगों को मिलाते हुए
एक रेखा खींचते हैं ।
बाह्यास्थ बिन्दु परिवेष्टन कं विदध्यादित्थं
निजापमपथा भिमुखः खगः स्यात्
प्राग् वृत्त केन्द्र यमदि गोत्तर रेखिकाया
पश्चाद् भ्रमं प्रवहजं विषुवद्दिनोत्थम् । ७५ ।
श्रृंगों को मिलाने वाली रेखा (चन्द्र व्यास) के बराबर व्यास से दोनों बाहरी
बिन्दुओं के केन्द्र से वृत्त खींचेंगे । इससे चन्द्रमा अपने क्रान्ति मार्ग पर चलता
हुआ लगेगा । पूर्व बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के केन्द्र से जाती दक्षिणोत्तर
रेखा पर (याम्योत्तर वृत्त पर )
व्यक्षोत्तरे वसुभुजानल (३२८) योजनस्थे देशेऽगच्छत धनः पथ सम्मुखीनम् ।
तस्मान्नतस्य पलजेवलनेन जीवा ग्राह्यानोत्थ वलनेऽपिन कोटि जीवा ।७६।
निरक्ष (विषुव रेखा) से ३२८ योजन उत्तर (२३° २७' अक्षांश - कर्क रेखा)
के स्थान पर क्रान्ति वृत्त की पूर्व से पश्चिम गति चाप आकार में ही (विषुव दिन
को) दिखाई देगी । यह वास्तव में सीधी रेखा (गोल पर) है जो समतल के चित्र
में वक्र दिखायी देती है अतः अक्ष या आयन वलन में ज्या या कोटिज्या की
जरूरत नहीं है ।
मध्यसूत्रादुदिग् दक्षिणान्तावधि ज्यात्मकं मानमेवात्र निश्चीयते ।
मध्यसूत्रादवः क्रान्तिमार्गान्तरं क्रान्ति जीवाक्ष जीवातु के न्द्रोद् भवेत् ।७७।
पूर्व पश्चिम वृत्तों की ज्या रूप रेखा, वृत्त की परिधि तथा दोनों ध्रुवों के बीच
सभी याम्योत्तर रेखाओं पर लम्ब है । अतः इस रेखा पर पूर्व से पश्चिम (मध्य सूत्र
से दूरी से क्रान्ति ज्या का मान होता है (यह अक्षांश वृत्त हुआ) अतः क्रान्ति ज्या
पूर्व पश्चिम रेखा (वृत्त केन्द्र से) की दूरी से निकाली जाती है । इसी प्रकार अक्षज्या
उत्तर दक्षिण रेखा (देशान्तर रेखा) पर की दूरी से निकाली जाती हैं ।
स्फुरति धरणी भाया बिम्ब बाह्ये समन्ता
द् वलय सदृश मस्या अञ्चलं पञ्च लिप्तम्
तद वतमस संज्ञयं तत्कुभाक दिक् (१०) कलाढ्या
मलिनयति सितांशो रन्तम ग्रस्तमूर्तेः । ७८ ।
(चन्द्र कक्षा में ) पृथ्वी की छाया के चारों ओर ५ कला अवतमस (कम
अन्धकार वाली छाया) होती है । इसको जोड़ने पर भूभा (पृथ्वी की छाया) का
व्यास १० कला अधिक होता है । १० कलायुक्त भूछाया चन्द्रमा को (ग्रहण के
अतिरिक्त) अन्य समय भी ढंकती है (इस समय ग्रहण नहीं दिखता है पर चन्द्रमा
का प्रकाश कुछ मन्द होगा)