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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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सूर्य ग्रहण वर्णनम् १५५
में जोड़ने से तमोमान होगा ।
आद्येन्दु भुक्ते रथ षष्टि भागः शंकवा हतो व्यास दलेन (३४३८) भक्तः
फलेन चन्द्रान्त्य गतिः समेतार्क भुक्ति हीना ग्रह कालहारः । ४६ ।
प्रथम प्रकार से स्फुट चन्द्र गति के १/६० को स्फुट पर्व कालिक रवि शंकु
में गुण कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर प्राप्त लब्धि में स्फुट चन्द्र की अन्त्य
गति जोड़ेंगे । योगफल को सूर्य गति से घटाने पर शेष ग्रहण कालिक हार होगा ।
यद्वाष्टमांशेन दिनोन्नताक्ष नाड़ी समाभिः कलिका भिराढ्या
अन्त्वेन्दु भुक्ती रवि भुक्ति हीना हृतिर्मदा स्पर्श विमोक्ष कालेः । ४७ ।
दिन के उन्नति काल (घटी आदि) को उसका १/८ भाग कम कर शेष को
कला मान कर चन्द्र की अन्त्यगति में जोड़ने से प्राप्तफल में रवि की स्फुट गति
घटाने से स्पर्श और मोक्ष काल का हार होगा ।
त्रियेयमिन्दु ग्रहणेनतूक्ता यदेककक्षा स्थ कुमेन्दुमानात्
ग्रासोनभिन्नोऽत्र तुभिन्न कक्षा स्थिते रवीन्दो श्छदनस्य भेदः । ४८ ।
चन्द्रग्रहण में पृथ्वी छाया और चन्द्र बिम्ब एक कक्षा में रहने कें कारण ग्रास
मान स्थान भेद से भिन्न नहीं होता है । अतः चन्द्र ग्रहण में यह काम नहीं करना
पड़ता है । सूर्य ग्रहण में छाद्य सूर्य तथा छादक चन्द्र भिन्न भिन्न कक्षा में होने
के कारण स्थान भेद से ग्रास भेद होता है ।
तस्मात् पुरः पश्चिम याम्य सौम्य परस्पराल्पान्तर देशकेषु
अत्यन्त सर्वग्रह कंकणा भग्रासा पृथक् सूक्ष्मतयैव साध्याः । ४९ ।
सूर्य ग्रहण में छाद्य और छादक की अलग कक्षा होने के कारण अलग अलग
स्थानों में ग्रास भेद होता है । पूर्व पश्चिम या उत्तर दक्षिण थोड़ा अन्तर होने पर
भी उनका अल्पग्रास सर्वग्रास और वलयाकार ग्रास अलग अलग साधन करना
होगा ।
स्फुटेषु मानैक्य दलस्वकाल हारैर्हिमांशू ग्रहण क्रमेण
स्थित्यर्द्ध मर्दार्द्ध घटी फलानि सकृत् समानीय तदू नयुक्तात् । ५० ।
चन्द्रग्रहण अध्याय के नियमों के अनुसार समपर्वकालिक स्फुट शर, मानैक्यार्द्ध
(छाद्य छादक बिम्बों के योग का आधा), ग्रहण काल हार द्वारा पहले स्पर्श, मोक्ष,
स्थित्यार्द्ध तथा मर्दार्द्ध घटीफल निकालेंगे । (शर या तुंग से) यह स्पर्श , मोक्ष,
स्थित्यार्द्ध और मर्दार्द्ध समपर्व काल से घटाने पर (या जोड़ने पर) सम्मीलन और
उन्मीलन समय होगा ।
स्पर्शादिकालान् समपर्व कालात् संस्थाप्यतत्त त्समयोत्थ लग्नैः
त्रिभोन लग्नात् पर पूर्व दिक् कं नतं समालोच्य गति क्रमेण । ५१ ।
इसके बाद तात्कालिक और वित्रिभ लग्न साधकर पूर्व और पश्चिम नत