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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३९
सूर्य ग्रहण में वलन (संशोधन) कला के बारे में कहता हूँ । इन दोनों प्रभावों के
कारण आकाश के पूर्व पश्चिम कपाल (क्षितिज के ऊपर आकाश गोलार्द्ध के
याम्योत्तर वृत्त द्वारा दो भाग) में ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष की दिशा का
ज्ञान होता है ।
चलांश संस्कार वदर्क चन्द्रयोः स्वकोटि
लिप्ता खमहीन्द्र (१४१०) ताड़िताः ।
खखाब्धि बाणै (५४००) विहृता स्ततः
फलं कलात्मकं स्याद्वलनं स्वमायनम् । ५६ ।
चन्द्र ग्रहण में अयन संस्कृत चन्द्र और सूर्य ग्रहण में अयन संस्कृत सूर्य की
कोटि कला को परम क्रान्ति (१४१०) से गुणा कर तीन राशि की कला (५४००)
से भाग देने प्राप्त फल कला आयन वलन होता है । जिस दिशा (पूर्व या पश्चिम
कपाल) में यह ग्रहण होता है । उसी दिशा में यह वलन होता है ।
हिमांश भान्वोः स्वदिनार्द्धतोनतं पलात्मकं खांक (९०) हतं दिनार्द्धजै
निजैः पलै र्भाजितमंश कादिकं नतः पुरः पश्चिमजं दिनार्द्धयोः । ५७ ।
(सूर्य ग्रहण में रवि और चन्द्र समान होने के कारण केवल चन्द्र द्वारा दोनों
ग्रहों का आयन वलन निकाला जा सकता है ।)
चन्द्र ग्रहण में चन्द्र दिनार्द्ध से नत और सूर्य ग्रहण में सूर्य दिनार्द्ध से नत
निकाल कर उसका पल बनायेंगे । उसको ९० से गुणा कर अपने अपने दिनार्द्ध
पल से भाग देने पर अंशादि फल आता है । यह पूर्व पश्चिम दिनार्द्ध के अनुसार
पूर्व या पश्चिम दिशा में नत होगा ।
निजाक्ष भागा गत भाग ताड़िता नवत्य (९०) वाप्ताः फलमेष सम्भवम्
पुरो नतेस्याद् वलनं तदन्तरं गते च पश्चाजनितेहि दक्षिणम् । ५८ ।
इस नत को अपने देश के अक्षांश से गुणा कर ९० से भाग देकर जो फल
आयेगा वह पूर्वनत में उत्तर और पश्चिम नत में दक्षिण अक्ष वलन होगा ।
तयोः पलोत्थायनयोः समांशयोर्युते वियोगात्तु विभिन्नकोष्ठयोः ।
स्वकं भवे दिग्वलनांशकादिकं तदंगुलाज्यं परिलेख इष्यते । ५९ ।
अक्ष और आयन वलन दोनों एक दिशा में होने पर योग और भिन्न दिशा
में होने पर अन्तर किया जाता है । फल चन्द्रग्रहण में चन्द्र का और सूर्य ग्रहण
का सूर्य का अंशादि दिग्वलन होगा । यह स्पष्ट वलन हुआ । स्पर्श, मोक्ष, आदि
किस दिशा से किस प्रकार होगा । इससे मालूम होगा । इसका अंगुल आदि
मान परिलेख में कहा गया है ।
सुरोदितं सूर्य दिनं विधूदया स्तयोस्तु मध्ये दिनमस्य सम्मतम् ।
दिनान्त सिद्धावयनांश संस्कृतौ विधायभास्वच्छशि नौ तु दृक्षयोः । ६० ।