सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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चन्द्र वित्रीभ (दशम लग्न) समान होने पर स्फुट लम्बन नहीं होता है। वित्रीभ
लग्न की उत्तर क्रान्ति देश के अक्षांश के समान होने पर चन्द्र का नत भी नहीं
होता।
त्रिभोन लग्नोदगपक्रमेक्षोऽधिके च सौम्यानत रन्यथा सौ
याम्या भवेत् पर्वणि चन्द्र भान्वोः साम्या न्नतो ते रवितः सुसाध्ये । ६ ।
वित्रीभ (दशम) लग्न की उत्तर क्रान्ति अपने अक्षांश से अधिक होने से चन्द्र
की उत्तर नति होती है। वित्रीभ लग्न की उत्तर क्रांति अक्षांश उत्तर से कम हो
या दक्षिण क्रान्ति हो तो दक्षिण नति होती है।
अमावास्या में चन्द्र और सूर्य की राशि आदि अवयव समान होने के कारण
नति (उत्तर और दक्षिण दिशा) से ही साधन करना सुविधाजनक है।
तात्कालिकाकार्त् समपर्वलग्नमानीय तस्मात् सदन त्रयोनात्
क्रान्तिं समानीय निजाक्ष भागैस्त्याग योगौ पृथगेक दिक्त्वे । ७ ।
स्फुटाधिकार के नियम से तात्कालिक रवि का साधन कर उससे समपर्व
काल का लग्न निकालेंगे। उससे ३ राशि घटाकर (वित्रीभ) लग्न से पुनः क्रान्ति
साधन होगा। यह क्रान्ति और अक्षांश भिन्न दिशा में होने से अन्तर और एक
दिशा में होने से योग होगा।
कार्यावितस्यु स्त्रिभहीन लग्न नतांशकास्ते नवते र्विशोध्याः
शेषो भवत्युन्नत भाग संह क्रमज्यकास्य स्फुट दृग् गति स्यात् । ८ ।
फल वित्रीभ लग्न का नतांश होगा (उसको ३ राशि (९०°) से घटाने पर
वित्रीभ का उन्नतांश होगा। इस उन्नतांश की क्रमज्या को ही स्फुट दृग् गति
कहा जाता है।
विश्वम्भरा गोल दलं रविन्दोः कक्षागतं कल्पित मुक्तरीत्या
लिप्तीकृतं चे त्परमे नतीस्त स्तदन्तरं चान्य नति र्ग्रहे स्यात् । ९ ।
सार्द्ध योजन को रवि और चन्द्र कक्षा में मान कर उसकी कला निकालने
पर वह कुच्छन्न कला होती है। इतना ही क्रमशः रवि और चन्द्र की परम नति
होती है। इन दोनों नतिका अन्तर सूर्यग्रहण में परम नति होती है।
यद् वार्क भुक्तेः कृतभूप (१६४) भागः शक्रांश (१४) ऋक्षे शगतेर्नति
स्यात् परातयो रन्तर जा विलिप्ता श्रन्द्रार्क गत्यान्तर लिप्तिकाप्ताः । १० ।
सूर्य की दैनिक गति
सूर्य परम नति = ——————————
१६४
चन्द्र की दैनिक गति
चन्द्र परम नति = ——————————
१४
रवि और चन्द्र की परम नति के अन्तर की विकला बनाकर उसमें रवि और