सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 234

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३७
चन्द्र तथा उससे शर निकालेंगे। इस शर और समपर्वकालिक शर के अन्तर का
विकला का वर्गकर
अर्द्धान् मूल मिहादि पर्व शरतः संशोध्य शेषः स्फुटः
स्याद् बाण स्तत आगते स्थिति दले स्यानां समेविस्फुटे
ग्रासो दृक् समता मुपैतित ततः स्पर्शादयःस्युः सकृत्
पश्चाद् या कथमिष्यते धरणीभा सा दृक् समा गृह्यताम् । ४५ ।
उसका आधा करते हैं और वर्ग मूल निकालते हैं। इस मूल को समपर्व
कालीन शर से घटाने पर स्फुट शर होता है। इससे पहले की तरह स्थिति काल
निकालते हैं। इस शर से जो ग्रास आदि का समय आता है वह दृक् सिद्ध होता
है। इस शर से स्पर्श आदि समय एक ही बार में स्फुट हो जाते हैं। अब जो
भूछाया कही जा रही है वह दृक् सिद्ध छाया है। (पहले की भूछाया स्थूल थी।)
अथेष्ट कालाद् ग्रसनं प्रमाणं ग्रासाद भीष्टात्समयं प्रवक्षे ।
पूर्वत्रभागे ग्रहणेष्ट नाड़ी स्थित्यर्द्धतः प्रोज्भ्य ततोऽवशिष्टैः । ४६ ।
अब इष्ट काल से ग्रास तथा ग्रास को देख कर समय निकालने की विधि
कही जाती है। मध्य ग्रहण से पूर्व का समय होने से उसको स्पर्श स्थिति अर्द्ध
से घटाते हैं।
दण्डैर्निहन्याद् ग्रहकाल हारं षष्ट्यां भजेत्कोटिकलाविधोः स्युः
भानोर्ग्रहे कोटि कलाश्च मध्य स्थित्यर्द्ध निघ्ना स्फुट लम्बनोत्थैः । ४७ ।
शेष दण्ड आदि को ग्रहकाल हार (सूर्य ग्रहण में ग्रह काल का हार वर्णित
है) से गुणा कर ६० से भाग दें। यह चन्द्र ग्रहण में कोटि कला होगी। सूर्य
ग्रहण में इसको पुनः मध्य स्थिति अर्द्ध से गुणा कर स्फुट स्थिति अर्द्ध से भाग
देने पर स्फुट कोटि कला आती है।
स्थित्यर्द्धदण्डै र्विहताः स्फुटाः स्युः तत्काल विक्षेप कला भुजोऽत्रे
दोः कोटि वर्गैक्य पदञ्च कर्णस्तदून मानैक्य दलं पिधानम् । ४८ ।
उस समय के शर के भुज की कला बनायेंगे। कोटि और भुजकला के वर्ग
का योग कर उसका वर्ग मूल निकालें। यह कर्ण होगा। उसे बिम्ब मान योग
के आधे से घटाने पर ग्रास मान निकलेगा।
भागे परस्मिन् ग्रहणस्य मोक्ष स्थित्यर्द्धतः स्वेष्ट घटी विशोध्या
शेषो रवीन्दु स्फुट सूक्ष्म भुक्त्यन्त राहतः षष्ठिहतः सकोटिः । ४९ ।
मध्य ग्रहण के बाद मोक्ष स्थिति अर्द्ध में यदि इष्ट काल लिया जाय तो मोक्ष
स्थिति अर्द्ध से इस इष्ट काल को घटा कर रवि और चन्द्र के सूक्ष्म गति अन्तर
से गुणा कर ६० से भाग देने पर कोटि होगा।