सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमः प्रकाशः
सूर्य ग्रहण वर्णनम्
पूर्व प्रकाश उदितम् ग्रहणद्वयस्य साधारणं सकल कर्मरवि ग्रहेतु
यल्लम्बनावनतिकर्म ततोऽविशिष्टं मानान्तरञ्चशशिनस्तिदिह प्रवक्षे । १ ।
पिछले प्रकाश में चन्द्र और सूर्य दोनों के ग्रहण की सामान्य चर्चा हुयी है ।
लेकिन इसके अतिरिक्त सूर्य ग्रहण में लम्बन तथा नत निकालने की आवश्यकता
होती है तथा चन्द्र का बिम्बमान भी सूर्य ग्रहण के लिए दूसरा होता है । अतः
इन तीन बातों की विशेष व्याख्या इस अध्याय में होगी ।
दर्शान्तगौ समकलौ क्षितिगर्भसूत्र,
स्युतावपि द्युमणि चन्द्रमसौ न पश्येत्
यद्रोल पृष्ठ गतमानव एक सूत्रे,
सार्द्धान्यतोऽवनति लम्बन सम्भवोस्यात् । २ ।
अमान्त में रवि और चन्द्र दोनों की राशि अंश कला आदि समान होने पर
भी केवल मध्याह्न समय में एक सीध में दीखते हैं । अन्य समय पृथिवी केन्द्र तथा
पृष्ठ के सूत्र में वे नहीं दीखते हैं । अन्य समय में ऐसा क्यों और कब होता है ।
यह इस अध्याय में कहा जायेगा । आकाश में मध्य क्षेत्र में सूर्य चन्द्र रहने पर
लम्बन और नत (केन्द्र तथा पृष्ठ से दिशा में अन्तर) नहीं होता है ।
सूक्ष्मेन्दु सूर्य जनित स्फुट दर्शनाशो
यस्मिन् सकाल उदितः समपर्व नामा
तत्संस्कृतः स निजलम्बनानाड़िका द्यै
र्भास्वद् ग्रहच्छदन मध्य इहस्फुट स्यात् । ३ ।
रवि और चन्द्र को स्फुट करने पर उससे जो स्फुट दर्शान्त होगा उसी को
समपर्व काल कहा जाता है । इस समपर्व काल में लम्बन संस्कार करने पर वह
सूर्य ग्रहण में ग्रास मध्यकाल होता है । यही स्फुट अमान्तकाल होता है ।
एकानतिश्चन्द्र मसोऽपिसूर्यात् प्राक् पश्चिम्स्ते द्विह लम्बनाख्या
याम्योत्तरस्थेऽवनितिः स्वमध्य स्थिते सितांशौ न हिते भवेताम् । ४ ।
अमान्त काल में सूर्य से चन्द्र की दिशा में अन्तर होता है उसे ही लम्बन
कहते हैं । यह अन्तर (पृष्ठ देश से देखने के कारण) पूर्व पश्चिम दिशा में होने पर
लम्बन कहलाता है । दक्षिण उत्तर दिशा में होने पर इसका नाम नत कहलाता
है । आकाश मध्य में रविचन्द्र दोनों रहने पर दोनों का केन्द्र से जो सूत्र है उसी
पर पृष्ठ देश रहता है अतः लम्बन या नत नहीं होता ।
सलम्बनं वित्रिभ लग्न तुल्ये भवेद् विधौवित्रिभ लग्न जाते
सौम्यापमे स्वाक्ष समान भाग सम्भवे ञ्चावनति र्हिमांशोः । ५ ।