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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

१३२ सिद्धान्त दर्पण
इसी प्रकार स्पष्ट चन्द्र बिम्ब व्यास की कला
मध्य चन्द्र व्यास कला ± चन्द्रगति फल
= -------------------------------------------
२५
सूर्य चन्द्र का स्पष्ट बिम्ब कला के लिए एक और सूत्र है-
दैनिक स्पष्ट रवि गति x ११
स्पष्ट रवि बिम्ब व्यास कला = ------------------------------
२२
दैनिक स्पष्ट चन्द्र गति -७
स्पष्ट चन्द्र बिम्ब व्यास कला = ----------------------------
२५
भूव्यास (१६००) निघ्नः स्फुट सूर्य कर्णे
भूव्यास हीनार्क तन (७०,४००) विभक्तः
फलंतदामूल शिखान्त दैर्घ्यं सुचो
निभायाः पृथिवी प्रभायाः । २५ ।
पृथ्वी सूच्याकार छाया, की लम्बाई स्पष्ट सूर्य कर्ण x भू व्यास
(पृथ्वी केन्द्र से) = ----------------------------
सूर्य व्यास - भूव्यास
सिद्धान्त शिरोमणौ-भूव्यास हीनं रवि
बिम्ब मिन्दु कर्णाहतं भास्कर कर्णभक्तन्
भू विस्तृति लब्ध फलेन हीना भवेत्
कुमाविस्तृति रिन्दुमार्गे । २६ । इति
चन्द्र गोल (कक्षा) में भूभाव्यास
(रवि व्यास - भूव्यास) चन्द्रव्यास
= भू छाया - -------------------------------
रवि व्यास
तन्मानलिप्ताः शशिवत् प्रसाध्याः किं
वानागांशः (७) शशि भृद् गतैर्यः
सोऽष्टाद्रि (७८) निघ्नेषुमनु (१४५)
धृतार्क गत्यूनितः स्यात्तमसः प्रमाणम् । २७ ।
चन्द्रमा की तरह भूछाया व्यास का भी (चन्द्र कला में ) कलात्मक मान
निकाला जाता है । (क्योंकि चन्द्र कला में ही चन्द्र ग्रहण के समय इसका उपयोग
है ) ।
भू भांव्यास (चन्द्र कक्षा में ) कला
दैनिक चन्द्र स्पष्ट गति दैनिक स्पष्ट रवि गति x ७८
= ------------------------ - ------------------------------
७ १४५
भू भा विधुं चन्द्र इनं विधते यदा तदैव ग्रहणं भयोः स्यात् ।
पातारूय राहोर्रुज सन्ति कर्णात् तस्या सुर ग्रास इति प्रशस्तिः । २८ ।
पृथ्वी छाया में चन्द्रमा का बिम्ब आने पर चन्द्र ग्रहण तथा चन्द्रबिम्ब द्वारा
सूर्य ढकने के कारण सूर्य ग्रहण होता है । सूर्य, चन्द्र तथा भू भा (पृथ्वी की

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३३
छाया) का चन्द्रपात के निकट रहने के समय ही ग्रहण होने के कारण राहु (चन्द्रपात
का नाम) असुर द्वारा ग्रास होने की कथा प्रसिद्ध है ।
सिद्धान्तशिरोमणै-दिग्देश काला वरणादि भेदान्नच्छादकोराहुरिति ब्रवन्ति ।
यन्मानितः केवल गोल विज्ञा तत्संहिता वेद पुराण बाह्यम् । २९ ।
सिद्धान्तशिरोमणि में भी भास्कर ने लिखा है कि यदि एक ही राहु द्वारा ग्रास
होता तो ग्रहण में दिग् भेद (कभी पूर्व, कभी पश्चिम में), काल भेद (कम या
अधिक समय के लिए) तथा ग्रास भेद (पूर्ण या खण्ड ग्रहण) कैसे होता है ?
अत रांहु ग्रास द्वारा ग्रहण मानने वाले केवल अपने गोल ज्ञान का अभिमान करते
हैं । वस्तुतः वे मूढ और वेद, संहिता तथा पुराण के विरोधी हैं ।
राहुः कुभामण्डलगः शशांकं शशांक गच्छादयतीन बिम्बम्
तमोमयः शम्भुवर प्रदानात् सर्वागमा नाम विरुद्ध मेतत् । इति । ३० ।
राहु अन्धकार (छाया) मय है वह पृथ्वी छाया मण्डल में प्रवेश कर चन्द्रमा
को ग्रास करता है । फिर चन्द्र में प्रवेश कर सूर्य को ढंकता है । इस प्रकार ग्रास
करने के लिए ही सूर्य ने उसे ऐसा वर दिया है । इस प्रकार का समाधान शास्त्र
विरोधी नहीं है। (उद्धरण समाप्त)
प्रभाभुवो भ्राम्यति भानु भार्द्धे तद्
गर्भमप्रे यदि शुभ्र भानुः
जम्बद् विषद् भिङ् मुख एति वेगात्
तत् तद् ग्रहः सा तप बिम्ब लोपात् । ३१ ।
सूर्य के कारण पृथ्वी की छाया सूर्य से विपरीत दिशा में होती है । यह भी
क्रान्तिवृत्त में पूर्व दिशा में घूमती हैं । पूर्णिमान्त में जब चन्द्र भी सूर्य से विपरीत
दिशा में (६ राशि अन्तर पर) होता है, तब उसकी गति छाया की गति से अधिक
होने के कारण वह छाया में प्रवेश कर उसे पार कर जाता है । छाया में प्रवेश
करने पर चन्द्रमा की किरण (प्रकाश) का लोप होता है । इस कारण चन्द्र ग्रहण
होता है ।
भू भानु मध्ये यदि शीतभानु र्गच्छन् रविं छादयति प्रतीज्या -
भास्वद् ग्रहस्तद्वितीयस्य पूर्व यानेऽपि शुभ्रांशु गते र्महत्वात् । ३२ ।
अमान्त के समय जब पृथ्वी से चन्द्र और सूर्य एक ही दिशा में (एक राशि
में) होते हैं । तब चन्द्रमा पूर्व दिशा में बढ़ते हुए सूर्य को ढंग लेता है । तथा
गति अधिक होने के कारण फिर सूर्य बिम्ब से आगे (पूर्व दिशा में ) निकल
जाता है । सूर्य अत्यन्त प्रकाश मान होने के कारण लोग उसे नहीं देख पाते हैं
सूर्य को ढंकते समय प्रकाश हीन चन्द्रमा को ही देखते हैं ।

१३४ सिद्धान्त दर्पण
कुजादि पातेषु यथा तुरीय फलस्य वाच्यो धन हीन भावः
तथा दिगंशारुय फलेन राहुः सूक्ष्मः स्फुट स्सूर्य शशीव कार्यः । ३३ ।
मंगल आदि तारा ग्रहों के पात में जिस प्रकार चतुर्थफल जोड़ा या घटाया
जाता है उसी प्रकार राहु के दिगंश फल को भी जोड़ने या घटाते हैं । दिगंशफल
चन्द्रमा में जिस प्रकार संस्कार किया जाता है । उसी प्रकार राहु का दिगंश फल
भी निकाला जाता है तथा संस्कार होता है ।
पातोन तात्कालिक चन्द्र दोर्ज्या स्वाष्टाग्नि (३८) भागेन युताद्धिंतात ।
चापीकृता षड् विहता फलं स्यात् कलादिकं स्पष्ट शरं सुधांशो । ३४ ।
स्फुट पर्वान्त कालिक चन्द्र निकाल कर उससे चन्द्र स्फुट पात घटाते हैं ।
फल की भुजज्या निकालते हैं । यह विक्षेप केन्द्र ज्या है । इसमें उसका १/३०
भाग जोड़ते हैं । फल को आधा कर उसका चाप निकालते हैं । इस चाप को ६
से भाग देने पर चन्द्र का कलादि स्पष्ट शर निकलता है ।
विपातचन्द्रस्य षषट्क आद्ये सौम्ये द्वितीये सच दक्षिणः स्यात् ।
क्षिति प्रभारोपण तो विलोम श्चन्द्र ग्रहे दिक शर एव वेद्यः । ३५ ।
पात हीन चन्द्र मेष आदि ६ राशि में रहने पर चन्द्र शर उत्तर दिशा में होता
है, पात हीन चन्द्र तुलादि ६ राशि में हनि पर चन्द्र शर दक्षिण दिशा में होता
है । ग्रहण परिखेख के समय इस शर को भू स्थान में उल्टे तरफ दिया जाता है ।
चापं बिना कोटिफलं तथास्य युत्याहतं पात शशांक गत्योः
त्रिज्याहतं बाणगति स्फुटा स्यात् तत् संस्कृतेः क्रान्ति गतेः स्फुटत्वम् । ३६ ।
(शर की अन्य विधि) चाप करने के बदले, शर के कोटिफल को चन्द्र और
उसके पात की गति योग से गुणा करते हैं । गुणन फल को त्रिज्या से भाग देने
पर शर (चन्द्र शर) की स्फुट गति होगी । इस गति में क्रान्ति गति का संस्कार
करने से वह स्फुट शर गति होगी ।
लेख्यं विपातेन्दु भुजाब्धि पक्ष (२४)
खण्डै शरांशादि सहान्तरं वा
कोटिफलं तद् गति योग निघ्नान्तरं
गतिस्तत्व यमा (२२५)प्ता मिष्या । ३७ ।
चन्द्र से चन्द्र पात घटाकर उसका भुज निकालेंगे । उस भुजांश से शर आदि
निकाला जा सकता है । इसके लिए ९० अंश के वृत्त पाद से ज्या निकालने की
तरह २४ ज्या (भुजज्या) कर प्रत्येक खण्ड का शर, शरान्तर, कोटिफल भुजफल
आदि निकालना परिशिष्ट के विक्षेप खण्ड में दिया गया है ।
उस विपात भुजांश से शर आदि निकालना सुविधा जनक है । यह सब
२२५ कला के अन्तर पर दिया हुआ है ।

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३५
यद्वा विपादेन्दु भुजोत्थ लिप्ता नृपां (१६) श हीना गिरिशै (११) र्विभक्ताः ।
फलं शरः पात विहीन चन्द्रः बाहोर्गृहाद्धार्द्ध वधि कल्पनीयः । ३८ ।
अथवा चन्द्र से पात घटाकर उसेक भुज की कला बनायेंगे । उसमें उसका
१/१६ जोड़कर ११ से भाग देंगे । फल शर होगा । इस प्रकार शर विपात चन्द्र का
१५ अंश तक भुजांश होने पर निकाला जा सकता है । भुजाश ज्यादा होने पर
इस विधि से भूल होगी ।
छाद्य छादक मान योगय दलतो न्यूनः शर श्चेत्तदा
ग्रासः स्यान्न शरेऽधिके स्फुटतरे तन्मान यो गार्द्धतः ।
प्रोज्झ्ये षष्ठ शरंच शिष्ट कलिकाच्छन्ना भवन्त्येव ता-
श्छायाद्याद्य धिका स्तदैव सकल ग्रासोऽम्बर व्यापकः । ३९ ।
ग्राह्य (छात्र) और ग्राहक (छादक) बिम्ब मान जोड़कर उसके आधा से शर
कम होने पर ग्रास होता है । शर इस से ज्यादा होने पर ग्रहण नहीं होता है ।
बिम्ब योग का आधा से शर घटाने पर जो शेष है वही ग्रास होता है । ग्रास का
मान ग्राह्य (छाद्य) से अधिक होने पर पूर्ण ग्रास होता है । ग्रास से ग्राह्य घटाने
पर जो बचता है, उतना आकाश का ग्रास होता है ।
स्पर्शश्चन्द्रमसः पुरोदिशि रखेः पश्चाद् मिवोक्षो न्यदिक-
प्रायः स्यान्न निमीलनं हि सकलं ग्राह्या पिधान क्षणः
तत्रोन्मीलन मेव किञ्चि दुदिते स्वच्छादकान्मण्डले
तन्मध्ये दृग्गोचरांश्रु रुदितो ग्रासो विमर्दाभिधे । ४० ।
चन्द्र ग्रहण का स्पर्श प्रायः पूर्व दिशा में तथा मोक्ष प्रायः पश्चिम दिशा में
होता है इस नियम से गणना होती है । लेकिन सूर्यग्रहण प्रायः पश्चिम दिशा में
स्पर्श तथा पूर्व दिशा में मोक्ष की गणना की जाती है । पूर्व पश्चिम गणना के
बदले कभी कभी दक्षिण उत्तर की भी गणना होती है । अतः पूर्व पश्चिम के साथ
प्रायः शब्द का प्रयोग हुआ है ।
जिस समय ग्राहक बिम्ब ग्राह्य बिम्ब को ढंग कर रखता है उसे निमीलन
समय कहते हैं । ग्राह्य बिम्ब ग्राहक बिम्ब से बाहर निकलने के समय को उन्मीलन
समय कहते हैं । निमीलन से उन्मीलन तक का समय मर्द काल कहते हैं । कोई
कोई इसे विमर्द काल भी कहते हैं ।
पर्वान्तः समलिप्ति केन्द्र रवि जो भार्द्धे च चक्रे क्रमा
चान्द्रस्य ग्रहणस्य मध्य समय सौरस्य सल्लंबनः
मानैक्यार्द्ध कृतेः स्फुटाशुगकृतिं प्रोज्झ्यावशेषात्पदं
षष्ठ्या सं गुणितं दिनेश शशिनोः सूक्ष्म स्व भुक्त्यन्तरा । ४१ ।
रवि और चन्द्र की राशि, अंश और कला तक समान होने पर जो पर्वान्त
निकलता है । उसी को सम पर्वान्त (अमान्त या पूर्णान्त) कहते हैं । इस अवस्था

१३६ सिद्धान्त दर्पण
(समकाल) में चन्द्र और सूर्य का अन्तर ६ राशि होने पर चन्द्र ग्रहण का मध्य
काल होता है ।
ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब मान को जोड़कर उसके आधे के वर्ग को स्फुट शर
के वर्ग से घटाते हैं और शेष का मूल निकालते हैं । उसको ६० से गुणा कर
सूक्ष्म चन्द्र और रवि की गति के अन्तर से (भाग देते हैं)
भक्त तत्फल नाड़िकाः सपलका स्थित्यर्द्धजा मध्यमा
ग्राह्य प्रोज्झित मान योग दलत, स्वाध्या वियुक्तादिषोः ।
कृत्य शेषपदात् पुरेवघटिका मध्या विमर्दार्द्धजाः
पर्वान्तः स्थिति मर्दखण्ड वियुतस्तद् युक् क्रमा दुत्क्रमात् । ४२ ।
भागफल ग्रहण स्थिति का आधा समय (नाड़ी में ) होता है । इसका दो
गुणा करने पर ग्रहण का पूर्ण समय आता है ।
इसी प्रकार ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब का अन्तर कर उसके आधे के वर्ग को
उस समय के शर वर्ग से घटाते हैं । अब शेष का मूल निकाल कर उसमें ६०
से गुणा कर उसमें चन्द्र और सूर्य के गति अन्तर से भाग देते हैं । फल विमर्द
आधे का घटी आदि होता है । इसको दो में गुणा करने पर मर्द काल आता है ।
समपर्वान्त काल में स्थित्यर्द्ध तथा मर्दार्द्ध काल घंटाने पर क्रमशः स्पर्श और
निमीलन का समय आता है ।
मध्ये स्पर्श निमीलने च भवति श्रोन्मीलने न्मोक्षकौ
तत्तकालिक पात सूक्ष्म शशिजे बाणैः पुनः साधिताः ।
स्पर्शाद्या असकृत् क्रिया स्थिरतराः स्पष्टास्यु रिन्दो रवे -
स्वेते स्व स्व विलम्बनैः सह परिस्पष्टाः मुहुः संस्कृताः । ४३ ।
समपर्वान्त काल में स्थिति अर्ध तथा मर्दार्ध जोड़ने से मोक्ष तथा उन्मीलन
समय आता है । इस मोक्ष तथा उन्मीलन आदि समय में पात और सूक्ष्म चन्द्र
साधन कर उससे शर निकाल कर पुनः स्पर्श मोक्ष आदि समय निकालना चाहिये ।
इस प्रकार ग्रहण का स्थिरतर मान आता है । सूर्यग्रहण में स्फुट स्पर्श आदि काल
आने पर उसमें बार बार लम्बन संस्कार कर स्पष्ट समय निकाला जाता है ।
वक्ष्याम्यत्र विशेष मीश (११) गुणितं मध्य ग्रहेषोर्दलम्
सूर्येन्द्वन्त्य गत्यन्तरोद्धतमिषौ स्याद् वर्द्धमाने फलम्
नाड् याद्यं वियुतं युतं त्वितरथा पर्वण्यतः तत् स्फुटं
तुत्कालेन्दु शरा द्य पर्व शरयो रन्तर्विलिप्ता कृते । ४४ ।
बार बार संस्कार की जरूरत नहीं पड़े ऐसी विधि, अब मैं बताता हूँ । समपर्व
काल का शर निकाल कर उसके आधे को चन्द्र और रवि को गति के अंतर से
भाग दें । लब्धि दण्ड आदि को समपर्व काल शर से घटाते हैं, यदि बढ़ रहा
हो, अन्यथा जोड़ते हैं । इससे पर्व स्पष्ट होगा । इस पर्व काल से फिर पात, सूक्ष्म

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३७
चन्द्र तथा उससे शर निकालेंगे। इस शर और समपर्वकालिक शर के अन्तर का
विकला का वर्गकर
अर्द्धान् मूल मिहादि पर्व शरतः संशोध्य शेषः स्फुटः
स्याद् बाण स्तत आगते स्थिति दले स्यानां समेविस्फुटे
ग्रासो दृक् समता मुपैतित ततः स्पर्शादयःस्युः सकृत्
पश्चाद् या कथमिष्यते धरणीभा सा दृक् समा गृह्यताम् । ४५ ।
उसका आधा करते हैं और वर्ग मूल निकालते हैं। इस मूल को समपर्व
कालीन शर से घटाने पर स्फुट शर होता है। इससे पहले की तरह स्थिति काल
निकालते हैं। इस शर से जो ग्रास आदि का समय आता है वह दृक् सिद्ध होता
है। इस शर से स्पर्श आदि समय एक ही बार में स्फुट हो जाते हैं। अब जो
भूछाया कही जा रही है वह दृक् सिद्ध छाया है। (पहले की भूछाया स्थूल थी।)
अथेष्ट कालाद् ग्रसनं प्रमाणं ग्रासाद भीष्टात्समयं प्रवक्षे ।
पूर्वत्रभागे ग्रहणेष्ट नाड़ी स्थित्यर्द्धतः प्रोज्भ्य ततोऽवशिष्टैः । ४६ ।
अब इष्ट काल से ग्रास तथा ग्रास को देख कर समय निकालने की विधि
कही जाती है। मध्य ग्रहण से पूर्व का समय होने से उसको स्पर्श स्थिति अर्द्ध
से घटाते हैं।
दण्डैर्निहन्याद् ग्रहकाल हारं षष्ट्यां भजेत्कोटिकलाविधोः स्युः
भानोर्ग्रहे कोटि कलाश्च मध्य स्थित्यर्द्ध निघ्ना स्फुट लम्बनोत्थैः । ४७ ।
शेष दण्ड आदि को ग्रहकाल हार (सूर्य ग्रहण में ग्रह काल का हार वर्णित
है) से गुणा कर ६० से भाग दें। यह चन्द्र ग्रहण में कोटि कला होगी। सूर्य
ग्रहण में इसको पुनः मध्य स्थिति अर्द्ध से गुणा कर स्फुट स्थिति अर्द्ध से भाग
देने पर स्फुट कोटि कला आती है।
स्थित्यर्द्धदण्डै र्विहताः स्फुटाः स्युः तत्काल विक्षेप कला भुजोऽत्रे
दोः कोटि वर्गैक्य पदञ्च कर्णस्तदून मानैक्य दलं पिधानम् । ४८ ।
उस समय के शर के भुज की कला बनायेंगे। कोटि और भुजकला के वर्ग
का योग कर उसका वर्ग मूल निकालें। यह कर्ण होगा। उसे बिम्ब मान योग
के आधे से घटाने पर ग्रास मान निकलेगा।
भागे परस्मिन् ग्रहणस्य मोक्ष स्थित्यर्द्धतः स्वेष्ट घटी विशोध्या
शेषो रवीन्दु स्फुट सूक्ष्म भुक्त्यन्त राहतः षष्ठिहतः सकोटिः । ४९ ।
मध्य ग्रहण के बाद मोक्ष स्थिति अर्द्ध में यदि इष्ट काल लिया जाय तो मोक्ष
स्थिति अर्द्ध से इस इष्ट काल को घटा कर रवि और चन्द्र के सूक्ष्म गति अन्तर
से गुणा कर ६० से भाग देने पर कोटि होगा।

:
स् + थ + ि = स्थि
त = त
त् + य = त्य
र् + ध = र्ध
Yes, it literally has an extra 'त': "स्थितत्यर्ध"!
And look at "सन्ताड़ित":
स + न् + त + ा + ड़/द? + ि + त
It has 'ड़' with a dot: "सन्ताड़ित" or "सन्ताडित"?
It looks like "सन्ताड़ित" (or सन्ताडित, in modern Hindi fonts ड़/ड). In Devanagari: "सन्ताड़ित".

Let's check Line 16:
"मध्य स्थितार्द्धेन हताः स्फुटाः स्युः षष्ट्या हताः कोटि कलारवेन्दोः । ५२ ।"
Look at "स्थितार्द्धेन":
स् + थ + ि + त + ा + र् + द्ध + े + न = स्थितार्द्धेन.
Yes!
"कलारवेन्दोः" - कला-रवेन्दोः.

Let's check Line 20:
"भुक्त्यन्तराप्ता फल नाड़िकाभिः स्थित्यर्द्धमूनं सद धीष्ट नाड्यः."
Wait, look at "सद धीष्ट":
स + द (sad) space ध + ी + ष + ् + ट (dhīṣṭa) -> "सद धीष्ट" or "यदभीष्ट"?
Wait!

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३९
सूर्य ग्रहण में वलन (संशोधन) कला के बारे में कहता हूँ । इन दोनों प्रभावों के
कारण आकाश के पूर्व पश्चिम कपाल (क्षितिज के ऊपर आकाश गोलार्द्ध के
याम्योत्तर वृत्त द्वारा दो भाग) में ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष की दिशा का
ज्ञान होता है ।
चलांश संस्कार वदर्क चन्द्रयोः स्वकोटि
लिप्ता खमहीन्द्र (१४१०) ताड़िताः ।
खखाब्धि बाणै (५४००) विहृता स्ततः
फलं कलात्मकं स्याद्वलनं स्वमायनम् । ५६ ।
चन्द्र ग्रहण में अयन संस्कृत चन्द्र और सूर्य ग्रहण में अयन संस्कृत सूर्य की
कोटि कला को परम क्रान्ति (१४१०) से गुणा कर तीन राशि की कला (५४००)
से भाग देने प्राप्त फल कला आयन वलन होता है । जिस दिशा (पूर्व या पश्चिम
कपाल) में यह ग्रहण होता है । उसी दिशा में यह वलन होता है ।
हिमांश भान्वोः स्वदिनार्द्धतोनतं पलात्मकं खांक (९०) हतं दिनार्द्धजै
निजैः पलै र्भाजितमंश कादिकं नतः पुरः पश्चिमजं दिनार्द्धयोः । ५७ ।
(सूर्य ग्रहण में रवि और चन्द्र समान होने के कारण केवल चन्द्र द्वारा दोनों
ग्रहों का आयन वलन निकाला जा सकता है ।)
चन्द्र ग्रहण में चन्द्र दिनार्द्ध से नत और सूर्य ग्रहण में सूर्य दिनार्द्ध से नत
निकाल कर उसका पल बनायेंगे । उसको ९० से गुणा कर अपने अपने दिनार्द्ध
पल से भाग देने पर अंशादि फल आता है । यह पूर्व पश्चिम दिनार्द्ध के अनुसार
पूर्व या पश्चिम दिशा में नत होगा ।
निजाक्ष भागा गत भाग ताड़िता नवत्य (९०) वाप्ताः फलमेष सम्भवम्
पुरो नतेस्याद् वलनं तदन्तरं गते च पश्चाजनितेहि दक्षिणम् । ५८ ।
इस नत को अपने देश के अक्षांश से गुणा कर ९० से भाग देकर जो फल
आयेगा वह पूर्वनत में उत्तर और पश्चिम नत में दक्षिण अक्ष वलन होगा ।
तयोः पलोत्थायनयोः समांशयोर्युते वियोगात्तु विभिन्नकोष्ठयोः ।
स्वकं भवे दिग्वलनांशकादिकं तदंगुलाज्यं परिलेख इष्यते । ५९ ।
अक्ष और आयन वलन दोनों एक दिशा में होने पर योग और भिन्न दिशा
में होने पर अन्तर किया जाता है । फल चन्द्रग्रहण में चन्द्र का और सूर्य ग्रहण
का सूर्य का अंशादि दिग्वलन होगा । यह स्पष्ट वलन हुआ । स्पर्श, मोक्ष, आदि
किस दिशा से किस प्रकार होगा । इससे मालूम होगा । इसका अंगुल आदि
मान परिलेख में कहा गया है ।
सुरोदितं सूर्य दिनं विधूदया स्तयोस्तु मध्ये दिनमस्य सम्मतम् ।
दिनान्त सिद्धावयनांश संस्कृतौ विधायभास्वच्छशि नौ तु दृक्षयोः । ६० ।

१४० सिद्धान्त दर्पण
सूर्य का दिन परिणाम कहा जा चुका है । चन्द्रम के उदय से उसके अस्त
तक का समय चन्द्र दिन होता है । सूर्य के दिनान्त में रवि और चन्द्रस्फुट कर
उसमें अयनांश जोड़ते हैं । रवि और चन्द्र की अपनी अपनी शशि के
रवे भुक्ताः शशिनो गता लवा निजोदयाघ्नाः खगुणे (३०) हृता फले
तदन्तरो त्थास्त नवश्वषट् शरा (५६) सवश्व युक्ता घटिका ऽह्वये । ६१ ।
रवि का भाग्यांश तथा चन्द्रमा भुक्त अंश उन राशियों के उदयासु से गुणा
कर ३० से भाग देंगे । जो दो उदयासु आयेंगे उनमे रवि राशि से चन्द्रमा की
राशि के बीच की राशियों के उदयासु जोड़ेंगे । योगफल में ५६ असु जोड़कर
३६० से भाग देकर घटिका बनायेंगे ।
दिनादिवस्तत्र भवेद् विधूदय पदद्युर र्कोदय कालिकौ स्तया
विधाय सूर्यस्य सषड्भ शीतगो समेग्रह भुक्त लवोदयन्तरम् । ६२ ।
सूर्योदय से इतनी घटिका के बाद चन्द्रमा का उदय होगा । चन्द्र अस्त काल

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४१

याम्यायनान्त हरति ध्रुवतो यदेव
स्थानं दलोन कृत बाहु (२३।३०) तवान्तरस्थम् ।
तत्प्रोदितं ध्रुव कदम्ब इति ग्रहाणां
क्रान्ते स्तदुत्तर दिशो निरचापि चिह्नम् । ६६ ।

उत्तर की ध्रुव से दक्षिण अयन को तरफ अयन प्रोत वृत्त (वृहद् वृत्त जो
क्रान्ति वृत्त के सबसे दक्षिणी विन्दु तक जाता है ) पर (२३° ३०') दक्षिण की
तरफ ग्रहों का (क्रान्ति वृत्त जिसमें ग्रह घूमते हैं) ध्रुव कदम्ब होता है । यह क्रान्ति
वृत्त का उत्त दिशा में पृष्ठ केन्द्र है ।

तद् व्यस्त दिग् विनिहितो समदिक् कदम्ब
स्तर्क्यः कदम्ब दनुजादिशिखः कलम्बः ।
तत्पार्श्व को ह्यपम सम्मुख एव बिम्ब
प्राग् याति सर्वस्व शशिनेऽविलम्बः । ६७ ।

क्रान्ति वृत्त से उल्टी (दक्षिणी) दिशा में पृष्ठ केन्द्र जो दक्षिणी ध्रुव से अयन
प्रोत वृत्त पर उतना (२३° ३

[१४२] [सिद्धान्त दर्पण]

और नत अंश द्वारा क्रमश आयन और अक्ष वलन करना चाहिये ।
अष्टादशांगुल गुण प्रमणेन वृत्त द्वन्द्वं
पुरन्दर जलेश दिशोर्विलिख्य
अन्याऽन्य लग्नमनतोन्नत भूप्रदेशे
तत्केन्द्रयोः प्रतिदिशंञ्च दिशैव बिन्दून । ७० ।
परिलेख लिखने के स्थान को समतल (जल के समान) कर उसमें एक वृत्त
(१८ अंगुल व्यासार्द्ध का) बना कर वृत्त परिधि में दिशा ज्ञान विधि से दो बिन्दु
देते हैं । (पूर्व और पश्चिम) इन बिंदुओं से १८ अंगुल व्यासार्द्ध का परस्पर सटे
हुए दो वृत्त खींचते हैं । इन दोनों वृत्तों के प्रति दिशा और कोण का विन्दु देते
हैं ।
मध्ये पुरः पर गतां निद धीत रेखां
प्राङ् मण्डलात् बहिरुदग् दिशि चांगुलान्ते
बिन्दून्तथा वरुण दिग्गत मण्डलस्य बाह्येऽ
ङ्गुलान्तरित दक्षिण भाग केऽन्यम् । ७१ ।
दोनों वृत्तों के केन्द्र से होकर पूर्वा पर (पूर्व पश्चिम) रेखा खींचते हैं । पूर्व
बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के उत्तर बिन्दु से और उत्तर एक अंगुल की दूरी पर
एक बिन्दु तथा पश्चिमी वृत्त के दक्षिण बिन्दु से १ अंगुल दक्षिण एक बिन्दु देते
हैं ।
बाह्यस्थ दक्षिण गविन्दुत एव पश्चात्
पुरश्चरम बिन्दुग कोटि युग्मम् ।
षष्ठांश संयुत रसाक्षि (१६।१०) मितांगुलेन
सूत्रेण चाप मथ पूर्वग बिम्बमध्ये । ७२ ।
ग्रह बिम्ब पश्चिम कपाल में रहने पर दक्षिण बिन्दु से १६।१० अंगुल व्यासार्द्ध
का पश्चिम वृत्त में तथा पूर्व कपाल में रहने पर पूर्व वृत्त के बाहर उत्तर बिन्दु से
१६।१० अंगुल का चाप पश्चिम वृत्त में खींचतेहैं ।
तद् वद् वहि र्विलिखतोत्तर बिन्दुतो ऽपि चापं लिखेत्परपुरोगतविन्दुलग्नम्
चापद्वयं भवति सम्मिलितं कपाल-द्वन्द्व स्थिता पम पथप्रतिम द्वयान्तः । ७३।
इन दोनों चापों से पूर्व और पश्चिम कपाल में क्रान्तिवृत्त का आकार बनेगा ।
प्रत्यग् दिशो हरिदिगन्त मथार्क (१२)
संख्यैश्चिह्नः क्रियादिनिलयान्कलयेन्निजांशैः
तत्रार्द्ध खण्डिततनुं शशिनं निवेश्य
तच्छृंगयुग्म परिलग्न गुणेन भूयः । ७४ ।
दोनों चापों के मिलन के जो क्रान्ति वृत्त बनता है । उसमें पश्चिम से पूर्व १२

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४३
भाग कर मेष आदि राशियों का चिन्ह देंगे । क्रान्तिवृत्त से चन्द्र केन्द्र उस राशि
में रखकर अर्द्ध खण्डित चन्द्र बिम्ब बनाते हैं । इसके दोनों श्रृंगों को मिलाते हुए
एक रेखा खींचते हैं ।
बाह्यास्थ बिन्दु परिवेष्टन कं विदध्यादित्थं
निजापमपथा भिमुखः खगः स्यात्
प्राग् वृत्त केन्द्र यमदि गोत्तर रेखिकाया
पश्चाद् भ्रमं प्रवहजं विषुवद्दिनोत्थम् । ७५ ।
श्रृंगों को मिलाने वाली रेखा (चन्द्र व्यास) के बराबर व्यास से दोनों बाहरी
बिन्दुओं के केन्द्र से वृत्त खींचेंगे । इससे चन्द्रमा अपने क्रान्ति मार्ग पर चलता
हुआ लगेगा । पूर्व बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के केन्द्र से जाती दक्षिणोत्तर
रेखा पर (याम्योत्तर वृत्त पर )
व्यक्षोत्तरे वसुभुजानल (३२८) योजनस्थे देशेऽगच्छत धनः पथ सम्मुखीनम् ।
तस्मान्नतस्य पलजेवलनेन जीवा ग्राह्यानोत्थ वलनेऽपिन कोटि जीवा ।७६।
निरक्ष (विषुव रेखा) से ३२८ योजन उत्तर (२३° २७' अक्षांश - कर्क रेखा)
के स्थान पर क्रान्ति वृत्त की पूर्व से पश्चिम गति चाप आकार में ही (विषुव दिन
को) दिखाई देगी । यह वास्तव में सीधी रेखा (गोल पर) है जो समतल के चित्र
में वक्र दिखायी देती है अतः अक्ष या आयन वलन में ज्या या कोटिज्या की
जरूरत नहीं है ।
मध्यसूत्रादुदिग् दक्षिणान्तावधि ज्यात्मकं मानमेवात्र निश्चीयते ।
मध्यसूत्रादवः क्रान्तिमार्गान्तरं क्रान्ति जीवाक्ष जीवातु के न्द्रोद् भवेत् ।७७।
पूर्व पश्चिम वृत्तों की ज्या रूप रेखा, वृत्त की परिधि तथा दोनों ध्रुवों के बीच
सभी याम्योत्तर रेखाओं पर लम्ब है । अतः इस रेखा पर पूर्व से पश्चिम (मध्य सूत्र
से दूरी से क्रान्ति ज्या का मान होता है (यह अक्षांश वृत्त हुआ) अतः क्रान्ति ज्या
पूर्व पश्चिम रेखा (वृत्त केन्द्र से) की दूरी से निकाली जाती है । इसी प्रकार अक्षज्या
उत्तर दक्षिण रेखा (देशान्तर रेखा) पर की दूरी से निकाली जाती हैं ।
स्फुरति धरणी भाया बिम्ब बाह्ये समन्ता
द् वलय सदृश मस्या अञ्चलं पञ्च लिप्तम्
तद वतमस संज्ञयं तत्कुभाक दिक् (१०) कलाढ्या
मलिनयति सितांशो रन्तम ग्रस्तमूर्तेः । ७८ ।
(चन्द्र कक्षा में ) पृथ्वी की छाया के चारों ओर ५ कला अवतमस (कम
अन्धकार वाली छाया) होती है । इसको जोड़ने पर भूभा (पृथ्वी की छाया) का
व्यास १० कला अधिक होता है । १० कलायुक्त भूछाया चन्द्रमा को (ग्रहण के
अतिरिक्त) अन्य समय भी ढंकती है (इस समय ग्रहण नहीं दिखता है पर चन्द्रमा
का प्रकाश कुछ मन्द होगा)

ग्रहण-द्वय प्रकाश: चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण सूक्ष्म-साधन (अध्याय ९-१२)

१४४ सिद्धान्त दर्पण
अथ त्रिभाग स्तमसो विपूर्वतः कुभान्तलग्नोऽपि घनस्तमस्तया
मतस्तदाढ्या क्रियतं तमोमितः पुनर्विधोरन्तर दूरवृत्तिजात् । ७९ ।
पृथ्वी की छाया से लगा अवतमस का १/३ भाग अत्यन्त काला है अतः मुख्य
छाया से मिल जाता है। अतः भू छाया बिम्ब में अवतमस का १/३ भाग (अर्थात्
१०/३ कला) जोड़कर बिम्ब मान गिना जाता है। चन्द्रमा पृथ्वी से दूर या निकट
होने पर भी उस कक्षा में पृथ्वी की छाया में अन्तर होता है ।
तमः क्षयर्दीक्षणतः क्रमेणत द्वनर्णगत्यादिफलाष्ट दो (२८) र्लवः
वियुक्त युक्त स्तमसीति तत् स्फुटं भवेत्ततः स्पष्टतमः शशिग्रहः । ८० ।
भू छाया बिम्ब का परिणाम रवि के पात के निकट रहने पर घटता है और
पात से दूर (९०°) जाने पर बढ़ता है। अतः रवि गति फल का १/२८ भाग छाया
बिम्ब में घटाया या जोड़ा जाता है (मध्य मान से)
विधोर्मानं तस्मात् शरगुण (३५) हतं विश्व (१३) विहृतं
पुनः सूर्य स्वर्णाभिध गतिफलाद्धौ नित युतम् ।
तमोमानं तत् स्यदिति नयन सिद्धं शशिनिति
प्रभृत्युक्तं पूर्वं मतमिद मुथा देय मखिलात् । ८१ ।
अतः चन्द्र बिम्ब कला को ३५ से गुणा कर १३ से भाग देते हैं । फल में
सूर्य गति फल (धन या ऋण) क्रम से घटाते या जोड़ते हैं (उल्टे क्रम से) इससे
भूछाया का दृक् सिद्धमान आयेगा) चन्द्र बिम्ब का कला मान निकालने की विधि
पहले कही जा चुकी है। यह रीति अत्यन्त उपयोगी और स्मरण करने लायक
है।
कक्षायां शशिन स्तिरोहिततनोःस्याद् गोल केन क्षिते
र्भानो र्यावदनीक्षणं भवति तन्मानं कुभा यद्यपि ।
दृष्टेऽर्कस्य नखां (२०) शकेऽपि परित श्छाया समेवेक्ष्यते
मध्येन्दोः पथि दूर सन्निधि जुषोऽनल्पल्प सूर्यांशयोः । ८२' ।
पृथ्वी सूर्य के चारों और घूमने के कारण पृथ्वी की छाया घूमती है, चन्द्र
कक्षा में इसके मान के अनुसार ही वहां पर के बिम्ब को ढंकता है। अतः चन्द्र
कक्षा में ही इसका मान लिया जाता है। सूर्य से दूरी घटने बढ़ने के कारण बिम्ब
छाया में १/२० भाग का अंतर आता है। चन्द्रमा की दूरी घटने बढ़ने से भी
चन्द्रकक्षा में इस बिम्ब मान में अन्तर आता है। पर यह सूर्य के अन्तर की तुलना
में अत्यन्त कम होने के कारण इसकी गणना नहीं होती ।
. अत्रायं गणित क्रमः स्वदश भागो ( ७२००) नार्क
बिम्बः (६४८००) क्षिति व्यासो (१६००) नः

चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४५
(६३, २००) शशि मध्य कर्ण (४८७०५) गुणितः
(३०७,८१,५६,०००) स्पष्टार्क कर्णोद्धृतः
लब्धो नाक्षिति विस्तृतिः शशभृतः कक्षागतक्ष्माप्रभा
मानं स्या त्रिगुणा (३४३८) हतं स्फुट शशिश्रुत्याप्त मेतत्कलाः । ८३ ।
अब भूभा गणना की विधि दी जाती है । सूर्य बिम्ब व्यास से उसका १/१०
घटाकर (७२,०००-७,२०० = ६४,८००) उससे भूव्यास (१६०० घटाते हैं )
(६४,८००-१,६०० = ६३,२००) इसको मध्यम चन्द्र कर्ण (४८,७०५) से गुणा कर
(३,०७,८१,५६,०००) स्पष्ट सूर्य कर्ण से भाग देते हैं । फल को पृथ्वी व्यास से
घटाकर चन्द्र कक्षा में पृथ्वी छाया का बिम्ब मान होगा । इसको त्रिज्या (३४३८)
से गुणा कर स्फुट चन्द्र कर्ण से भाग देने पर पृथ्वी छाया बिम्ब (चन्द्र कक्षा में)
का कला मान होगा ।
तमो बिम्ब व्यासेऽम्बरकृतः (४०) कलो ने स्फुरतियो-
ऽन्तरे वृत्तः सारः सघनतर उक्तोऽन्धतमसम् ।
शरेऽल्पे तस्यान्तः प्रविशति यदा शीत किरण
स्तदातिम्लानः स्यान्निविड़ तम घूमां वृत इव । ८४ ।
पृथ्वी का छाया बिम्ब मान निकाल कर उससे ४० कला घटाने पर पृथ्वी
छाया का अन्धतमस मान होगा । यह अत्यन्त काला है । शरकला बहुत कम
होने पर चन्द्र इस अन्धतमस में प्रवेश कर अविम्लान या अति काला दिखता है ।
ग्रस्तेऽल्पीयसि भाग के सितरुचो वर्णो नभः साम्यभा-
र्गल्पे धूम निभो दले कवलिते कृष्णोऽर्द्ध भागधिके
रक्त श्याम रुचि र्भवेच्च सकल ग्रासक्षणे पाटलो ।
भू भा मध्यगतस्य पिङ्गल रुचि र्भानोः सदैवासितः । ८५ ।
अति अल्प चन्द्र ग्रहण होने से ग्रस्त आकाश नीला पड़ जाता है । अर्द्ध
ग्रहण में काला दिखता है । आधा से अधिक ग्रहण में लाला काला दिखता है ।
पूर्ण चन्द्र ग्रहण में ग्रस्त अंश पाटल पड़ जाता है । पृथ्वी छाया के बीच में चन्द्र
रहने पर उसका रंग पीला हो जाता है । सूर्य ग्रहण में यह सब नहीं होकर हर
समय ग्रस्त अंश (चन्द्रमा) काला दिखता है ।
क्षुद्रक्षपाकर त्वनुः क्षयितार्द्ध बिम्बो
भानुर्भवेन्निशित शृंग युगोऽतिनिम्नः
चन्द्रोऽर्द्ध खण्डित तनु स्तमसो महत्वा
दीषद् गभीर इव कुण्ठित शृंग युग्मः । ८६ ।
सूर्य बिम्ब की तुलना में चन्द्र बिम्ब हमेशा छोटा होता है । अतः सूर्य ग्रहण
के अर्द्धग्रास के समय सूर्य शृंग तीक्ष्ण होता है । पर चन्द्र ग्रहण में चन्द्र बिम्ब की
तुलना में पृथ्वी छाया का बिम्ब बड़ा होता है । अतः चन्द्र के अर्द्ध ग्रास के समय

१४६ सिद्धान्त दर्पण
शृंग मोटा दिखता है । छोटे वृत्त में बड़े वृत्त से काटने के कारण ऐसा होता है ।
अकृत कृतक राहुं यस्तमस्त्वात् कुभारूपं
विशति शशिनितस्मिन् नागमैर्दीक्षितानाम् ।
वितरति मन्त्रसिद्धि यश्च सद् वैष्णवानां
सदिशतु कुशलं नः श्याम शैलावनीशः । ८७ ।
कृष्ण वर्ण होने के कारण पृथ्वी की छाया राहु के समान है जिसमें चन्द्र
प्रवेश करने के समय नीलाचल वैष्णवों और तान्त्रिकों को मन्त्र सिद्धि देते हैं, वे
हम लोगों का मंगल करें ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृते गणितेऽसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
चन्द्र ग्रहोऽष्टम इतः सुभगः प्रकाशः । ८८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
और फल में समानता तथा बच्चों की शिक्षा के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण में चन्द्र
ग्रहण के विस्तृत विवरण सहित आठवां अध्याय समाप्त हुआ ।

नवमः प्रकाशः
सूर्य ग्रहण वर्णनम्
पूर्व प्रकाश उदितम् ग्रहणद्वयस्य साधारणं सकल कर्मरवि ग्रहेतु
यल्लम्बनावनतिकर्म ततोऽविशिष्टं मानान्तरञ्चशशिनस्तिदिह प्रवक्षे । १ ।
पिछले प्रकाश में चन्द्र और सूर्य दोनों के ग्रहण की सामान्य चर्चा हुयी है ।
लेकिन इसके अतिरिक्त सूर्य ग्रहण में लम्बन तथा नत निकालने की आवश्यकता
होती है तथा चन्द्र का बिम्बमान भी सूर्य ग्रहण के लिए दूसरा होता है । अतः
इन तीन बातों की विशेष व्याख्या इस अध्याय में होगी ।
दर्शान्तगौ समकलौ क्षितिगर्भसूत्र,
स्युतावपि द्युमणि चन्द्रमसौ न पश्येत्
यद्रोल पृष्ठ गतमानव एक सूत्रे,
सार्द्धान्यतोऽवनति लम्बन सम्भवोस्यात् । २ ।
अमान्त में रवि और चन्द्र दोनों की राशि अंश कला आदि समान होने पर
भी केवल मध्याह्न समय में एक सीध में दीखते हैं । अन्य समय पृथिवी केन्द्र तथा
पृष्ठ के सूत्र में वे नहीं दीखते हैं । अन्य समय में ऐसा क्यों और कब होता है ।
यह इस अध्याय में कहा जायेगा । आकाश में मध्य क्षेत्र में सूर्य चन्द्र रहने पर
लम्बन और नत (केन्द्र तथा पृष्ठ से दिशा में अन्तर) नहीं होता है ।
सूक्ष्मेन्दु सूर्य जनित स्फुट दर्शनाशो
यस्मिन् सकाल उदितः समपर्व नामा
तत्संस्कृतः स निजलम्बनानाड़िका द्यै
र्भास्वद् ग्रहच्छदन मध्य इहस्फुट स्यात् । ३ ।
रवि और चन्द्र को स्फुट करने पर उससे जो स्फुट दर्शान्त होगा उसी को
समपर्व काल कहा जाता है । इस समपर्व काल में लम्बन संस्कार करने पर वह
सूर्य ग्रहण में ग्रास मध्यकाल होता है । यही स्फुट अमान्तकाल होता है ।
एकानतिश्चन्द्र मसोऽपिसूर्यात् प्राक् पश्चिम्स्ते द्विह लम्बनाख्या
याम्योत्तरस्थेऽवनितिः स्वमध्य स्थिते सितांशौ न हिते भवेताम् । ४ ।
अमान्त काल में सूर्य से चन्द्र की दिशा में अन्तर होता है उसे ही लम्बन
कहते हैं । यह अन्तर (पृष्ठ देश से देखने के कारण) पूर्व पश्चिम दिशा में होने पर
लम्बन कहलाता है । दक्षिण उत्तर दिशा में होने पर इसका नाम नत कहलाता
है । आकाश मध्य में रविचन्द्र दोनों रहने पर दोनों का केन्द्र से जो सूत्र है उसी
पर पृष्ठ देश रहता है अतः लम्बन या नत नहीं होता ।
सलम्बनं वित्रिभ लग्न तुल्ये भवेद् विधौवित्रिभ लग्न जाते
सौम्यापमे स्वाक्ष समान भाग सम्भवे ञ्चावनति र्हिमांशोः । ५ ।

१४८ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र वित्रीभ (दशम लग्न) समान होने पर स्फुट लम्बन नहीं होता है। वित्रीभ
लग्न की उत्तर क्रान्ति देश के अक्षांश के समान होने पर चन्द्र का नत भी नहीं
होता।
त्रिभोन लग्नोदगपक्रमेक्षोऽधिके च सौम्यानत रन्यथा सौ
याम्या भवेत् पर्वणि चन्द्र भान्वोः साम्या न्नतो ते रवितः सुसाध्ये । ६ ।
वित्रीभ (दशम) लग्न की उत्तर क्रान्ति अपने अक्षांश से अधिक होने से चन्द्र
की उत्तर नति होती है। वित्रीभ लग्न की उत्तर क्रांति अक्षांश उत्तर से कम हो
या दक्षिण क्रान्ति हो तो दक्षिण नति होती है।
अमावास्या में चन्द्र और सूर्य की राशि आदि अवयव समान होने के कारण
नति (उत्तर और दक्षिण दिशा) से ही साधन करना सुविधाजनक है।
तात्कालिकाकार्त् समपर्वलग्नमानीय तस्मात् सदन त्रयोनात्
क्रान्तिं समानीय निजाक्ष भागैस्त्याग योगौ पृथगेक दिक्त्वे । ७ ।
स्फुटाधिकार के नियम से तात्कालिक रवि का साधन कर उससे समपर्व
काल का लग्न निकालेंगे। उससे ३ राशि घटाकर (वित्रीभ) लग्न से पुनः क्रान्ति
साधन होगा। यह क्रान्ति और अक्षांश भिन्न दिशा में होने से अन्तर और एक
दिशा में होने से योग होगा।
कार्यावितस्यु स्त्रिभहीन लग्न नतांशकास्ते नवते र्विशोध्याः
शेषो भवत्युन्नत भाग संह क्रमज्यकास्य स्फुट दृग् गति स्यात् । ८ ।
फल वित्रीभ लग्न का नतांश होगा (उसको ३ राशि (९०°) से घटाने पर
वित्रीभ का उन्नतांश होगा। इस उन्नतांश की क्रमज्या को ही स्फुट दृग् गति
कहा जाता है।
विश्वम्भरा गोल दलं रविन्दोः कक्षागतं कल्पित मुक्तरीत्या
लिप्तीकृतं चे त्परमे नतीस्त स्तदन्तरं चान्य नति र्ग्रहे स्यात् । ९ ।
सार्द्ध योजन को रवि और चन्द्र कक्षा में मान कर उसकी कला निकालने
पर वह कुच्छन्न कला होती है। इतना ही क्रमशः रवि और चन्द्र की परम नति
होती है। इन दोनों नतिका अन्तर सूर्यग्रहण में परम नति होती है।
यद् वार्क भुक्तेः कृतभूप (१६४) भागः शक्रांश (१४) ऋक्षे शगतेर्नति
स्यात् परातयो रन्तर जा विलिप्ता श्रन्द्रार्क गत्यान्तर लिप्तिकाप्ताः । १० ।
सूर्य की दैनिक गति
सूर्य परम नति = ——————————
१६४
चन्द्र की दैनिक गति
चन्द्र परम नति = ——————————
१४
रवि और चन्द्र की परम नति के अन्तर की विकला बनाकर उसमें रवि और

सूर्य ग्रहण वर्णनम् १४९
चन्द्र की गति के अन्तर की कला से भाग देने पर दण्ड आदि परम लम्बन होगा ।
नाड्यादिलब्धं स्फुट दृग् गतिघ्नं राशित्रयज्या विहृतं फलञ्च
अन्त्यं भवेल्लम्बन नाड़िकाद्यं तत्प्राणतो ज्या पर संज्ञका स्यात् । ११ ।
दण्ड आदि परम लम्बन को इष्ट काल के वित्रीभ शंकु (दृग् गति ) से गुणा
कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर यह लम्बन का अन्त्या होता है । इसका असु
बनाकर उस की ज्या को पर कहा जाता है ।
शताहता भूप भुजै (२१६) विभक्ता सादृग् गतिर्लम्बन कृत्यरोवा
त्रिभोनतग्नोष्ण करान्तरोत्था दोर्ज्या परघ्नी त्रिगुणे ( ३४३८) हृताचा । १२ ।
स्फुट दृग् गति (विचित्र शंकु) को (१००) से गुणा कर (२१६) से भाग देने
से भी यही 'पर' आयेगा अब वित्रीभ लग्न तथा रवि की अन्तर ज्या को पर से
गुण कर त्रिज्या से भाग देने पर-
स्याल्लम्बन ज्या फल मस्य चापं प्राणात्मकं लम्बन मेतदर्के
त्रिभोन लग्नात् पर पूर्व दिक् स्थे क्रमाद् युतोनं समपर्व काले । १३ ।
लम्बन ज्या होती है । इसका चाप (असु या प्राण में) स्फुट लम्बन है ।
वित्रीभ लग्न से सूर्य पश्चिम (कम राशि होने पर लम्बन को समपर्व काल में
जोड़कर या सूर्य से पूर्व (वित्रीभ लग्न का राशि अंश सूर्य से कम होने पर)
समपर्व काल से उसे घटाकर स्फुट समपर्व काल बनाते हैं ।
तत्काल सम्भूत रवि त्रिभोन लग्नो नत ज्या पर मौर्विकाभिः
अर्क त्रिभोनान्तरतोऽपि भूयस्तल्लम्बनं पूर्ववदेव साध्यम् । १४ ।
इस प्रकार स्फुट समपर्व काल से स्फुट रवि और वित्रीभ लग्न निकालते
हैं । तथा उसके अन्तर से पुनः पहले की तरह लम्बन का साधन करते हैं ।
तत्संस्कृतात् तत्समपर्व कालात् पुनर्नतादौ रवि लम्बनञ्च
स्थिरेऽसकृत्कर्म वशादि हेतत् संस्कार योग्यं स्फुट लम्बनं स्यात् । १५ ।
इस प्रकार बार बार करने पर दो पर्वकाल के बीच अन्तर नहीं रहने पर वह
स्फुट पर्व सम काल होगा । दो लम्बनों के बीच भी अन्तर नहीं रहने पर वह
स्फुट लम्बन कहा जायेगा ।
वक्ष्ये सकृल्लम्बन कर्मसूक्ष्म लग्नार्क यो रन्तरतः प्रसाध्ये
दोः कोटिजीवे परबाहु जीवान्तरस्य वर्गाद्युत कोटिवर्गात् । १६ ।
एक बार में सूक्ष्म लम्बन निकालने की विधि अब मैं कहता हूँ । सम पर्व
काल के लग्न तथा रवि निकाल कर दोनों के अन्तर की भुजज्या ओर कोटिज्या
निकालें ।

१५० सिद्धान्त दर्पण
पूर्व श्रुतिः कोटिगुणा त्परघ्नात् श्रुत्या हृताद्यत्फलमस्य चापः
मध्यो भवेल्लम्बन जासु संघस्थ त्संस्कृता मान्तज दृग् गतिघ्नः । १७ ।
पहले कहे गये परज्या और भुजज्या के अन्तर का वर्ग तथा कोटिज्‍या का
वर्ग जोड़कर उसका वर्ग मूल लेने से कर्ण होगा । कोटिज्‍या को ‘पर’ से गुणा
कर लम्बन का कर्ण से भाग देने पर मध्यम क असु आता है । इस मध्यम लम्बन
में से समपर्व काल का संस्कार कर उसका की दृग् गति से मध्यम लम्बन का
गुणा करेंगे । तथा
स आद्यया दृग् गति जीवयाप्तो विस्पष्ट तां गच्छत भास्करोक्त-
किन्त्वेषमध्यादधिको यदिस्यात्तदा स्वमध्यान्तर जा सुवर्गात् । १८ ।
आद्य दृग् गति से भाग देने से स्फुट मध्यम (भास्करोक्त) लम्बन आता है ।
यह मध्यम लम्बन से अधिक होने पर दोनों के अन्तर असु से वर्ग को-
द्वाभ्या हतान्मध्यम लम्बनामात् फलेन युक्तः करणीय एव
तल्लम्बनं भूयइनेन्दु मध्य गत्यन्तर (७३१) घ्नं प्रथमेन्दु भान्वो । १९ ।
दो से गुणा कर मध्य लम्बन से भाग देकर लब्धि को मध्य स्फुट लम्बन में
जोड़ेंगे । इस प्रथम और द्वितीय स्फुट लम्बन से किसी को लेकर उसे रवि और
चन्द्र की मध्यम गति के अन्तर ( ७३१) से गुणा कर प्रथम स्फुट चन्द्र तथा रवि
के
गत्यन्तरेणोद् धृत मेव कार्य द्विधोदितं स्पष्टतमं भवेद्धि ।
परिष्कृतो लम्बन नाड़ि काद्यै दर्शान्त एव स्फुट पर्वनामा । २० ।
गति अन्तर से भाग देंगे । इससे भास्करीय स्फुट लम्बन अति स्फुट होता
है । इसी प्रकार स्फुट लम्बन नाड़िका द्वारा पहले की भांति दर्शान्त का संस्कार
करने से स्फुटतम पर्वकाल आता है ।
षड् भै (२७६) र्हता लम्बन सिद्ध काल लग्नस्फुटाक्र्कान्तर कोटि जीवा
त्रिज्या हतं दृग् गति ताड़िताप्ता त्रिभज्य या लम्बन जा विनाड्यः । २१ ।
(अथवा) स्फुट पर्व काल के स्फुट लग्न और रवि मिल कर दोनों के अन्तर
की कोटिज्‍या को (२७६) से दृग् गति से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर लम्बन
की विनाड़ी आती है ।
भवन्तिताः प्राग्व दिनेन्दु मध्य गत्यन्तर (७३१) घ्नाः स्फुटजान्तराप्ताः
काले स्फुटे योग वियोग वाम्यात् परिष्कृताश्चेत्सम पर्वकालः । २२ ।
इस लम्बन विनाड़ी को पहले की तरह रविचन्द्र के गति अन्तर ( ७३१) से
गुणा कर दोनों के स्फुट गति अन्तर से भाग देने पर प्राप्त फल से स्फुट पर्व का
विपरीत संस्कार करने से समपर्व काल होगा ।

सूर्य ग्रहण वर्णनम् १५१
इत्थं प्रसाध्य ग्रहमध्यकालं चन्द्र ग्रहेया स्थित खण्ड सिद्धयै
अन्त्या स्फुटा चन्द्र गतिः पुरोक्ताः तयाहतं लम्बन नाड़िका द्यम् । २३ ।
इस प्रकार ग्रह मध्यकाल का साधन करने पर चन्द्र ग्रहण स्थित्यर्द्ध जानने
के लिए ग्रहण के लिए उपयोगी चन्द्र की अन्तिम स्फुट गति (पहले दिया गया
है-षष्ठ अध्याय में ) निकाल कर उसमें लम्बन स्फुट घटिका को गुणा करेंगे।
षष्ट्याप्तमेतत् फलहीन युक् चेत् प्रोक्त पर्व जार्कः स्फुट शीतगुः स्यात्
पातो दिगंशाक्ष फलेन सिद्धः कार्यस्तदूनात् शशिनः शरश्च । २४ ।
गुणनफल को ६० से भाग देकर लब्धि को समपर्व काल के सूर्य में जोड़ेगे
या घटायेंगे जिस प्रकार लम्बन का करते हैं। चन्द्र पात का दिगंशफल से संस्कार
उसे स्फुट चन्द्र से घटाकर शर निकालेंगे।
आनीय भानो स्फुट पर्व लग्नं त्रिभोन लग्नं तदपक्रमौ च
उदक् शरो ना यमदिक् शराढ्यः स्वदेश जाक्ष स्तुभवेत्