सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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(समकाल) में चन्द्र और सूर्य का अन्तर ६ राशि होने पर चन्द्र ग्रहण का मध्य
काल होता है ।
ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब मान को जोड़कर उसके आधे के वर्ग को स्फुट शर
के वर्ग से घटाते हैं और शेष का मूल निकालते हैं । उसको ६० से गुणा कर
सूक्ष्म चन्द्र और रवि की गति के अन्तर से (भाग देते हैं)
भक्त तत्फल नाड़िकाः सपलका स्थित्यर्द्धजा मध्यमा
ग्राह्य प्रोज्झित मान योग दलत, स्वाध्या वियुक्तादिषोः ।
कृत्य शेषपदात् पुरेवघटिका मध्या विमर्दार्द्धजाः
पर्वान्तः स्थिति मर्दखण्ड वियुतस्तद् युक् क्रमा दुत्क्रमात् । ४२ ।
भागफल ग्रहण स्थिति का आधा समय (नाड़ी में ) होता है । इसका दो
गुणा करने पर ग्रहण का पूर्ण समय आता है ।
इसी प्रकार ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब का अन्तर कर उसके आधे के वर्ग को
उस समय के शर वर्ग से घटाते हैं । अब शेष का मूल निकाल कर उसमें ६०
से गुणा कर उसमें चन्द्र और सूर्य के गति अन्तर से भाग देते हैं । फल विमर्द
आधे का घटी आदि होता है । इसको दो में गुणा करने पर मर्द काल आता है ।
समपर्वान्त काल में स्थित्यर्द्ध तथा मर्दार्द्ध काल घंटाने पर क्रमशः स्पर्श और
निमीलन का समय आता है ।
मध्ये स्पर्श निमीलने च भवति श्रोन्मीलने न्मोक्षकौ
तत्तकालिक पात सूक्ष्म शशिजे बाणैः पुनः साधिताः ।
स्पर्शाद्या असकृत् क्रिया स्थिरतराः स्पष्टास्यु रिन्दो रवे -
स्वेते स्व स्व विलम्बनैः सह परिस्पष्टाः मुहुः संस्कृताः । ४३ ।
समपर्वान्त काल में स्थिति अर्ध तथा मर्दार्ध जोड़ने से मोक्ष तथा उन्मीलन
समय आता है । इस मोक्ष तथा उन्मीलन आदि समय में पात और सूक्ष्म चन्द्र
साधन कर उससे शर निकाल कर पुनः स्पर्श मोक्ष आदि समय निकालना चाहिये ।
इस प्रकार ग्रहण का स्थिरतर मान आता है । सूर्यग्रहण में स्फुट स्पर्श आदि काल
आने पर उसमें बार बार लम्बन संस्कार कर स्पष्ट समय निकाला जाता है ।
वक्ष्याम्यत्र विशेष मीश (११) गुणितं मध्य ग्रहेषोर्दलम्
सूर्येन्द्वन्त्य गत्यन्तरोद्धतमिषौ स्याद् वर्द्धमाने फलम्
नाड् याद्यं वियुतं युतं त्वितरथा पर्वण्यतः तत् स्फुटं
तुत्कालेन्दु शरा द्य पर्व शरयो रन्तर्विलिप्ता कृते । ४४ ।
बार बार संस्कार की जरूरत नहीं पड़े ऐसी विधि, अब मैं बताता हूँ । समपर्व
काल का शर निकाल कर उसके आधे को चन्द्र और रवि को गति के अंतर से
भाग दें । लब्धि दण्ड आदि को समपर्व काल शर से घटाते हैं, यदि बढ़ रहा
हो, अन्यथा जोड़ते हैं । इससे पर्व स्पष्ट होगा । इस पर्व काल से फिर पात, सूक्ष्म