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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३५
यद्वा विपादेन्दु भुजोत्थ लिप्ता नृपां (१६) श हीना गिरिशै (११) र्विभक्ताः ।
फलं शरः पात विहीन चन्द्रः बाहोर्गृहाद्धार्द्ध वधि कल्पनीयः । ३८ ।
अथवा चन्द्र से पात घटाकर उसेक भुज की कला बनायेंगे । उसमें उसका
१/१६ जोड़कर ११ से भाग देंगे । फल शर होगा । इस प्रकार शर विपात चन्द्र का
१५ अंश तक भुजांश होने पर निकाला जा सकता है । भुजाश ज्यादा होने पर
इस विधि से भूल होगी ।
छाद्य छादक मान योगय दलतो न्यूनः शर श्चेत्तदा
ग्रासः स्यान्न शरेऽधिके स्फुटतरे तन्मान यो गार्द्धतः ।
प्रोज्झ्ये षष्ठ शरंच शिष्ट कलिकाच्छन्ना भवन्त्येव ता-
श्छायाद्याद्य धिका स्तदैव सकल ग्रासोऽम्बर व्यापकः । ३९ ।
ग्राह्य (छात्र) और ग्राहक (छादक) बिम्ब मान जोड़कर उसके आधा से शर
कम होने पर ग्रास होता है । शर इस से ज्यादा होने पर ग्रहण नहीं होता है ।
बिम्ब योग का आधा से शर घटाने पर जो शेष है वही ग्रास होता है । ग्रास का
मान ग्राह्य (छाद्य) से अधिक होने पर पूर्ण ग्रास होता है । ग्रास से ग्राह्य घटाने
पर जो बचता है, उतना आकाश का ग्रास होता है ।
स्पर्शश्चन्द्रमसः पुरोदिशि रखेः पश्चाद् मिवोक्षो न्यदिक-
प्रायः स्यान्न निमीलनं हि सकलं ग्राह्या पिधान क्षणः
तत्रोन्मीलन मेव किञ्चि दुदिते स्वच्छादकान्मण्डले
तन्मध्ये दृग्गोचरांश्रु रुदितो ग्रासो विमर्दाभिधे । ४० ।
चन्द्र ग्रहण का स्पर्श प्रायः पूर्व दिशा में तथा मोक्ष प्रायः पश्चिम दिशा में
होता है इस नियम से गणना होती है । लेकिन सूर्यग्रहण प्रायः पश्चिम दिशा में
स्पर्श तथा पूर्व दिशा में मोक्ष की गणना की जाती है । पूर्व पश्चिम गणना के
बदले कभी कभी दक्षिण उत्तर की भी गणना होती है । अतः पूर्व पश्चिम के साथ
प्रायः शब्द का प्रयोग हुआ है ।
जिस समय ग्राहक बिम्ब ग्राह्य बिम्ब को ढंग कर रखता है उसे निमीलन
समय कहते हैं । ग्राह्य बिम्ब ग्राहक बिम्ब से बाहर निकलने के समय को उन्मीलन
समय कहते हैं । निमीलन से उन्मीलन तक का समय मर्द काल कहते हैं । कोई
कोई इसे विमर्द काल भी कहते हैं ।
पर्वान्तः समलिप्ति केन्द्र रवि जो भार्द्धे च चक्रे क्रमा
चान्द्रस्य ग्रहणस्य मध्य समय सौरस्य सल्लंबनः
मानैक्यार्द्ध कृतेः स्फुटाशुगकृतिं प्रोज्झ्यावशेषात्पदं
षष्ठ्या सं गुणितं दिनेश शशिनोः सूक्ष्म स्व भुक्त्यन्तरा । ४१ ।
रवि और चन्द्र की राशि, अंश और कला तक समान होने पर जो पर्वान्त
निकलता है । उसी को सम पर्वान्त (अमान्त या पूर्णान्त) कहते हैं । इस अवस्था