सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ सिद्धान्त दर्पण
कुजादि पातेषु यथा तुरीय फलस्य वाच्यो धन हीन भावः
तथा दिगंशारुय फलेन राहुः सूक्ष्मः स्फुट स्सूर्य शशीव कार्यः । ३३ ।
मंगल आदि तारा ग्रहों के पात में जिस प्रकार चतुर्थफल जोड़ा या घटाया
जाता है उसी प्रकार राहु के दिगंश फल को भी जोड़ने या घटाते हैं । दिगंशफल
चन्द्रमा में जिस प्रकार संस्कार किया जाता है । उसी प्रकार राहु का दिगंश फल
भी निकाला जाता है तथा संस्कार होता है ।
पातोन तात्कालिक चन्द्र दोर्ज्या स्वाष्टाग्नि (३८) भागेन युताद्धिंतात ।
चापीकृता षड् विहता फलं स्यात् कलादिकं स्पष्ट शरं सुधांशो । ३४ ।
स्फुट पर्वान्त कालिक चन्द्र निकाल कर उससे चन्द्र स्फुट पात घटाते हैं ।
फल की भुजज्या निकालते हैं । यह विक्षेप केन्द्र ज्या है । इसमें उसका १/३०
भाग जोड़ते हैं । फल को आधा कर उसका चाप निकालते हैं । इस चाप को ६
से भाग देने पर चन्द्र का कलादि स्पष्ट शर निकलता है ।
विपातचन्द्रस्य षषट्क आद्ये सौम्ये द्वितीये सच दक्षिणः स्यात् ।
क्षिति प्रभारोपण तो विलोम श्चन्द्र ग्रहे दिक शर एव वेद्यः । ३५ ।
पात हीन चन्द्र मेष आदि ६ राशि में रहने पर चन्द्र शर उत्तर दिशा में होता
है, पात हीन चन्द्र तुलादि ६ राशि में हनि पर चन्द्र शर दक्षिण दिशा में होता
है । ग्रहण परिखेख के समय इस शर को भू स्थान में उल्टे तरफ दिया जाता है ।
चापं बिना कोटिफलं तथास्य युत्याहतं पात शशांक गत्योः
त्रिज्याहतं बाणगति स्फुटा स्यात् तत् संस्कृतेः क्रान्ति गतेः स्फुटत्वम् । ३६ ।
(शर की अन्य विधि) चाप करने के बदले, शर के कोटिफल को चन्द्र और
उसके पात की गति योग से गुणा करते हैं । गुणन फल को त्रिज्या से भाग देने
पर शर (चन्द्र शर) की स्फुट गति होगी । इस गति में क्रान्ति गति का संस्कार
करने से वह स्फुट शर गति होगी ।
लेख्यं विपातेन्दु भुजाब्धि पक्ष (२४)
खण्डै शरांशादि सहान्तरं वा
कोटिफलं तद् गति योग निघ्नान्तरं
गतिस्तत्व यमा (२२५)प्ता मिष्या । ३७ ।
चन्द्र से चन्द्र पात घटाकर उसका भुज निकालेंगे । उस भुजांश से शर आदि
निकाला जा सकता है । इसके लिए ९० अंश के वृत्त पाद से ज्या निकालने की
तरह २४ ज्या (भुजज्या) कर प्रत्येक खण्ड का शर, शरान्तर, कोटिफल भुजफल
आदि निकालना परिशिष्ट के विक्षेप खण्ड में दिया गया है ।
उस विपात भुजांश से शर आदि निकालना सुविधा जनक है । यह सब
२२५ कला के अन्तर पर दिया हुआ है ।