सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
नानाविध संस्कार वर्णन ४१
सिद्धान्त क्रम संसिद्ध स्फुटीकरण लेखनात् ।
अनन्तरं फला न्येषां लेखिष्यन्ते यथाक्रमम् । ५५ ।
सिद्धान्त ग्रन्थ की परम्परा के अनुसार पहले पदक उसके बाद स्फुट ग्रह के
लिए खण्डफल लिखे गये हैं ।
इति खग भगणेभ्यः प्राक् फलैः संवद्धभ्यो
ध्रुवगति पद लेखा लेखि सौरूयार्थमेषा
खचर विषम भावे द्रक्षमाणेतु भुक्ति-
ध्रुव पदक कृति स्ताद् वक्ष माणोत्तरार्धे । ५६ ।
आसानी से ग्रह स्फुट करने के लिए फल ध्रुव गति आदि उनकी सारणी
सहित, १,२,३...दिन क्रम से लिखे गये हैं । पदकों के द्वारा ग्रह स्फुट करने पर
यदि उस स्थान में ग्रह प्रत्यक्ष नहीं हो तो ग्रन्थ के उत्तर भाग में दैनिक गति, ध्रुव
पदक कृति आदि देखकर उसे शुद्ध करें ।
यत्रोरान्ति चिरन्तनाः सभकलां वेदांगुला ।४।२७ मक्षभां
प्राग् देशान्तर साधितानि विपला न्यब्धि त्रिवेदद्विपान् (८४३४)
तां तान्यष्ट कलोनितां ।४।१९। फणिगुणक्ष्मांकां (९१३८) न्वास्ताद्गिरौ
राजन् राजतु राज राज सुहृदा गेयौ गिरीशः समे । ५७ ।
पूर्वाचार्यों के मत से अक्षपलभा ४।२७ और देशान्तर विलिप्ता ८४३४ तथा
आधुनिक मत से अक्ष पलभा ४।१९ और देशान्तर विलिप्ता ९१३८ पर स्थित
नीलाचल पर कुबेर मित्र शिव द्वारा पूजित श्री जगन्नाथ हमारे हृदय में विराजमान
हों ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
तुर्योययौ (४) सपद संस्कृतिमान प्रकाशः । ५८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के उज्ज्वल राजवंश में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणित
और प्रत्यक्ष में समानता तथा बाल बोध के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण का संस्कार
तथा पदक युक्त चतुर्थ प्रकाश समाप्त हुआ ।
अथ स्फुटाधिकारः
पञ्चमः प्रकाशः
ग्रह स्फुटी करणम्
अथोच्यते महीनिष्ठ दृष्टि तुल्या स्फुटी कृतिः ।
ग्रहाणां फल दातृत्वं न घटेत यया विना । १ ।
पृथ्वी के किसी स्थान से जिस राशि आदि में ग्रह दिखाई देते हैं, उसी
राशि आदि को गणना द्वारा लाने को ग्रह स्फुट करना कहते हैं । जिस स्थान पर
ग्रह दिखते हैं, उसी के अनुसार फल देते हैं . अतः ग्रह स्फुट करने की विधि
कही जाती है ।
प्रवाहाख्ये मरुद् भूमिं परिक्रामति सर्वदा
पश्चिमाभिमुख स्तेना कृष्टो ज्योतिर्गणोऽन्वहम् । २ ।
पृथ्वी के चारों तरफ प्रवह नामक पवन परिक्रमा कर रहा है । जिससे
आकर्षित हो ज्योतिर्मण्डल (ग्रह नक्षत्र आदि) -
याति यत्पश्चिमा माशा मुदिता साहिकी गतिः .
तां भित्वा यद्ग्रहगणः स्व स्व शक्त्यनुसारतः । ३ ।
पूर्व से पश्चिम की तरफ दिन में एक बार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं । जिसे
दैनिक गति कहा जाता है । नक्षत्रों की तुलना में (उनकी और प्रवह गति की
विरुद्ध दिशा में) ग्रह गण अपनी अपनी शक्ति के अनुसार -
स्तोकेन याति पूर्वाशां सोक्ता स्वाभाविकी गतिः
शीघ्रमन्द वशाद् भिन्ना दृश्यन्ते स्फुट खेचराः । ४ ।
बहुत कम गित से पश्चिम से पूर्व की तरफ चलते हैं । जिसे उस ग्रह की
स्वाभाविक गति कहते हैं । शीघ्र (उच्च) और मन्द ( उच्च) के वश होकर स्फुट
ग्रह अलग अलग स्थानों में दिखते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते-अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्त्तयो भगणाश्रिताः
शीघ्रोमन्दोच्च पातारुया ग्रहाणां गतिहेतवः । इति । ५ ।
(सूर्य सिद्धान्त से) भगण में स्थित शीघ्रोच्च, मंदोच्च और पात नामक काल
की अदृश्य मूर्तियां गृहों की गति के कारण हैं ।
तत्र मध्यम मार्तण्डः परितो मण्डलं भुवः
भ्रमन् तारा खेचराणां कक्षा मध्यस्थ ऊच्यते । ६ ।
मध्यम रवि भगण में पृथ्वी से चारों तरफ नक्षत्र और ग्रहों की कक्षा के मध्य
भाग में परिक्रमा करते हैं ।
ग्रह स्फुटी करणम् ४३
तं भ्रमन्तो महीजाद्या स्तत्संगेन भुवं पुनः
परिक्रामन्ति यत्तस्मात् स प्रोक्तः सर्वकर्षकः । ७ ।
उसी मध्यम रवि के साथ रहते हुये (रवि की परिक्रमा कक्षा में रह कर )
मंगल आदि गृह पुनः पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। अतः रवि को सबका आकर्षक
कहा गया है।
तथापि कुज जीवाकिं भुक्ति भ्यो महती यतः
तद् गतिः सततंस्तेषां शीघ्र तुंगो निगद्यते । ८ ।
मंगल, बृहस्पति और शनि को दैनिक गति से रवि की दैनिक गति अधिक
होती है और सदा वे रवि के आकर्षक में हैं। अत रवि को इन ग्रहों का शीघ्रोच्च
कहा जाता है।
बुध शुक्र स्वभुक्तिभ्या मल्पत्वाद् भास्वतो गतेः
तयोर्मध्य ग्रहो भानुः स्वयं तौ शीघ्र संज्ञ कौ । ९ ।
बुध, शुक्र से रवि की गति अल्प है तथा उनके बीच सदा रवि रहता है।
अतः बुध और शुक्र को ही उन ग्रहों का शीघ्रोच्च कहा जाता है।
बुधशुक्रावनीपुत्र वृहस्पति शनैश्चरकाः
सूर्यात् क्रमेण दूरस्थाः स्व स्व कक्षासु यान्ति यत् । १० ।
सूर्य से क्रमानुसार दूर की कक्षा में बुध, शुक्र, मंगल, वृहस्पति तथा शनि
चलते हैं। अतः
विधिना तत् क्रमेणैव यन्नाल्प गतयः कृताः
सुतरामेव दृश्यन्ते तथा भूगोल वासिभिः । ११ ।
पृथ्वी से उनकी गति उसी क्रम से अधिक धीमी दिखती है। (समान गति
होने पर भी दूरी के कारण कम दिखती है)।
चन्द्रस्यत्वर्क वद् भ्रान्ति भूमे र्निकट वर्तिनः
योजनात्म गतिर्न्यूना महति लिप्तिकात्मका । १२ ।
रवि की भांति चन्द्र की पृथ्वी की अत्यन्त निकट से परिक्रमा कर रहा है
अतः चन्द्रमा की योजनात्मक गति सबसे कम होते हुए भी उसकी कलनात्मक
गति अधिक होती है।
भूगोल पेक्षया भानोज्ञ शुक्रौ निकटौ यतः
तस्माङ्क्रान्तवद् दृश्यौ चक्रार्धेऽपि सहामुना । १३ ।
बुध और शुक्र पृथ्वी अपेक्षा रवि के निकटवर्ती हैं। अतः बारह राशि के
बाद जिसप्रकार रवि के साथ होते हैं, उसी प्रकार से ६ राशि दूर होने पर भी
साथ दिखते हैं।
४४ सिद्धान्त दर्पण
कुजेज्य शनयो यस्माद् दूरगा स्तद पेक्षयां
चक्रे स सूर्या दृश्यन्ते चक्रार्धे भिन्न दिश्यतः । १४ ।
रवि से पृथ्वी की तुलना में मंगल, वृहस्पति और शनि अधिक दूर होने के
कारण रवि से १२ राशि अन्तर पर रवि से मिले हुए दिखते हैं । तथा ६ राशि
अन्तर पर उल्टी दिशा में दिखते हैं ।
सूर्याद् भिन्न दिशोः स्थानं भूतारा ग्रहयोर्यदा
ऋज्वी गतिस्तदा तारा ग्रहस्य प्रेक्षते भुवि । १५ ।
रवि से एक दिशा में पृथ्वी और उसकी विपरीत दिशा में ताराग्रह (मंगल,
बुध, गुरु, शुक्र, शनि) कोई- हो तो उस ग्रह की सरल (मार्गी) गति दिखती है ।
यदै का दिगवस्थानं तयोर्भवति सूर्यतः ।
वक्रा गतिस्तदा तस्य मध्याशु गति भेदजा । १६ ।
यदि रवि से पृथ्वी और कोई तारा ग्रह एक ही दिशा में हो तो शीघ्र और
मध्यम गति के अन्तर के कारण उस ग्रह की उल्टी दिशा में गति (वक्रीगति)
दिखती है ।
मन्दापकर्षं हित्वा सदाकर्कात् समदूरगाः
यान्ति तारा ग्रहाः प्राचीं भचक्र मनुलक्षते । १७ ।
पांच तारा ग्रह हमेशा सूर्य से बराबर दूरी पर रह कर अपने मन्दोच्च और
शीघ्रोच्च रवि द्वारा आकर्षित हो उसकी पूर्व दिशा में परिक्रमा करते हैं । लेकिन
वे भचक्र में ही घूमते हुए देखे जाते हैं ।
भ चक्र मध्यगा भूमि भौमादिर्मध्यगा रविः ।
भार्क संगत सूत्रं तत् समंचक्रार्धचक्रयोः । १८ ।
पृथ्वी भचक्र (नक्षत्र गोल) के केन्द्र में तथा भौम आदि (पांच तारा ग्रहों)
केन्द्र में रवि है, अतः चक्र (१२ राशि ) और चक्रार्ध (६ राशि ) के बाद रवि
और नक्षत्र की गति का सूत्र (पृथ्वी से इनकी दिशा) अभिन्न हो जाती है ।
राशि त्रयान्ते भूसूत्र भार्कीगं चक्रितं यतः ।
तभेदः शीघ्रपरिधे रोजयुग्म पदान्तयोः । १९ ।
चक्र और चक्रार्ध से तीन राशि के बाद (ओज अर्थात् विषम पद में ) पृथ्वी
से नक्षत्र के विषम पदान्त का सूत्र और रवि से उसी पदान्त का सूत्र (रेखा) भिन्न
दिशा में होते हैं । अतः युग्म पदान्त और ओज की शीघ्र परिधि अलग होती है ।
क्ष्माक्रान्तर वियन्मानात् ख रसाग्नि (३६०) गुणाधिकः
भाना पन्थाहि दूरस्य स्तस्मिन्नर्क ,प्रथा हृते । २० ।
पृथ्वी और रवि के अन्तर योजन से पृथ्वी भकक्षा का अन्तर योजन ३६०
ग्रह स्फुटी करणम् ४५
गुणा होता है । भकक्षा में रवि कक्षा से भाग देने पर हार (३६०) होगा ।
फलं हरण मे तेन भगणांशा (३६०) विभाजिताः ।
लब्धोऽशः शीघ्रपरिधे योजयुग्मान्तरं गतः । २१ ।
इस हार में भगण अंश (३६०) से भाग देने पर जो १ अंश आता है वह विषम
(ओज) और युग्म पद का अन्तर है, यही शीघ्र की नीच और उच्च परिधिका अन्तर
होगा ।
कक्षा कथन कालेऽहं वक्ष्येपरिधि सम्भवम् ।
साक्षादनुभवादत्रा पेक्षा शास्त्रे निवर्तते । २२ ।
कक्षा के वर्णन में नीच और उच्च परिधि का अन्तर प्रत्यक्ष देखा जा सकता
है । अतः इस शास्त्र में अनुमान की आवश्यकता नहीं है ।
रव्यादेर्मन्द तुंगादा देवाये सन्ति दूरगाः ।
तद् वात रश्मि भिर्बद्धा ग्रहास्तै रूपकर्षिताः । २३ ।
रवि आदि ग्रह मन्दोच्च से दूर हों या निकट, वे अपने मन्दोच्च रूपी देवता
(अदृश्य विन्दु) द्वारा पवन रूपक रस्सी (अदृश्य या काल्पनिक दिशा) में आकर्षित
होते हैं . अतः (स्पष्ट) ग्रह हमेशा (मध्यम ग्रह से) उच्च की तरफ हटे रहते हैं ।
स्वादिसुखं तथा सन्नाः कृष्यन्ते बहुदूरगाः ।
स्वल्पत्वान् प्रवहः स्वांशैः पाशरूपैः प्रभञ्जनैः । २४ ।
अपने अपने उच्चो द्वारा आकर्षित ग्रह भी अपनी अल्प गति के अतिरिक्त प्रवह
पवन के पाशरूप आकर्षण में भी घूमते हैं . ( पूर्व में पश्चिम की तरफ । )
सूर्य सिद्धान्ते - स्वतुंगाभिमुखानेव प्रेरयत्य निशं दिवि
पूर्वापरापकृष्टास्ते गतिं यान्ति पृथग् विधाम् । २५ ।
अपने उच्च द्वारा दिन रात आकर्षित हो कभी पूर्व तथा कभी पश्चिम की तरफ
हटते हैं ।
ग्रहात् प्राग् भगणार्द्धस्थः प्राङ्मुखं कर्षति ग्रहम्
उच्च संज्ञोऽपरार्द्ध स्थ स्तद् वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् । २६ ।
.ग्रह से पूर्व वृत्तार्ध में उच्च रहने से उच्च ग्रह को पूर्व की तरफ आकर्षित
करता है । पश्चिम वृत्तार्द्ध में उच्च रहने से ग्रह पश्चिम की तरफ आंकर्षित होता
है । उच्च वृत्त की परिधि पर होने के कारण वह सभी बिन्दुओं से एक ही तरफ
है, लेकिन एक वृत्तार्द्ध में वह दिशा पूर्व और दूसरे वृत्तार्ध में पश्चिम कही जाती
है ।
स्वोच्चा पकृष्टा भगणैः प्राङ् मुखं यान्ति यद् ग्रहाः ।
तत्ते सुधन मित्युक्ति मृणं पश्चानु खेषुव । इति । २७ ।
अपने उच्च से आकृष्ट हो कर जब ग्रह सूर्य दिशा में जाते हैं । वह धन गति
४६ सिद्धान्त दर्पण
(योग) तथा पश्चिम दिशा की गति ऋणात्मक होती है । (सूर्य सिद्धान्त उद्धरण
समाप्त) ।
मन्दस्फुट महान् पाताश्चन्द्रादीन् याम्यसौम्ययोः
विक्षेपन्त्वेषु विक्षेपः स्वक्रान्त्यन्ता कलात्मकः । २८ ।
ग्रह कक्षा क्रान्ति वृत्त से कोण बनाती है, ग्रह बिम्ब से क्रान्ति वृत्त पर लम्ब
का मूल ही क्रान्ति पर ग्रह की स्पष्ट स्थिति है । लम्ब की दूरी को शर या विक्षेप
कहते हैं । ग्रह कक्षा और क्रान्ति वृत्त जिन दो विन्दुओँ पर मिलते हैं । (विक्षेप
शून्य होता है) उसे पात कहते हैं । ग्रह कथा का आधा भाग क्रान्तिवृत्त के उत्तर
और आधा दक्षिण होता है । अतः पात को उत्तर या दक्षिण विक्षेप का कारण
माना जाता है जो मन्दस्फुट ग्रह को उत्तर या दक्षिण की तरफ खींचता है । विक्षेप
को कला में नापा जाता है ।
सूर्यसिद्धान्ते-उत्तराभिमुखं पातो विक्षिपत्य परार्द्धगः ।
ग्रहं प्राग् भगणार्धस्थो याम्या यामपकर्षति । इति । २९ ।
ग्रह से पश्चिम (पीछे) १८० (अर्द्धवृत्त) में पात उत्तर की तरफ ग्रह को खींचता
है । तथा ग्रह के पूर्व (पहले) १८० कक्षा में पात दक्षिण दिशा में विक्षेप करता
है ।
पूर्वा पर गतः पातो बुध भार्गव शीघ्रयोः ।
पूर्ववद् विक्षिपत्येतौ न्यस्ते तच्छक्ति रुष्णगौ । ३० ।
बुध और शुक्र का भगण सूर्य भगण होता है । उनका शीघ्रोच्च ही बुध और
शुक्र हैं । अतः उनके पात शीघ्रोच्च से पूर्व १८० के अन्दर हों तो दक्षिण शर, नहीं
तो उत्तर शर होता है ।
स्वपात सम खेटस्य पात चक्रार्धगस्य च
विक्षेपो नौजपादान्ते परमोऽसौशराभिधः । ३१ ।
ग्रह और पात के बीच युग्म पादान्तर (एक साथ या १८०° अन्तर होने पर )
शर या विक्षेप नहीं होता है (ग्रह क्रान्ति वृत्त पर होता है), ओज (विषम पादान्तर
-९०° या २७०° अन्तर) रहने पर शर सर्वाधिक (परम) होता है ।
मध्येषु लिप्ता परमा विधोर्नव ख वह्नयः (३०९)
कुजस्य कुहरा (१११) ज्ञस्य कृतभूपा (१६४) बृहस्पते । ३२ ।
ग्रहों का मध्यम परमशर मान-चन्द्रमा ३०९ लिप्ता
मंगल १११ लिप्ता, बुध १६४ लिप्ता, (बृहस्पति का....)
गजाद्रये (७८)ऽथ शुक्रस्य वसुवेद निशाकराः (१४८)
शने र्गोमनव (१४९) स्तासां पश्चाद् वक्षे स्फुटीकृतिम् । ३३ ।
वृहस्पति का ७८ लिप्ता, शुक्र का १४८ लिप्ता, तथा शनि का १४९ लिप्ता
ग्रह स्फुटी करणम् ४७
है । स्फुट शर लाने का नियम कहा जाता है ।
भूलोक लोचन ग्राह्या भुक्तिः स्फुट गतिर्मता
सात्रिधा प्राग् गतिः पश्चाद् गतिः शून्येति भेदतः । ३४ ।
पृथ्वी की सतह से लोगों को ग्रह की जिस प्रकार गति दिखती है उसे स्फुट
गति कहते हैं । स्फुट गति तीन प्रकार की है आगे (प्राक् या मार्गी) गति, पीछे
(वक्री) गति तथा शून्य गति (गति का अभाव)
प्राग् गतिः पञ्चधा पश्चाद् गतिद्वैविध्यमागता
तृतीयैक विधेयत्वा भौमादि गतिरष्टधा । ३५ ।
आगे की गति पांच प्रकार की, पीछे की गति दो प्रकार की तथा शून्य गति
एक प्रकार की कुल आठ प्रकार की गति भौम आदि ग्रहों की होती है । (सूर्य
चन्द्र की वक्र गति नहीं होती)
सूर्य सिद्धान्ते-वक्रानुवक्रा विकला मन्दा मन्दतरा समा ।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा कथितेषा स्वनाम भिः । इति । ३६ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार इन आठ प्रकार की गतियों के नाम हैं- १. वक्र
२. अनुवक्र, ३. विकला, ४ मन्द, ५. मन्दतर, ६. सम, ७. शीघ्र, तथा ८. अतिशीघ्र ।
पश्चाद्रुति क्षीयमाणा वक्रेति गदिता बुधैः ।
वर्द्धमाना तु वक्रा सा तदन्ताद्येः क्रमेण या । ३७ ।
पीछे की गति समाप्त होते समय कम होने लगती है । उसे वक्र गति कहते
हैं । पीछे की गति आरम्भ होने पर बढ़ती है, उसे अनुवक्र गति कहते हैं ।
स्तम्भिता सैव विकला कला शून्यत्व हेतुतः
वक्रत्वाप्ति वियोगाभ्यां प्राक् पश्चादन्तवहं गतः । ३८ ।
वक्रगति आरम्भ होने से पहले तथा समाप्त होने पर ग्रह की गति शून्य होती
है, उसकी कोई कला नहीं होने के कारण विकला कहा जाता है ।
क्षीयमाणा वर्द्धमाना स्वल्पा मध्यगतेः क्रमात्
उक्ता मन्दतरा मन्दा मध्यतुल्याः गतिः समा । ३९ ।
. स्पष्ट गति मध्य गति से कम हो तथा घट रही हो तो उसे मन्दतर गति, बढ़
रही हो तो मन्द गति कहते हैं । स्पष्ट गति मध्यम गति के बराबर हो तो उसे सम
गति कहते हैं ।
मध्याधिका वर्द्धमाना क्षीयमाणा पुरो गतिः
भवेच्छिघ्रतरा शीघ्रा क्रमतश्चक्र सन्निधौ । ४० ।
स्पष्ट गति मध्यम गति से अधिक हो तथा बढ़ रही तो शीघ्र तर तथा घट
रही हो तो शीघ्र गति कहते हैं । ये गतियां सूर्य से १२ राशि दूर रहने पर होती
है ।
४८ सिद्धान्त दर्पण
रवीन्दोर्मन्दतुंगोत्था मन्दा मन्दतरा समा ।
शीघ्रा शीघ्रतरा भुक्तिः पूर्ववत् पञ्चधेतिसा । ४१ ।२०
रवि और चन्द्र की मन्दोच्च आकर्षण के कारण मन्द, मन्दतर, सम, शीघ्र और
शीघ्रतर ये पांच प्रकार की गतियां होती हैं, जिनका अर्थ पूर्ववत् है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तत्तद्गति वशान्नित्यं यथा दृक् तुल्यतां ग्रहाः
प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटी करण मादरात् । इति । ४२ ।
(सूर्य सिद्धान्त से) इन गतियों के कारण मध्यम ग्रह किस प्रकार देखे हुए
स्थान पर पहुंचते हैं (दृक् तुल्यता) उसे गणित द्वारा स्फुट ग्रह करने की विधि
आदर सहित बताता हूँ ।
आचार्यत्वं यया याति जगति ज्ञतया जनः
सतां हितायतां वच्मिज्या धनुष्कर्म पद्धतिम् । ४३ ।
अब मै ज्या और चाप गणना की विधि कहता हूँ जो कई विद्याओं में उपयोगी
है और जिसे जान कर लोग आचार्य पदवी प्राप्त करते हैं ।
ओत प्रोतै र्यथा वस्त्रं तन्तुभिः सन्ततं तथा
गोलः क्रमोत् क्रम ज्याभिः सन्दृब्धोऽयं समन्ततः । ४४ ।
वस्त्र जिस प्रकार धागे से ओतप्रोत से कर जड़ित होता है। उसी प्रकार गोल
भी क्रम ज्या से उसी प्रकार जड़ित होता है (किन्ही दो बिन्दुओं के बीच क्रमज्या
हो सकती है । इनकी अगणित संख्या है ।)
ज्यार्द्धाग्रे खेचरा मध्य सूत्रात् तिर्यक् स्थितायतः ।
ज्याद्धैः सकल कर्मेषां ज्यार्द्ध ज्येत्यत्र समन्ततः । ४५ ।
कक्षा में मध्य सूत्र (त्रिज्या ०° को) से ग्रह की तिर्यक स्थिति (कोण पर) की
ज्या निकालने के लिए मध्य सूत्र से ग्रह का और विपरीत दिशा का उतना ही
चाप की ज्या बनाते हैं । ग्रह ज्यार्द्ध के ऊपर होता है । ज्यार्द्ध से ही गणना (सहज
में) होती है । अतः उसी को ज्या भी कहते हैं ।
भचक्रे चक्र वालार्द्ध द्वय चापनिभं यतः ।
तद् व्यास रेखा मध्यस्था जीवारूपा तदुच्यते । ४६ ।
भचक्र रूपी वृत्त के दोनों आधे भाग चाप (धनु) की भाँति दीखते हैं । चक्र
को दो भाग में बांटने वाली केन्द्र से जाती हुयी रेखा को व्यास कहते हैं ।
त्र्यस्त्रयो गृहा ग्राह्या भुजकोटि तयायतः ।
तदो व्यास दलं त्रिज्या परमावृत्त मध्यतः । ४७ ।
तीन राशि (९०°) की ज्या और कोटिज्या का परममान होता है । तीन राशि
की ज्या व्यासार्द्ध के समान और केन्द्र से होकर जाती है । तब उसका सबसे
बड़ा मान होता है । कोटि का शून्य मान होता है (केन्द्र से ज्या की दूरी) ।
परिधेः षण्णवत्यंशः समोयस्मा न्नत स्ततः ।
राशि लिप्ता (१८००) ष्टमो भागः (२२५) प्रथमो ज्यार्धं उच्यते । ४८ ।
परिधि का १/९६ भाग सरल रेखा के समान होता है । अतः वह अपने ज्या
के बराबर (प्रायः) होगा । इसका कारण राशि लिप्ता (१८००) का १/८ भाग (जो
परिधि का १/९६ है ) २२५ प्रथम ज्यार्द्ध (या ज्या) के बराबर होता है ।
आद्य खण्डान्तरञ्चैतद् भक्तो ज्या पिण्ड आदिमः
लब्धोनमाद्यं द्वैतीय खण्डान्तर मिदं भवेत् । ४९ ।
पहली ज्या ही प्रथम खण्डान्तर है (०° की ज्या -० है) । द्वितीय खण्डान्तर
(पहली ज्या को दूसरी से घटाने पर फल) निकालने के लिए प्रथम खण्ड की
ज्या को उसी ज्या (पिण्ड) से भाग देकर लब्धि को ज्या पिण्ड से घटाते हैं ।
(२२५-२२५/२२५ ) यह फल (२२४) खण्डान्तर हुआ ।
तद्युक्तं प्रथमज्यार्धं द्वितीय ज्यार्द्ध मुच्यते ।
पुनराद्येन तद् भक्तं शेषः स्वाद्धीधिको यदि । ५० ।
द्वितीय खण्डान्तर को प्रथम ज्या में जोड़ने से द्वितीय ज्या (४४९) आता
है । पुनः इसको प्रथम खण्डान्तर से भाग देते हैं, शेष यदि अपने आधे से अधिक
(२२५/२ से अधिक) आता है ।
तल्लोपादेक युग् लब्धं कार्य मधौन एवलुक ।
द्वितीय खण्ड विवरं तल्लब्धोन तृतीयकम् । ५१ ।
तो शेष लोप कर देते हैं । (लब्धि में कुछ अन्तर नहीं ) इस लब्धि को द्वितीय
खण्डान्तर से घटाने पर तृतीय खण्डान्तर आता है ।
तद् युग द्वितीय जीवाद्धं तृतीय ज्यार्द्ध पिण्डकः
आद्यैनैवं क्रमात् पिण्डान् भक्ता लब्धोनिते युतैः । ५२ ।
तृतीय खण्डान्तर को द्वितीय जीवाद्धं में जोड़ने से तृतीय ज्यार्द्ध का पिण्ड
आता है । इस प्रकार क्रम से ज्या पिण्डों को प्रथम पिण्ड से भाग देकर खण्डान्त-
से घटाने पर अगला खण्डान्तर आता है, जिसे पिछले पिण्ड में जोड़कर अगल
पिण्ड आता है ।
चतुर्विंशति खण्डे स्युः क्रमज्या पिण्ड लिप्तिका
किन्तु ज्यापिण्डतः षष्ठात् सप्तमाद् द्वादशा दपि । ५३ ।
इस प्रकार क्रमानुसार १ से २४ ज्यापिण्ड (लिप्ताओं में) बनेगे किंतु ज्यापिण्ड
निकालते समय ६,७,१२....
एक विंशात् पञ्चद शाद् विंशात्सप्तदशा तथा
हार शेषांक लुक प्रोक्ता नारदीय स्वयम्भुवा । ५४ ।
५० सिद्धान्त दर्पण
१५,१७,२०,२१ वीं ज्या पिण्ड के समय हार शेषाकं लुम हो जायेगा (लब्धि
में शेष आधा से अधिक होने पर एक नहीं जोड़ेगे) क्योंकि ब्रह्मा ने नारद से ऐसा
कहा था ।
सूर्य सिद्धान्तेतत्त्वाश्विनो (२२५) ऽङ्क
काब्धिकृता (४४९) रूप भूमिघरर्तवः (६७१)
खाण्ड्काष्टौ (८९०) पञ्चशून्येषां (११०५)
बाणरुपगुणेन्दवः (१३१५) । ५५ ।
(सूर्य सिद्धान्त से उद्धृत क्रम से १,२ री आदि ज्याओं के मान)- पहली
ज्या-२२५ लिप्ता, २री ४४९, ३ री-६७१, ४ थी-८९० पांचवी-११०५, छठी (१३१५)
शून्यलोचन पञ्चे का (१५२०) छिद्ररूप मुनीन्दवः (१७१९)
वियञ्चन्द्रातिधृतयो (१९१०) गुणरन्ध्राम्बरराश्विनः (२०९३) । ५६ ।
७ वीं ज्या (१५२०) ८ वीं ज्या (१७१९), ९ वीं ज्या (१९१०) तथा १० वीं
ज्या (२०९३) ।
मुनिषड् यम ने त्राणि (२२६७) चन्द्राग्निकृत दस्रकाः (२४३१ )
पञ्चाष्ट विषयाक्षोणि (२५८५) कुञ्जराश्विनगश्विनः (२७२८) । ५७ ।
११ वां ज्या (२२६७) १२ वीं ज्या (२४३१) १३, वीं ज्या (२५८५ )तथा १४
वीं ज्या (२७२८) ।
चन्द्रपञ्चाष्टकयमा (२८५९) वस्वद्र्यंक यमास्तथा (२९७८)
कृताष्ट शून्य ज्वलना (३०८४) नगाद्रि शशि वह्वयः (३१७७) । ५८ ।
१५ वीं ज्या (२८५९), १६ वीं ज्या (२९७८) १७ वीं ज्या (३०८४) १८ वीं
ज्या (३१७७)
षट्पञ्चलोचन गुणा (३२५६) श्चन्द्रेनेत्राग्नि वह्वयः (३३२१)
यमाद्रिवह्निज्वलना (३३७२) रन्ध्रशून्यार्णवाग्नय (३४०९) । ५९ ।
१९ वीं ज्या (३२५६), २० वीं ज्या (३३२१) वीं ज्या (३३७२) त्था २२ वीं
ज्या (३४०९)
रूपाग्नि सागर गुणा (३४३१) वस्वग्निकृत वह्वयः (३४३८)
उत्क्रमज्या अथोच्यन्ते त्रयोविंशादि खण्डजाः । ६० ।
२३ वीं ज्या (३४३१) तथा २४ वीं ज्या (३४३८) लिप्ता होती हैं । अंब २३
खण्डों की उत्क्रम ज्या कही जाती है ।
प्रोज्योत् क्रमेण व्यासाद्धा देक द्वित्रादि खण्डजा
जायन्ते चापशिञ्जिन्यो रन्तः शरवदूर्द्धतः । ६१ ।
प्रथम, द्वितीय, तृतीय आँदि ज्या को व्यासार्द्ध से घटाने पर २३ वीं आदि
उत्क्रम ज्या होगी । दूसरी ज्या घटाने से २२ वीं आदि ।
ग्रह स्फुटी करणम् ५१
मुनयो (७) रन्ध्रयमला (२९) रसतर्का (६६) मुनीश्वराः (११७)
द्वयष्टैका (१८२) रूपषड्दस्राः (२६१) सागरार्थ हुताशना, (३५४) । ६२ ।
प्रथम खण्ड की उत्क्रम ज्या (७) लिप्ता, द्वितीय का (२९) तृतीय का (६६)
चतुर्थ का (११७), ५ वें का (१८२), ६ठे का (२६१) तथा ७ वें का (३५४) ।
खर्तु वेदा (४६०) नवाद्रयर्था (५७९)
दिङ्नागा (७१०) स्त्र्यर्थकुञ्जरा (८२३)
नगाम्बर वियच्चन्द्रा (१००७)
रूपभूधर शंकराः (११७१) । ६३ ।
८ वां (४६०), ९ वां ५७९), १० वाँ (७१०, ११ वां (८५३) १२ वां (१००७)
तथा १२ वां (११७१)
शरार्णव हुताशैका (१३४५) भुजंगाक्षि शरेन्दवः (१५२८)
नवरूप मही श्वैका (१७१९) गजैकाङ्कनिशाकराः (१९१८) । ६४ ।
१३ वां (१३४५), १४ वां (१५२८), १५ वां (१७१९) तथा १६ वां ( १९१८) ।
गुणाश्विरूप नेत्राणि (२१२३) पावकाग्नि गुणाश्विनः (२३३३)
वस्वर्णवार्थयमला (२५४८) स्तरुद्रगर्तु नगाश्विनः (२७६७) । ६५ ।
१७ वां (२१२३) १८ वां (२३३३),१९ वां (२५४८), २० वां (२७६७)
नवाष्ट नवने त्राणि (२९८९) पावकैक यमाग्नयः( ३२१३) ।
अष्टाग्नि सागर गुणा (३४३८) उत्क्रम ज्यार्ध पिण्ड काः । ६६ ।
२१ वां (२९८९) २२ वां (३२१३) तथा २३ वीं उत्क्रम ज्यार्ध के पिण्ड २१
वां (२९८९) (३२१३) तथा २३ वीं उत्क्रमज्यार्द्ध के पिण्ड (३४३८) हैं ।
ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चा तथा शीघ्राद विशोध्यते ।
शेषं केन्द्रं पदं तस्मा दभुजज्या कोटिरेव च । ६७ ।
मन्दोच्च से मध्य ग्रह की राशि घटाने पर मन्द केन्द्र और शीघ्रोच्च से मध्यग्रह
घटाने पर शीघ्र केन्द्र आता है । इनकी भुजज्या और कोटिज्या निकाली जाती
है ।
गता भुजस्य विषमे गम्यात् कोटि पदे भवेत् ।
युग्मेतु गम्याद् बाहुज्या कोटिज्यातु गता भवेत् । इति । ६८ ।
विषमं ऋद में गत चाप की भुजज्या तथा भोग्य चाप से कोटिज्या होती है ।
(युग्म पद में उसका उल्टा अर्थात् भोग्य (गम्य) चाप से भुजज्या तथा गत चाप
से कोटिज्या होती है । (सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण समाप्त ) ।
तस्माद्राशि त्रयदंका भाद्यं बाहुर्यथास्थितम्
त्रिभोर्ध्वं शोधितं षड् भ्यः षड्ध्वर्षड्भिरुत्झितम् । ६९ ।
, and between 'गम्यन्तरा' and 'भ्यस्तः'?
Yes: "गत गम्यन्तरा भ्यस्तः".
"शेषस्त त्वाशिवभि (२२५) र्हतः । ७१ ।" - yes, space between 'शेषस्त' and 'त्वाशिवभि'.
Line 16:
Let's look at line 16 again:
"जिस चाप (कोण) की ज्या निकालती है । हो उसे (२२५) से भाग देकर"
Wait, look at "निकालती है । हो उसे":
Wait, is that "निकालनी"?
Look at the letter again:
Could it be "निकालनी"?
In Devanagari, 'त' has a leftward loop/bend that goes down without closing.
'न' has a closed loop on the left.
Look at 'नी' in 'ज्यानी' (line 25), 'उदवाप्त' (line 24), 'केन्द्र' (line 3).
Here, the letter in line 16 has a leftward curve that goes straight down to the baseline. That is definitely 'त'!
Wait, what about the next word?
ह with ै = है.
Then a purna virama: ।
Then ह with ो = हो.
Then उसे.
Wait, why does it say "निकालती है । हो उसे"?
Could it be: "जिस चाप (कोण) की ज्या निकलती है
ग्रह स्फुटी करणम् ५३
शेष x २२५
──────────────────────────────────────────────────────── x २२५ = इष्ट
अगले खण्ड ज्या का पिण्ड-गत पिण्ड + गत ज्या खण्ड)
चाप
त्रिज्या वर्गाद् (११८४१४४) भुजज्या वर्ग प्रोज्झ्यवशेषतः
पदं कोटि ज्यका कोटे रवे दोर्ज्या पि साध्यताम् । ७५ ।
त्रिज्यावर्ग से भुजज्यावर्ग घटाकर शेष का मूल भुजचाप की कोटिज्या होती
है । इसी प्रकार कोटिज्या से ज्या निकालते हैं । (रवि और चन्द्र के लिये)
(कोटिज्या² + ज्या² = त्रिज्या² )
कुज्ञ शनिमन्दानां प्राक् पश्चात् चलने क्षणात् ।
ज्ञ शीघ्रस्यापि कृतोऽन्यः परोक्षाख्यः सुरोमया । ७६ ।
मंगल, बुध और शनि का मन्दोच्च और बुध शीघ्रोच्च आगे और पीछे दोनो
दिशाओं में गति पर्यवेक्षण से जानकर मैं परोक्ष नामक एक अन्य देवता की कल्पना
करता हूँ जो इन सबको प्रभावित करता है ।
सषड्भः सूर्यमध्यः स्याद् भूमिपुत्र परोक्षकः
ज्ञ परोक्षोः मृदोः शीघ्रः शीघ्रस्यापि मृदूच्चकः । ७७ ।
मध्यम सूर्य से ६ राशि (१८००) अन्तर पर मंगल का परोक्ष तथा बुध मन्दोच्च
का परोक्ष बुध का शीघ्रोच्च है तथा बुधशीघ्रोच्च का परोक्ष बुध का मन्दोच्च है ।
धृत्यं (१८) शोनः शनिर्मध्यः स्वमन्दस्य परोक्षकः ।
मन्दोच्चादि वदेतेऽपि न दृश्याः कालमूर्तयः । ७८ ।
मध्यम शनि से १८° कम दूरी पर शनि के मन्दोच्च का परोक्ष रहता है । परोक्ष
भी मन्दोच्च की तरह अदृश्य काल मूर्ति है ।
एवमन्ये सूक्ष्मरूपाः सन्त्य संख्या नभश्चराः
तथैवो पग्रहाः सन्ति ग्रहवेष्टन कारिणः । ७९।
इसी प्रकार असंख्य सूक्ष्म रूपी ग्रह आकाश में है, ग्रहों के चारों ओर उपग्रह
भी वृत्ता कार में घूमते हैं ।
ते सूक्ष्म यन्त्रलक्षत्वात् पूर्व गत्याग्रहाइति ।
उन्निता अपि धात्राद्यै रनुक्तत्वादि होज्झिताः । ८० ।
इन (सूक्ष्मों ग्रहों, उपग्रहों) की गति सूक्ष्म यन्त्रों से ही देखी जा सकती है ।
ये भी पश्चिम से पूर्व की तरफ चलते हैं इनका वर्णन ब्रह्म सिद्धान्त सूर्य सिद्धान्त
आदि में नहीं रहने के कारण मैं इनका परिचय नहीं दे रहा हूँ ।
ज्ञशीघ्रा धृति (१८) भागेन मध्यार्कः स्वमृदूच्चकौ
प्रोज्झ्य शेषात् केन्द्र दोर्ज्या हत्वा खाष्टर्तुभि (६८०) र्विंदः । ८१ ।
बुध के शीघ्रोच्च तथा मन्दोच्च एवं शनि के मन्दोच्च से उनके परोक्ष का राशि
५४ सिद्धान्त दर्पण
घटायें । शेष की ज्या निकाल कर (६८०) से गुणा कर
शनेस्त्रिशत्या (३००) थ भजेत् त्रिज्यया (३४३८) जतुलादिगे ।
तत्केन्द्रे फललिप्तादि स्वमृणं मन्दतुं गयोः । ८२ ।
गुणनफल में (बुध और शनि के लिए) ३०० से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से
भाग दें । लिप्तादि फल को केन्द्र मेषादि (६ राशि) में होने से उसे मन्दोच्च में
जोड़े तथा तुलादि में होने से घटायें ।
ज्ञ शीघ्रे तत्फलं वामं कुर्यात्ते स्युस्त्रयः स्फुटाः ।
भौमस्य प्रथमे शीघ्र केन्द्रे नक्रादि षट्क गे । ८३ ।
इसका उल्टा संस्कार (मेषादि राशियों के लिए घटाने तथा तुलादि राशियों
के लिए जोड़ने) बुध के शीघ्रोच्च के लिए किया जाता है, इस प्रकार तीन मानों
(बुध के मन्द और शीघ्र उच्च तथा शनिका मन्दोच्च) का स्फुट मान आता है ।
(मंगल मन्दोच्च का स्फुट निकालने के लिए) मंगल का शीघ्र केन्द्र मकर
आदि ६ राशि में रहने से
नैतत्कर्मार्थ ककर्यादौ तत्रस्यादब्दजं मृदुम् ।
तत्परोच्चाद् विशोध्यान्ते तद्भवर्ज्या खशराब्धिभिः (४५०) । ८४ ।
स्फुट संस्कार की आवश्यकता नहीं है । शीघ्र केन्द्र कर्क आदि ६ राशियों
में रहने पर मन्दोच्च संस्कार इस प्रकार होगा । गत वर्ष जनित मंगल मन्दोच्च को
परोच्च से घटाकर केन्द्र (पर) निकालें । पर केन्द्र की ज्या निकालकर उसे ४५०
से....
हन्यात् त्रिज्याप्त मस्यादि केन्द्र कोटि-कला हतम्
त्रिमलिप्ता (५,४००) प्तमेतेन संस्कृतं स्यान्मृदुः स्फुटः । ८५ ।
.... गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग दें । फल को प्रथम शीघ्र केन्द्र की
कोटि ज्या की कला से गुणा कर ५४०० (तीन राशि की कला) से भाग दें । फल
से पहले की तरह केन्द्र के अनुसार प्रथम ६ में कर्क, सिंह कन्या जिसमें संस्कार
होता है जोड़ते हैं तथा तुला, वृश्चिक, धनु के लिए घटाते हैं । मन्दोच्च में संस्कार
होगा ।
तत्कोटि फल मारस्य प्राग्वद्राक् कोटि संस्कृतम् ।
मध्यार्क गत्या गुणिताम् शनैः कोटिफलं ततः । ८६ ।
मन्दोच्च की दैनिक गति मंगल के परोच्च के उसका मन्दोच्च घटाकर (परकेन्द्र)
परोच्च की केन्द्र कोटिज्या को ४५० से गुना कर त्रिज्या (३४३८) से भाग दें । यह
मंगल का कोटिफल होगा । परकेन्द्र ०° से १८०° होने पर उसे शीघ्र कोटिज्या में
जोड़े, १८०° से ३६०° होने पर घटाये । फल को दैनिक मध्यम गति से गुणा कर
त्रिज्या (३४३८) से भाग देने से लब्धि मंगल मन्दोच्च की परोच्च के कारण दैनिक
गति होगी ।
ग्रह स्फुटी करणम् ५५
स्व मध्य गत्याथ विदः शीघ्र गत्या तदाहतम् ।
त्रिज्याप्तानि कलालब्धास्तन्मन्दानां सुभुक्तयः । । ८७ ।
इसी प्रकार शनि का परोञ्च और मन्दोच्च का अन्तर निकाल उसकी कोटिज्या
को ३०० से गुणा कर (३४३८) से भाग दे शनिका कोटिफल निकालें । इस
कोटिफल को शनि की दैनिक मध्यम गति से गुणाकर त्रिज्या ३४३८ से भाग देने
से परोञ्च संस्कृत शनि मन्दोच्च की दैनिक गति होगी ।
बुध के पर केन्द्र (शीघ्रोच्च के लिए -बुध का शीघ्रोच्च बुध ही है) कोटिज्या
को ६८० से गुणाकर ३४३८ भाग देने से बुध (शीघ्रोच्च) का कोटिफल होगा ।
उसे बुध शीघ्रोच्च की दैनिक मध्यम गति से गुणा कर त्रिज्या ३४३८ से भाग देने
से स्पष्ट बुध शीघ्रोच्च की दैनिक मध्यम गति होगी ।
नक्र कर्यादि उत्केन्द्र ऋज्व्यो वक्रा भवन्तिताः
वक्रर्जुज्ञोञ्च भुक्त्याष्य हीनातत् द्राग् गतिः स्फुटा । ८८ ।
संस्कृत मन्दोच्च की दैनिक गति परोञ्च केन्द्र की स्थिति पर निर्भर है । परोञ्च
केन्द्र प्रथम और चतुर्थ पाद में रहने से यह गति आगे की तरफ और द्वितीय और
तृतीय पाद में रहने से पीछे की तरफ होती है ।
बुध शीघ्रोच्च की दैनिक मध्यम गति में उसमन्दोच्च (संस्कृत) दैनिक गति को
पीछे की तरफ होने पर जोड़ते हैं । या आगे की तरफ होने पर घटाते हैं ।
मन्दोच्चा कर्षण फलं यस्य यस्य हि दृश्यते ।
परमं यत्तदभ्यस्ता श्वक्रलिप्ताः (२१,६००) समुद्धृताः । ८९ ।
जिस ग्रह का जितना परम मन्दोच्च का कर्षण फल है उसको वृत्त की कला
(२१,६००) से गुणा कर
त्रिज्या (३४३८) तत्फलं तत्तत् सममन्द परिधिर्भवेत् ।
क्वाप्यूनाधिकता यस्मात् फलस्य परिधिस्ततः । ९० ।
त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर ग्रह की मन्द परिधि आती है । परम मन्दफल
कम या अधिक होने से मन्द परिधि भी कम या अधिक होगी ।
युग्म पादान्त जाच्छिघ्र परिधेर्विषमान्तजः ।
न्यूनः शनि कुजे ज्याना मधिकः स्यात् सितज्ञयोः । ९१ ।
मंगल, वृहस्पति और शनि की शीघ्र परिधि द्वितीय और चतुर्थ पादान्त में
बढ़ जाती है और विषम पादान्त में कम होती है । बुध और शुक्र की शीघ्र परिधि
का अन्तर उल्टा होता है । विषम पादान्त में अधिक और युग्म में कम ।
' सूर्यसिद्धान्ते-रवि मन्द परिध्यंशा मनवः (१४) शीतगो रदाः । (३२)
युग्मान्ते विंषमान्तेतु नख (२०) लिप्तो नितास्तयोः । इति । ९२ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार -रवि की मन्द परिधि युग्म पादान्तर में १४ औ-
ओज (विषम) पदान्तर में (१३।४०) चन्द्र का उसी प्रकार युग्म पदान्तीय मन्द
५६ सिद्धान्त दर्पण
परिधि (३२) तथा ओज पदान्तीय मन्द परिधि (३१।४०) होगी (विषम पदान्तर में
२० लिप्ता कम होगी) ।
त्र्यंशोनेन्द्र (१३।४०) लवा भानोर्जिन (२४) लिप्तोनितारदाः (३२) । ३६ ।
चन्द्रस्य सार्द्ध देत्युक्ताः सत्सिद्धान्त शिरोमणौ । ९३ ।
भास्कराचार्य के सिद्धान्तशिरोमणि के अनुसार युग्म और ओज सभी पदान्त
में रवि और चन्द्र की मन्दपरिधि क्रमशः १३।४० तथा ३१।१६ होगी ।
मयातुभेन्दु युत्य र्क चन्द्रान्तर विवेकतः
कथ्यते दृक् समो मन्द परिधि रवि चन्द्रयोः । ९४ ।
मैंने नक्षत्रों से चन्द्रमा की युति तथा चन्द्रमा और सूर्य का राशि अन्तर देखकर
स्वयं सूर्य और चन्द्र की मन्दपरिधि का परिमाण निकाला है ।
मन्द केन्द्रो जपादान्ते भानोः षट् कलि कान्विताः ।
तदं शा भानव (१२।६) श्चन्द्र स्यार्द्धों ना दशनं (३१।३०) वहः । ९५ ।
मन्द केन्द्र ओज (विषम) पादान्त में रहने पर सूर्य की मन्द परिधि १२।६ कला
तथा चन्द्रमा की ३१।३० कला है ।
रवेश्चक्र स्वकेन्द्रस्य रवि ((१२) लिप्तोनिताः (११।४८) स्मृता
चक्रार्द्धे सिद्ध (२४) लिप्ताढ्यः (१२।३०) स्फुट तान्यत्र कथ्यते । ९६ ।
रवि का मन्द केन्द्र चतुर्थ पादान्त में रहने पर मन्दपरिधि (११।४८) तथा द्वितीय
पादान्त में (१२।३०) अन्य स्थान में रवि और चन्द्र की मन्द परिधि निकालने का
सूत्र कहा जा रहा है ।
रस शीघ्र केन्द्र कोटिज्या त्रिज्या (३४३८) प्ता कलिकाफलैः
क्रमान्मकर कर्यादौ ही नाढ्या धृति (१८) लिप्तिकाः । ९७ ।
अन्य स्थान में रवि की मन्द परिधि निकालने के लिये रवि मन्द केन्द्र की
कोटिज्या को ६ से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग दें । फल कला आदि में
होगा । मन्द केन्द्र प्रथम और चतुर्थ पाद में रहने पर इस कला फल को १८ से
घटायेंगे । मन्द केन्द्र द्वितीय और तृतीय पाद में रहने पर इस कलादि को १८ में
जोड़ेंगे ।
केन्द्र कोटिज्य याभ्यस्तास्त्रिज्या (३४३८) प्ता स्तत् फलैःपुनः ।
युतोनः कर्किनक्रादावोजान्त परिधिः (१२।६) स्फुटः । ९८ ।
दोनों प्रकार के फल को मन्दकेन्द्र कोटिज्या से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से
भाग दें । शेष फल कला को मन्द केन्द्र द्वितीय और चतुर्थ पादान्त में रहने पर
ओज मन्द परिधि (१२।६ ) से घटायें । वही उस स्थान की मन्द परिधि होगी ।
अन्य स्थानों के लिए जोड़ेंगे ।
ग्रह स्फुटी करणम् ५७
एवं सूक्ष्म विधौ कार्यः स्थूलेतु स्वांक (९) भाग युक् ।
प्राग्भिरिष्टे पर्व सन्धि मात्रदृक्साम्य लाभतः । ९९ ।
सूक्ष्मगणना के लिए इस प्रकार मन्द परिधि निकाली जाती है । स्थूल गणना
के लिए इतनी अधिक गणना नकर पूर्व नियम के अनुसार मन्द परिधि निकाल
कर उसमें उसका १/९ भाग जोड़ देते हैं । इसमें सिर्फ पर्व सन्धि (पूर्णिमा या
अमावस्या का ) दृक् समता होती है ।
विधोरुक्तः स (३१।३०) कोटिज्या गुणिते स्त्रिगुणे (३४३८) हृतेः
खगुणैः (३०) कर्कि नक्रादौ कलाभि र्युगवियुक् स्फुटः । १०० ।
चन्द्र मन्दोच्च की कोटिज्या को ३० से गुणा कर त्रिज्या ( ३४३८) से भाग
दें । कलादि फल को चन्द्रमन्द केन्द्र कर्क आदि ६ राशि में रहने पर विषम
पदान्तीयमन्द परिधि (३१।३०) में जोड़े चन्द्र मन्द केन्द्र मकर आदि ६ राशि में रहने
पर इस कलादि फल को उसी (३१।३०) से घटाये । इस प्रकार चन्द्रमा की मन्द
परिधि स्फुट होगी ।
कुजादङ्गांपक्षांशा गोऽङ्गानि (६९) गिरि वाहवः । (२७) .
सार्द्धा ब्धिरामा (३४।३०) स्तपना (१२) ऽ गोऽग्नयः
(३९) परिधेर्मृदो । १०१ ।
मंगल की मन्द परिधि अंशादि ६९
बुध ,, ,, २७
गुरु ,, ,, ३४।३०
शुक्र ,, ,, १२
शनि ,, ,, ३९
शैघ्रा परिधयो भौमाद् युग्मान्तेऽष्टाग्नि बाहवः (२३८) नव विश्वे
(१३९) ख गिरयो (७०) भूषट् पक्षा (२६१) नवाग्नय । १०२ ।
मंगल युग्मपदान्त की शीघ्र परिधि- २३८ अंश
बुध ,, ,, १३९ ,,
वृहस्पति ,, ,, ७० ,,
शुक्र ,, ,, २६१ ,,
शनि ,, ,, ३९ ,,
ओजान्तेऽद्व्यग्नि ने त्राणि (२३७) नभःशक्रा (१४०) नवर्तवः (६९)
द्व्यंग पक्षा (२६२) गजगुण (३८) स्तेषान्तु स्फुटतोच्यते । १०३ ।
ओज पदान्तो में शीघ्र परिधि
मंगल-२३७ अंश, बुध-१४० अंश, वृहस्पति, ६९ अंश शुक्र-२६२ अंश तथा
शनि ३८ अंश ।
? Or is it a digit?
Wait, what if the meter is NOT 8 syllables?
Could it be a different meter? No, 8 + 8 + 8 + 8 is Anushtubh.
Wait, can Anushtubh have 9 syllables? An irregular Anushtubh (hypermetric / bhūrīk) with 9 syllables happens in Puranas, but in astronomical texts like Siddhanta Darpana (by Chandrasekhara Singha Samanta), Chandrasekhara is a master poet (Mahamahopadhyaya)! He wrote the entire Siddhanta Darpana in classical Sanskrit meters (mostly Upajati, Vasantatilaka, Sardulavikridita, Malini, Anushtubh, etc.).
Wait! This book is SIDDHANTA DARPANA!
Yes! The header says "सिद्धान्त दर्पण"!
Author: Mahamahopadhyaya Chandrasekhara Singha Harichandana Mahapatra Samanta (Pathani Samanta)!
Let's find the exact verse in Siddhanta Darpana!
Chapter: Madhyamadhikara or Spashtadhikara!
Topic: Mercury's Mandaparidhi (बुधस्य मन्द परिधि)!
Look at the verse:
Verse 111:
"बुधस्य मन्द..."
Let's find verses 104-111 of this chapter in Siddhanta Darpana:
Chapter: Spashtadhikara (अध्याय ३ or similar, or म
ग्रह स्फुटी करणम् ५९
बुध का मन्द केन्द्र जिस पाद में हो उस पाद की गत और भोग्य कला में
जो कम हो उसकी ज्या को ९ से भाग कर लब्धि कला को मन्द परिधि (२७)
से घटाने पर बुध की स्फुट मन्द परिधि होगी ।
शुक्रस्य मन्द परिधिः केन्द्र दोर्ज्याक्षि (२) घाततः ।
त्रिज्या (३४३८) भक्तात् फलांशादि रहित, स्फुट उच्यते । ११२ ।
शुक्र की मन्द केन्द्र भुजज्या को २ से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने
पर प्राप्त अंश आदि को मन्द परिधि में ( १२ अंश) से घटाने पर शुक्र की स्फुट
मन्द परिधि होगी ।
सूर्य सिद्धान्ते-तद्गुणे भुज कोटिज्ये भगणांश (३६०) विभाजिते ।
तद् भुजज्याफल धनुर्मान्द्यं लिप्तादिकं फलम् । इति । ११३ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार संस्कृत मन्द परिधि को मन्द केन्द्र की भुजज्या से
और मन्द केन्द्र कोटिज्या से गुणा कर (३६०) से भाग देने पर क्रमशः मन्द भुजफल
और मन्द की कोटिफल होता है ।
तत्व नेत्रो (२२५) न लिप्तानां समभावात् धनुक्रिया ।
नेष्यते बहुतायातु ततस्तत्कर्म युज्यते । ११४ ।
२२५ कला (३° ४५') चाप में और ज्या में अन्तर नहीं होने से कारण द्वितीय
से छोटे चाप की ज्या या ज्या का चाप निकालने की आवश्यकता नहीं है ।
उससे अधिक होने पर ही ज्या और धनु निकालना, जाहिये ।
सूर्य सिद्धान्ते-शैघ्रं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम्
सशोध्यन्तु त्रि जीवा (३४३८) या कर्क्या दौ कोटिजं फलम् । इति । ११५ ।
श्लोक ११३ के अनुसार शीघ्र कोटिफल निकाल कर शीघ्र केन्द्र मकरादि ६
राशि में रहने पर उसको त्रिज्या (३४३८) में जोड़े अन्य राशियों में त्रिज्या से
घटायेंगे ।
सैवोक्ता संस्कृत त्रिज्या ज्यारूपं भुजकोटिजम्
फलमैत्रैव गृह्णेत धनर्ण कृत कर्मणि । ११६ ।
इस फल का नाम कोटिज भुजफल है और त्रिज्या में जोड़ने घटाने काम में
इन्हें ज्या रूप (चाप रूप नहीं) ही देखना चाहिये ।
सूर्य सिद्धान्ते-तद् बाहु फलवर्गे ज्यान्मूलं कर्णश्चलाधिपः
त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चल कर्ण विभाजितम् । ११७ ।
इन ज्या चाप भुज और कोटि के वर्ग को जोड़कर उसका वर्गमूल निकालने
से शीघ्र कर्ण आता है । भुजफल को त्रिज्या (३४३८) से गुणनकर शीघ्र कर्ण से
भाग देने पर
६० सिद्धान्त दर्पण
लब्धस्य चापं लिप्तादि फलं शैघ्र्य मिदं स्मृतम् ।
एतदादौ कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि । ११८ ।
लबिध लिप्तादि चाप को शीघ्रफल कहते हैं । मंगल आदि पांच ताराग्रहों
के प्रथम ओर चतुर्थ संस्कार के काम आता है ।
मान्दं कर्म कर्मैकेन्दौ भौमादीना मथोच्यते
शैघ्रं मान्दं पुनर्मान्दं शौघ्रं चत्वार्य नुक्रमात् । ११९ ।
सूर्य और चन्द्रमा मन्द फल के केवल एक संस्कार से स्पष्ट होते हैं । परन्तु
मंगल आदि पांच ताराग्रहों में शीघ्र फल का एक संस्कार करने पर मन्द फल के
दो संस्कार करने पड़ते हैं । जिसके पीछे चौथी बार फिर शीघ्र फल का संस्कार
करना होता है ।
अजादि केन्द्रे सर्वेषां मान्दे शैघ्रे च कर्मणि ।
धन ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृण मेव च । १२० । इति ।
जब शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र ६ राशि से कम होता है । तो शीघ्र फल या
मन्द फल धनात्मक होता है इसलिए सब कामों में जोड़ा जाता है । जब केन्द्र ६
राशि से अधिक होता है तब फल घटाया जाता है । (उद्धरण समाप्त)
मध्य शैघ्रं फलाद्धेन संस्कृतः प्रथमो ग्रहः
तदून्नित मृदुत्थेन फलाद्धेन स संस्कृतम् । १२१ ।
मध्य ग्रह में शीघ्र फल का आधा संस्कार करने से प्रथम ग्रह होता है ।
प्रथम ग्रह को मन्दोच्च से घटाने पर जो केन्द्र आदि होगा उसके मन्द फल का
आधा से प्रथम ग्रह का संस्कार करने पर-
द्वितीय स्तेन संशुद्धान्मान्दात् यत् सकलम् फलम् ।
तत्संकृतो मध्यखगो मन्द स्पष्ट स्तृतीयक । १२२ ।
द्वितीय ग्रह होता है । द्वितीय ग्रह को पुनः मन्दोच्च से घटाने पर जो मन्द
केन्द्र आता है उसके मन्दफल से द्वितीय ग्रहका संस्कार करने से तृतीय ग्रह आता
है ।
तदूनिताच्छीघ्रतुंगात् सकलेन फलेनसः ।
संस्कृतः स्फुरता मेति तूर्य सूर्यादिशासनात् । १२३ ।
तृतीय मन्द स्पष्ट ग्रह को शीघ्रोच्च से घटाने पर जो शीघ्र केन्द्र आता है ।
उसके शीघ्रफल से तृतीय ग्रह का संस्कार करने पर जो चतुर्थ ग्रह आता है
वही वास्तव में स्पष्ट ग्रह है ।
त्रिचतुः फलयोर्घातात् कुजस्यतु कलात्मनोः
दिग् (१०) घ्रान्त्य कर्ण विहतात् फललिप्ता युतोनितः । १२४ ।
उपर्युक्त नियम द्वारा मंगल का तृतीय और चतुर्थ फल की कलाओं का