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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 609 में से

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पृष्ठ 141

४४ सिद्धान्त दर्पण
कुजेज्य शनयो यस्माद् दूरगा स्तद पेक्षयां
चक्रे स सूर्या दृश्यन्ते चक्रार्धे भिन्न दिश्यतः । १४ ।
रवि से पृथ्वी की तुलना में मंगल, वृहस्पति और शनि अधिक दूर होने के
कारण रवि से १२ राशि अन्तर पर रवि से मिले हुए दिखते हैं । तथा ६ राशि
अन्तर पर उल्टी दिशा में दिखते हैं ।
सूर्याद् भिन्न दिशोः स्थानं भूतारा ग्रहयोर्यदा
ऋज्वी गतिस्तदा तारा ग्रहस्य प्रेक्षते भुवि । १५ ।
रवि से एक दिशा में पृथ्वी और उसकी विपरीत दिशा में ताराग्रह (मंगल,
बुध, गुरु, शुक्र, शनि) कोई- हो तो उस ग्रह की सरल (मार्गी) गति दिखती है ।
यदै का दिगवस्थानं तयोर्भवति सूर्यतः ।
वक्रा गतिस्तदा तस्य मध्याशु गति भेदजा । १६ ।
यदि रवि से पृथ्वी और कोई तारा ग्रह एक ही दिशा में हो तो शीघ्र और
मध्यम गति के अन्तर के कारण उस ग्रह की उल्टी दिशा में गति (वक्रीगति)
दिखती है ।
मन्दापकर्षं हित्वा सदाकर्कात् समदूरगाः
यान्ति तारा ग्रहाः प्राचीं भचक्र मनुलक्षते । १७ ।
पांच तारा ग्रह हमेशा सूर्य से बराबर दूरी पर रह कर अपने मन्दोच्च और
शीघ्रोच्च रवि द्वारा आकर्षित हो उसकी पूर्व दिशा में परिक्रमा करते हैं । लेकिन
वे भचक्र में ही घूमते हुए देखे जाते हैं ।
भ चक्र मध्यगा भूमि भौमादिर्मध्यगा रविः ।
भार्क संगत सूत्रं तत् समंचक्रार्धचक्रयोः । १८ ।
पृथ्वी भचक्र (नक्षत्र गोल) के केन्द्र में तथा भौम आदि (पांच तारा ग्रहों)
केन्द्र में रवि है, अतः चक्र (१२ राशि ) और चक्रार्ध (६ राशि ) के बाद रवि
और नक्षत्र की गति का सूत्र (पृथ्वी से इनकी दिशा) अभिन्न हो जाती है ।
राशि त्रयान्ते भूसूत्र भार्कीगं चक्रितं यतः ।
तभेदः शीघ्रपरिधे रोजयुग्म पदान्तयोः । १९ ।
चक्र और चक्रार्ध से तीन राशि के बाद (ओज अर्थात् विषम पद में ) पृथ्वी
से नक्षत्र के विषम पदान्त का सूत्र और रवि से उसी पदान्त का सूत्र (रेखा) भिन्न
दिशा में होते हैं । अतः युग्म पदान्त और ओज की शीघ्र परिधि अलग होती है ।
क्ष्माक्रान्तर वियन्मानात् ख रसाग्नि (३६०) गुणाधिकः
भाना पन्थाहि दूरस्य स्तस्मिन्नर्क ,प्रथा हृते । २० ।
पृथ्वी और रवि के अन्तर योजन से पृथ्वी भकक्षा का अन्तर योजन ३६०