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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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५६ सिद्धान्त दर्पण
परिधि (३२) तथा ओज पदान्तीय मन्द परिधि (३१।४०) होगी (विषम पदान्तर में
२० लिप्ता कम होगी) ।
त्र्यंशोनेन्द्र (१३।४०) लवा भानोर्जिन (२४) लिप्तोनितारदाः (३२) । ३६ ।
चन्द्रस्य सार्द्ध देत्युक्ताः सत्सिद्धान्त शिरोमणौ । ९३ ।
भास्कराचार्य के सिद्धान्तशिरोमणि के अनुसार युग्म और ओज सभी पदान्त
में रवि और चन्द्र की मन्दपरिधि क्रमशः १३।४० तथा ३१।१६ होगी ।
मयातुभेन्दु युत्य र्क चन्द्रान्तर विवेकतः
कथ्यते दृक् समो मन्द परिधि रवि चन्द्रयोः । ९४ ।
मैंने नक्षत्रों से चन्द्रमा की युति तथा चन्द्रमा और सूर्य का राशि अन्तर देखकर
स्वयं सूर्य और चन्द्र की मन्दपरिधि का परिमाण निकाला है ।
मन्द केन्द्रो जपादान्ते भानोः षट् कलि कान्विताः ।
तदं शा भानव (१२।६) श्चन्द्र स्यार्द्धों ना दशनं (३१।३०) वहः । ९५ ।
मन्द केन्द्र ओज (विषम) पादान्त में रहने पर सूर्य की मन्द परिधि १२।६ कला
तथा चन्द्रमा की ३१।३० कला है ।
रवेश्चक्र स्वकेन्द्रस्य रवि ((१२) लिप्तोनिताः (११।४८) स्मृता
चक्रार्द्धे सिद्ध (२४) लिप्ताढ्यः (१२।३०) स्फुट तान्यत्र कथ्यते । ९६ ।
रवि का मन्द केन्द्र चतुर्थ पादान्त में रहने पर मन्दपरिधि (११।४८) तथा द्वितीय
पादान्त में (१२।३०) अन्य स्थान में रवि और चन्द्र की मन्द परिधि निकालने का
सूत्र कहा जा रहा है ।
रस शीघ्र केन्द्र कोटिज्या त्रिज्या (३४३८) प्ता कलिकाफलैः
क्रमान्मकर कर्यादौ ही नाढ्या धृति (१८) लिप्तिकाः । ९७ ।
अन्य स्थान में रवि की मन्द परिधि निकालने के लिये रवि मन्द केन्द्र की
कोटिज्या को ६ से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग दें । फल कला आदि में
होगा । मन्द केन्द्र प्रथम और चतुर्थ पाद में रहने पर इस कला फल को १८ से
घटायेंगे । मन्द केन्द्र द्वितीय और तृतीय पाद में रहने पर इस कलादि को १८ में
जोड़ेंगे ।
केन्द्र कोटिज्य याभ्यस्तास्त्रिज्या (३४३८) प्ता स्तत् फलैःपुनः ।
युतोनः कर्किनक्रादावोजान्त परिधिः (१२।६) स्फुटः । ९८ ।
दोनों प्रकार के फल को मन्दकेन्द्र कोटिज्या से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से
भाग दें । शेष फल कला को मन्द केन्द्र द्वितीय और चतुर्थ पादान्त में रहने पर
ओज मन्द परिधि (१२।६ ) से घटायें । वही उस स्थान की मन्द परिधि होगी ।
अन्य स्थानों के लिए जोड़ेंगे ।