सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ४७
है । स्फुट शर लाने का नियम कहा जाता है ।
भूलोक लोचन ग्राह्या भुक्तिः स्फुट गतिर्मता
सात्रिधा प्राग् गतिः पश्चाद् गतिः शून्येति भेदतः । ३४ ।
पृथ्वी की सतह से लोगों को ग्रह की जिस प्रकार गति दिखती है उसे स्फुट
गति कहते हैं । स्फुट गति तीन प्रकार की है आगे (प्राक् या मार्गी) गति, पीछे
(वक्री) गति तथा शून्य गति (गति का अभाव)
प्राग् गतिः पञ्चधा पश्चाद् गतिद्वैविध्यमागता
तृतीयैक विधेयत्वा भौमादि गतिरष्टधा । ३५ ।
आगे की गति पांच प्रकार की, पीछे की गति दो प्रकार की तथा शून्य गति
एक प्रकार की कुल आठ प्रकार की गति भौम आदि ग्रहों की होती है । (सूर्य
चन्द्र की वक्र गति नहीं होती)
सूर्य सिद्धान्ते-वक्रानुवक्रा विकला मन्दा मन्दतरा समा ।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा कथितेषा स्वनाम भिः । इति । ३६ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार इन आठ प्रकार की गतियों के नाम हैं- १. वक्र
२. अनुवक्र, ३. विकला, ४ मन्द, ५. मन्दतर, ६. सम, ७. शीघ्र, तथा ८. अतिशीघ्र ।
पश्चाद्रुति क्षीयमाणा वक्रेति गदिता बुधैः ।
वर्द्धमाना तु वक्रा सा तदन्ताद्येः क्रमेण या । ३७ ।
पीछे की गति समाप्त होते समय कम होने लगती है । उसे वक्र गति कहते
हैं । पीछे की गति आरम्भ होने पर बढ़ती है, उसे अनुवक्र गति कहते हैं ।
स्तम्भिता सैव विकला कला शून्यत्व हेतुतः
वक्रत्वाप्ति वियोगाभ्यां प्राक् पश्चादन्तवहं गतः । ३८ ।
वक्रगति आरम्भ होने से पहले तथा समाप्त होने पर ग्रह की गति शून्य होती
है, उसकी कोई कला नहीं होने के कारण विकला कहा जाता है ।
क्षीयमाणा वर्द्धमाना स्वल्पा मध्यगतेः क्रमात्
उक्ता मन्दतरा मन्दा मध्यतुल्याः गतिः समा । ३९ ।
. स्पष्ट गति मध्य गति से कम हो तथा घट रही हो तो उसे मन्दतर गति, बढ़
रही हो तो मन्द गति कहते हैं । स्पष्ट गति मध्यम गति के बराबर हो तो उसे सम
गति कहते हैं ।
मध्याधिका वर्द्धमाना क्षीयमाणा पुरो गतिः
भवेच्छिघ्रतरा शीघ्रा क्रमतश्चक्र सन्निधौ । ४० ।
स्पष्ट गति मध्यम गति से अधिक हो तथा बढ़ रही तो शीघ्र तर तथा घट
रही हो तो शीघ्र गति कहते हैं । ये गतियां सूर्य से १२ राशि दूर रहने पर होती
है ।