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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

ग्रह स्फुटी करणम् ५१
मुनयो (७) रन्ध्रयमला (२९) रसतर्का (६६) मुनीश्वराः (११७)
द्वयष्टैका (१८२) रूपषड्दस्राः (२६१) सागरार्थ हुताशना, (३५४) । ६२ ।
प्रथम खण्ड की उत्क्रम ज्या (७) लिप्ता, द्वितीय का (२९) तृतीय का (६६)
चतुर्थ का (११७), ५ वें का (१८२), ६ठे का (२६१) तथा ७ वें का (३५४) ।
खर्तु वेदा (४६०) नवाद्रयर्था (५७९)
दिङ्नागा (७१०) स्त्र्यर्थकुञ्जरा (८२३)
नगाम्बर वियच्चन्द्रा (१००७)
रूपभूधर शंकराः (११७१) । ६३ ।
८ वां (४६०), ९ वां ५७९), १० वाँ (७१०, ११ वां (८५३) १२ वां (१००७)
तथा १२ वां (११७१)
शरार्णव हुताशैका (१३४५) भुजंगाक्षि शरेन्दवः (१५२८)
नवरूप मही श्वैका (१७१९) गजैकाङ्कनिशाकराः (१९१८) । ६४ ।
१३ वां (१३४५), १४ वां (१५२८), १५ वां (१७१९) तथा १६ वां ( १९१८) ।
गुणाश्विरूप नेत्राणि (२१२३) पावकाग्नि गुणाश्विनः (२३३३)
वस्वर्णवार्थयमला (२५४८) स्तरुद्रगर्तु नगाश्विनः (२७६७) । ६५ ।
१७ वां (२१२३) १८ वां (२३३३),१९ वां (२५४८), २० वां (२७६७)
नवाष्ट नवने त्राणि (२९८९) पावकैक यमाग्नयः( ३२१३) ।
अष्टाग्नि सागर गुणा (३४३८) उत्क्रम ज्यार्ध पिण्ड काः । ६६ ।
२१ वां (२९८९) २२ वां (३२१३) तथा २३ वीं उत्क्रम ज्यार्ध के पिण्ड २१
वां (२९८९) (३२१३) तथा २३ वीं उत्क्रमज्यार्द्ध के पिण्ड (३४३८) हैं ।
ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चा तथा शीघ्राद विशोध्यते ।
शेषं केन्द्रं पदं तस्मा दभुजज्या कोटिरेव च । ६७ ।
मन्दोच्च से मध्य ग्रह की राशि घटाने पर मन्द केन्द्र और शीघ्रोच्च से मध्यग्रह
घटाने पर शीघ्र केन्द्र आता है । इनकी भुजज्या और कोटिज्या निकाली जाती
है ।
गता भुजस्य विषमे गम्यात् कोटि पदे भवेत् ।
युग्मेतु गम्याद् बाहुज्या कोटिज्यातु गता भवेत् । इति । ६८ ।
विषमं ऋद में गत चाप की भुजज्या तथा भोग्य चाप से कोटिज्या होती है ।
(युग्म पद में उसका उल्टा अर्थात् भोग्य (गम्य) चाप से भुजज्या तथा गत चाप
से कोटिज्या होती है । (सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण समाप्त ) ।
तस्माद्राशि त्रयदंका भाद्यं बाहुर्यथास्थितम्
त्रिभोर्ध्वं शोधितं षड् भ्यः षड्‌ध्वर्षड्भिरुत्झितम् । ६९ ।