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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४८ सिद्धान्त दर्पण
रवीन्दोर्मन्दतुंगोत्था मन्दा मन्दतरा समा ।
शीघ्रा शीघ्रतरा भुक्तिः पूर्ववत् पञ्चधेतिसा । ४१ ।२०
रवि और चन्द्र की मन्दोच्च आकर्षण के कारण मन्द, मन्दतर, सम, शीघ्र और
शीघ्रतर ये पांच प्रकार की गतियां होती हैं, जिनका अर्थ पूर्ववत् है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तत्तद्गति वशान्नित्यं यथा दृक् तुल्यतां ग्रहाः
प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटी करण मादरात् । इति । ४२ ।
(सूर्य सिद्धान्त से) इन गतियों के कारण मध्यम ग्रह किस प्रकार देखे हुए
स्थान पर पहुंचते हैं (दृक् तुल्यता) उसे गणित द्वारा स्फुट ग्रह करने की विधि
आदर सहित बताता हूँ ।
आचार्यत्वं यया याति जगति ज्ञतया जनः
सतां हितायतां वच्मिज्या धनुष्कर्म पद्धतिम् । ४३ ।
अब मै ज्या और चाप गणना की विधि कहता हूँ जो कई विद्याओं में उपयोगी
है और जिसे जान कर लोग आचार्य पदवी प्राप्त करते हैं ।
ओत प्रोतै र्यथा वस्त्रं तन्तुभिः सन्ततं तथा
गोलः क्रमोत् क्रम ज्याभिः सन्दृब्धोऽयं समन्ततः । ४४ ।
वस्त्र जिस प्रकार धागे से ओतप्रोत से कर जड़ित होता है। उसी प्रकार गोल
भी क्रम ज्या से उसी प्रकार जड़ित होता है (किन्ही दो बिन्दुओं के बीच क्रमज्या
हो सकती है । इनकी अगणित संख्या है ।)
ज्यार्द्धाग्रे खेचरा मध्य सूत्रात् तिर्यक् स्थितायतः ।
ज्याद्धैः सकल कर्मेषां ज्यार्द्ध ज्येत्यत्र समन्ततः । ४५ ।
कक्षा में मध्य सूत्र (त्रिज्या ०° को) से ग्रह की तिर्यक स्थिति (कोण पर) की
ज्या निकालने के लिए मध्य सूत्र से ग्रह का और विपरीत दिशा का उतना ही
चाप की ज्या बनाते हैं । ग्रह ज्यार्द्ध के ऊपर होता है । ज्यार्द्ध से ही गणना (सहज
में) होती है । अतः उसी को ज्या भी कहते हैं ।
भचक्रे चक्र वालार्द्ध द्वय चापनिभं यतः ।
तद् व्यास रेखा मध्यस्था जीवारूपा तदुच्यते । ४६ ।
भचक्र रूपी वृत्त के दोनों आधे भाग चाप (धनु) की भाँति दीखते हैं । चक्र
को दो भाग में बांटने वाली केन्द्र से जाती हुयी रेखा को व्यास कहते हैं ।
त्र्यस्त्रयो गृहा ग्राह्या भुजकोटि तयायतः ।
तदो व्यास दलं त्रिज्या परमावृत्त मध्यतः । ४७ ।
तीन राशि (९०°) की ज्या और कोटिज्‍या का परममान होता है । तीन राशि
की ज्या व्यासार्द्ध के समान और केन्द्र से होकर जाती है । तब उसका सबसे