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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 609 में से

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पृष्ठ 157

६० सिद्धान्त दर्पण
लब्धस्य चापं लिप्तादि फलं शैघ्र्य मिदं स्मृतम् ।
एतदादौ कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि । ११८ ।
लबिध लिप्तादि चाप को शीघ्रफल कहते हैं । मंगल आदि पांच ताराग्रहों
के प्रथम ओर चतुर्थ संस्कार के काम आता है ।
मान्दं कर्म कर्मैकेन्दौ भौमादीना मथोच्यते
शैघ्रं मान्दं पुनर्मान्दं शौघ्रं चत्वार्य नुक्रमात् । ११९ ।
सूर्य और चन्द्रमा मन्द फल के केवल एक संस्कार से स्पष्ट होते हैं । परन्तु
मंगल आदि पांच ताराग्रहों में शीघ्र फल का एक संस्कार करने पर मन्द फल के
दो संस्कार करने पड़ते हैं । जिसके पीछे चौथी बार फिर शीघ्र फल का संस्कार
करना होता है ।
अजादि केन्द्रे सर्वेषां मान्दे शैघ्रे च कर्मणि ।
धन ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृण मेव च । १२० । इति ।
जब शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र ६ राशि से कम होता है । तो शीघ्र फल या
मन्द फल धनात्मक होता है इसलिए सब कामों में जोड़ा जाता है । जब केन्द्र ६
राशि से अधिक होता है तब फल घटाया जाता है । (उद्धरण समाप्त)
मध्य शैघ्रं फलाद्धेन संस्कृतः प्रथमो ग्रहः
तदून्नित मृदुत्थेन फलाद्धेन स संस्कृतम् । १२१ ।
मध्य ग्रह में शीघ्र फल का आधा संस्कार करने से प्रथम ग्रह होता है ।
प्रथम ग्रह को मन्दोच्च से घटाने पर जो केन्द्र आदि होगा उसके मन्द फल का
आधा से प्रथम ग्रह का संस्कार करने पर-
द्वितीय स्तेन संशुद्धान्मान्दात् यत् सकलम् फलम् ।
तत्संकृतो मध्यखगो मन्द स्पष्ट स्तृतीयक । १२२ ।
द्वितीय ग्रह होता है । द्वितीय ग्रह को पुनः मन्दोच्च से घटाने पर जो मन्द
केन्द्र आता है उसके मन्दफल से द्वितीय ग्रहका संस्कार करने से तृतीय ग्रह आता
है ।
तदूनिताच्छीघ्रतुंगात् सकलेन फलेनसः ।
संस्कृतः स्फुरता मेति तूर्य सूर्यादिशासनात् । १२३ ।
तृतीय मन्द स्पष्ट ग्रह को शीघ्रोच्च से घटाने पर जो शीघ्र केन्द्र आता है ।
उसके शीघ्रफल से तृतीय ग्रह का संस्कार करने पर जो चतुर्थ ग्रह आता है
वही वास्तव में स्पष्ट ग्रह है ।
त्रिचतुः फलयोर्घातात् कुजस्यतु कलात्मनोः
दिग् (१०) घ्रान्त्य कर्ण विहतात् फललिप्ता युतोनितः । १२४ ।
उपर्युक्त नियम द्वारा मंगल का तृतीय और चतुर्थ फल की कलाओं का