सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ५५
स्व मध्य गत्याथ विदः शीघ्र गत्या तदाहतम् ।
त्रिज्याप्तानि कलालब्धास्तन्मन्दानां सुभुक्तयः । । ८७ ।
इसी प्रकार शनि का परोञ्च और मन्दोच्च का अन्तर निकाल उसकी कोटिज्या
को ३०० से गुणा कर (३४३८) से भाग दे शनिका कोटिफल निकालें । इस
कोटिफल को शनि की दैनिक मध्यम गति से गुणाकर त्रिज्या ३४३८ से भाग देने
से परोञ्च संस्कृत शनि मन्दोच्च की दैनिक गति होगी ।
बुध के पर केन्द्र (शीघ्रोच्च के लिए -बुध का शीघ्रोच्च बुध ही है) कोटिज्या
को ६८० से गुणाकर ३४३८ भाग देने से बुध (शीघ्रोच्च) का कोटिफल होगा ।
उसे बुध शीघ्रोच्च की दैनिक मध्यम गति से गुणा कर त्रिज्या ३४३८ से भाग देने
से स्पष्ट बुध शीघ्रोच्च की दैनिक मध्यम गति होगी ।
नक्र कर्यादि उत्केन्द्र ऋज्व्यो वक्रा भवन्तिताः
वक्रर्जुज्ञोञ्च भुक्त्याष्य हीनातत् द्राग् गतिः स्फुटा । ८८ ।
संस्कृत मन्दोच्च की दैनिक गति परोञ्च केन्द्र की स्थिति पर निर्भर है । परोञ्च
केन्द्र प्रथम और चतुर्थ पाद में रहने से यह गति आगे की तरफ और द्वितीय और
तृतीय पाद में रहने से पीछे की तरफ होती है ।
बुध शीघ्रोच्च की दैनिक मध्यम गति में उसमन्दोच्च (संस्कृत) दैनिक गति को
पीछे की तरफ होने पर जोड़ते हैं । या आगे की तरफ होने पर घटाते हैं ।
मन्दोच्चा कर्षण फलं यस्य यस्य हि दृश्यते ।
परमं यत्तदभ्यस्ता श्वक्रलिप्ताः (२१,६००) समुद्धृताः । ८९ ।
जिस ग्रह का जितना परम मन्दोच्च का कर्षण फल है उसको वृत्त की कला
(२१,६००) से गुणा कर
त्रिज्या (३४३८) तत्फलं तत्तत् सममन्द परिधिर्भवेत् ।
क्वाप्यूनाधिकता यस्मात् फलस्य परिधिस्ततः । ९० ।
त्रिज्या (३४३८) से भाग देने पर ग्रह की मन्द परिधि आती है । परम मन्दफल
कम या अधिक होने से मन्द परिधि भी कम या अधिक होगी ।
युग्म पादान्त जाच्छिघ्र परिधेर्विषमान्तजः ।
न्यूनः शनि कुजे ज्याना मधिकः स्यात् सितज्ञयोः । ९१ ।
मंगल, वृहस्पति और शनि की शीघ्र परिधि द्वितीय और चतुर्थ पादान्त में
बढ़ जाती है और विषम पादान्त में कम होती है । बुध और शुक्र की शीघ्र परिधि
का अन्तर उल्टा होता है । विषम पादान्त में अधिक और युग्म में कम ।
' सूर्यसिद्धान्ते-रवि मन्द परिध्यंशा मनवः (१४) शीतगो रदाः । (३२)
युग्मान्ते विंषमान्तेतु नख (२०) लिप्तो नितास्तयोः । इति । ९२ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार -रवि की मन्द परिधि युग्म पादान्तर में १४ औ-
ओज (विषम) पदान्तर में (१३।४०) चन्द्र का उसी प्रकार युग्म पदान्तीय मन्द