सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 138, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंनानाविध संस्कार वर्णन ४१
सिद्धान्त क्रम संसिद्ध स्फुटीकरण लेखनात् ।
अनन्तरं फला न्येषां लेखिष्यन्ते यथाक्रमम् । ५५ ।
सिद्धान्त ग्रन्थ की परम्परा के अनुसार पहले पदक उसके बाद स्फुट ग्रह के
लिए खण्डफल लिखे गये हैं ।
इति खग भगणेभ्यः प्राक् फलैः संवद्धभ्यो
ध्रुवगति पद लेखा लेखि सौरूयार्थमेषा
खचर विषम भावे द्रक्षमाणेतु भुक्ति-
ध्रुव पदक कृति स्ताद् वक्ष माणोत्तरार्धे । ५६ ।
आसानी से ग्रह स्फुट करने के लिए फल ध्रुव गति आदि उनकी सारणी
सहित, १,२,३...दिन क्रम से लिखे गये हैं । पदकों के द्वारा ग्रह स्फुट करने पर
यदि उस स्थान में ग्रह प्रत्यक्ष नहीं हो तो ग्रन्थ के उत्तर भाग में दैनिक गति, ध्रुव
पदक कृति आदि देखकर उसे शुद्ध करें ।
यत्रोरान्ति चिरन्तनाः सभकलां वेदांगुला ।४।२७ मक्षभां
प्राग् देशान्तर साधितानि विपला न्यब्धि त्रिवेदद्विपान् (८४३४)
तां तान्यष्ट कलोनितां ।४।१९। फणिगुणक्ष्मांकां (९१३८) न्वास्ताद्गिरौ
राजन् राजतु राज राज सुहृदा गेयौ गिरीशः समे । ५७ ।
पूर्वाचार्यों के मत से अक्षपलभा ४।२७ और देशान्तर विलिप्ता ८४३४ तथा
आधुनिक मत से अक्ष पलभा ४।१९ और देशान्तर विलिप्ता ९१३८ पर स्थित
नीलाचल पर कुबेर मित्र शिव द्वारा पूजित श्री जगन्नाथ हमारे हृदय में विराजमान
हों ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
तुर्योययौ (४) सपद संस्कृतिमान प्रकाशः । ५८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के उज्ज्वल राजवंश में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणित
और प्रत्यक्ष में समानता तथा बाल बोध के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण का संस्कार
तथा पदक युक्त चतुर्थ प्रकाश समाप्त हुआ ।