सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० सिद्धान्त दर्पण
१५,१७,२०,२१ वीं ज्या पिण्ड के समय हार शेषाकं लुम हो जायेगा (लब्धि
में शेष आधा से अधिक होने पर एक नहीं जोड़ेगे) क्योंकि ब्रह्मा ने नारद से ऐसा
कहा था ।
सूर्य सिद्धान्तेतत्त्वाश्विनो (२२५) ऽङ्क
काब्धिकृता (४४९) रूप भूमिघरर्तवः (६७१)
खाण्ड्काष्टौ (८९०) पञ्चशून्येषां (११०५)
बाणरुपगुणेन्दवः (१३१५) । ५५ ।
(सूर्य सिद्धान्त से उद्धृत क्रम से १,२ री आदि ज्याओं के मान)- पहली
ज्या-२२५ लिप्ता, २री ४४९, ३ री-६७१, ४ थी-८९० पांचवी-११०५, छठी (१३१५)
शून्यलोचन पञ्चे का (१५२०) छिद्ररूप मुनीन्दवः (१७१९)
वियञ्चन्द्रातिधृतयो (१९१०) गुणरन्ध्राम्बरराश्विनः (२०९३) । ५६ ।
७ वीं ज्या (१५२०) ८ वीं ज्या (१७१९), ९ वीं ज्या (१९१०) तथा १० वीं
ज्या (२०९३) ।
मुनिषड् यम ने त्राणि (२२६७) चन्द्राग्निकृत दस्रकाः (२४३१ )
पञ्चाष्ट विषयाक्षोणि (२५८५) कुञ्जराश्विनगश्विनः (२७२८) । ५७ ।
११ वां ज्या (२२६७) १२ वीं ज्या (२४३१) १३, वीं ज्या (२५८५ )तथा १४
वीं ज्या (२७२८) ।
चन्द्रपञ्चाष्टकयमा (२८५९) वस्वद्र्यंक यमास्तथा (२९७८)
कृताष्ट शून्य ज्वलना (३०८४) नगाद्रि शशि वह्वयः (३१७७) । ५८ ।
१५ वीं ज्या (२८५९), १६ वीं ज्या (२९७८) १७ वीं ज्या (३०८४) १८ वीं
ज्या (३१७७)
षट्पञ्चलोचन गुणा (३२५६) श्चन्द्रेनेत्राग्नि वह्वयः (३३२१)
यमाद्रिवह्निज्वलना (३३७२) रन्ध्रशून्यार्णवाग्नय (३४०९) । ५९ ।
१९ वीं ज्या (३२५६), २० वीं ज्या (३३२१) वीं ज्या (३३७२) त्था २२ वीं
ज्या (३४०९)
रूपाग्नि सागर गुणा (३४३१) वस्वग्निकृत वह्वयः (३४३८)
उत्क्रमज्या अथोच्यन्ते त्रयोविंशादि खण्डजाः । ६० ।
२३ वीं ज्या (३४३१) तथा २४ वीं ज्या (३४३८) लिप्ता होती हैं । अंब २३
खण्डों की उत्क्रम ज्या कही जाती है ।
प्रोज्योत् क्रमेण व्यासाद्धा देक द्वित्रादि खण्डजा
जायन्ते चापशिञ्जिन्यो रन्तः शरवदूर्द्धतः । ६१ ।
प्रथम, द्वितीय, तृतीय आँदि ज्या को व्यासार्द्ध से घटाने पर २३ वीं आदि
उत्क्रम ज्या होगी । दूसरी ज्या घटाने से २२ वीं आदि ।