सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबड़ा मान होता है । कोटि का शून्य मान होता है (केन्द्र से ज्या की दूरी) ।
परिधेः षण्णवत्यंशः समोयस्मा न्नत स्ततः ।
राशि लिप्ता (१८००) ष्टमो भागः (२२५) प्रथमो ज्यार्धं उच्यते । ४८ ।
परिधि का १/९६ भाग सरल रेखा के समान होता है । अतः वह अपने ज्या
के बराबर (प्रायः) होगा । इसका कारण राशि लिप्ता (१८००) का १/८ भाग (जो
परिधि का १/९६ है ) २२५ प्रथम ज्यार्द्ध (या ज्या) के बराबर होता है ।
आद्य खण्डान्तरञ्चैतद् भक्तो ज्या पिण्ड आदिमः
लब्धोनमाद्यं द्वैतीय खण्डान्तर मिदं भवेत् । ४९ ।
पहली ज्या ही प्रथम खण्डान्तर है (०° की ज्या -० है) । द्वितीय खण्डान्तर
(पहली ज्या को दूसरी से घटाने पर फल) निकालने के लिए प्रथम खण्ड की
ज्या को उसी ज्या (पिण्ड) से भाग देकर लब्धि को ज्या पिण्ड से घटाते हैं ।
(२२५-२२५/२२५ ) यह फल (२२४) खण्डान्तर हुआ ।
तद्युक्तं प्रथमज्यार्धं द्वितीय ज्यार्द्ध मुच्यते ।
पुनराद्येन तद् भक्तं शेषः स्वाद्धीधिको यदि । ५० ।
द्वितीय खण्डान्तर को प्रथम ज्या में जोड़ने से द्वितीय ज्या (४४९) आता
है । पुनः इसको प्रथम खण्डान्तर से भाग देते हैं, शेष यदि अपने आधे से अधिक
(२२५/२ से अधिक) आता है ।
तल्लोपादेक युग् लब्धं कार्य मधौन एवलुक ।
द्वितीय खण्ड विवरं तल्लब्धोन तृतीयकम् । ५१ ।
तो शेष लोप कर देते हैं । (लब्धि में कुछ अन्तर नहीं ) इस लब्धि को द्वितीय
खण्डान्तर से घटाने पर तृतीय खण्डान्तर आता है ।
तद् युग द्वितीय जीवाद्धं तृतीय ज्यार्द्ध पिण्डकः
आद्यैनैवं क्रमात् पिण्डान् भक्ता लब्धोनिते युतैः । ५२ ।
तृतीय खण्डान्तर को द्वितीय जीवाद्धं में जोड़ने से तृतीय ज्यार्द्ध का पिण्ड
आता है । इस प्रकार क्रम से ज्या पिण्डों को प्रथम पिण्ड से भाग देकर खण्डान्त-
से घटाने पर अगला खण्डान्तर आता है, जिसे पिछले पिण्ड में जोड़कर अगल
पिण्ड आता है ।
चतुर्विंशति खण्डे स्युः क्रमज्या पिण्ड लिप्तिका
किन्तु ज्यापिण्डतः षष्ठात् सप्तमाद् द्वादशा दपि । ५३ ।
इस प्रकार क्रमानुसार १ से २४ ज्यापिण्ड (लिप्ताओं में) बनेगे किंतु ज्यापिण्ड
निकालते समय ६,७,१२....
एक विंशात् पञ्चद शाद् विंशात्सप्तदशा तथा
हार शेषांक लुक प्रोक्ता नारदीय स्वयम्भुवा । ५४ ।