सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ४५
गुणा होता है । भकक्षा में रवि कक्षा से भाग देने पर हार (३६०) होगा ।
फलं हरण मे तेन भगणांशा (३६०) विभाजिताः ।
लब्धोऽशः शीघ्रपरिधे योजयुग्मान्तरं गतः । २१ ।
इस हार में भगण अंश (३६०) से भाग देने पर जो १ अंश आता है वह विषम
(ओज) और युग्म पद का अन्तर है, यही शीघ्र की नीच और उच्च परिधिका अन्तर
होगा ।
कक्षा कथन कालेऽहं वक्ष्येपरिधि सम्भवम् ।
साक्षादनुभवादत्रा पेक्षा शास्त्रे निवर्तते । २२ ।
कक्षा के वर्णन में नीच और उच्च परिधि का अन्तर प्रत्यक्ष देखा जा सकता
है । अतः इस शास्त्र में अनुमान की आवश्यकता नहीं है ।
रव्यादेर्मन्द तुंगादा देवाये सन्ति दूरगाः ।
तद् वात रश्मि भिर्बद्धा ग्रहास्तै रूपकर्षिताः । २३ ।
रवि आदि ग्रह मन्दोच्च से दूर हों या निकट, वे अपने मन्दोच्च रूपी देवता
(अदृश्य विन्दु) द्वारा पवन रूपक रस्सी (अदृश्य या काल्पनिक दिशा) में आकर्षित
होते हैं . अतः (स्पष्ट) ग्रह हमेशा (मध्यम ग्रह से) उच्च की तरफ हटे रहते हैं ।
स्वादिसुखं तथा सन्नाः कृष्यन्ते बहुदूरगाः ।
स्वल्पत्वान् प्रवहः स्वांशैः पाशरूपैः प्रभञ्जनैः । २४ ।
अपने अपने उच्चो द्वारा आकर्षित ग्रह भी अपनी अल्प गति के अतिरिक्त प्रवह
पवन के पाशरूप आकर्षण में भी घूमते हैं . ( पूर्व में पश्चिम की तरफ । )
सूर्य सिद्धान्ते - स्वतुंगाभिमुखानेव प्रेरयत्य निशं दिवि
पूर्वापरापकृष्टास्ते गतिं यान्ति पृथग् विधाम् । २५ ।
अपने उच्च द्वारा दिन रात आकर्षित हो कभी पूर्व तथा कभी पश्चिम की तरफ
हटते हैं ।
ग्रहात् प्राग् भगणार्द्धस्थः प्राङ्मुखं कर्षति ग्रहम्
उच्च संज्ञोऽपरार्द्ध स्थ स्तद् वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् । २६ ।
.ग्रह से पूर्व वृत्तार्ध में उच्च रहने से उच्च ग्रह को पूर्व की तरफ आकर्षित
करता है । पश्चिम वृत्तार्द्ध में उच्च रहने से ग्रह पश्चिम की तरफ आंकर्षित होता
है । उच्च वृत्त की परिधि पर होने के कारण वह सभी बिन्दुओं से एक ही तरफ
है, लेकिन एक वृत्तार्द्ध में वह दिशा पूर्व और दूसरे वृत्तार्ध में पश्चिम कही जाती
है ।
स्वोच्चा पकृष्टा भगणैः प्राङ् मुखं यान्ति यद् ग्रहाः ।
तत्ते सुधन मित्युक्ति मृणं पश्चानु खेषुव । इति । २७ ।
अपने उच्च से आकृष्ट हो कर जब ग्रह सूर्य दिशा में जाते हैं । वह धन गति