सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 139, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ स्फुटाधिकारः
पञ्चमः प्रकाशः
ग्रह स्फुटी करणम्
अथोच्यते महीनिष्ठ दृष्टि तुल्या स्फुटी कृतिः ।
ग्रहाणां फल दातृत्वं न घटेत यया विना । १ ।
पृथ्वी के किसी स्थान से जिस राशि आदि में ग्रह दिखाई देते हैं, उसी
राशि आदि को गणना द्वारा लाने को ग्रह स्फुट करना कहते हैं । जिस स्थान पर
ग्रह दिखते हैं, उसी के अनुसार फल देते हैं . अतः ग्रह स्फुट करने की विधि
कही जाती है ।
प्रवाहाख्ये मरुद् भूमिं परिक्रामति सर्वदा
पश्चिमाभिमुख स्तेना कृष्टो ज्योतिर्गणोऽन्वहम् । २ ।
पृथ्वी के चारों तरफ प्रवह नामक पवन परिक्रमा कर रहा है । जिससे
आकर्षित हो ज्योतिर्मण्डल (ग्रह नक्षत्र आदि) -
याति यत्पश्चिमा माशा मुदिता साहिकी गतिः .
तां भित्वा यद्ग्रहगणः स्व स्व शक्त्यनुसारतः । ३ ।
पूर्व से पश्चिम की तरफ दिन में एक बार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं । जिसे
दैनिक गति कहा जाता है । नक्षत्रों की तुलना में (उनकी और प्रवह गति की
विरुद्ध दिशा में) ग्रह गण अपनी अपनी शक्ति के अनुसार -
स्तोकेन याति पूर्वाशां सोक्ता स्वाभाविकी गतिः
शीघ्रमन्द वशाद् भिन्ना दृश्यन्ते स्फुट खेचराः । ४ ।
बहुत कम गित से पश्चिम से पूर्व की तरफ चलते हैं । जिसे उस ग्रह की
स्वाभाविक गति कहते हैं । शीघ्र (उच्च) और मन्द ( उच्च) के वश होकर स्फुट
ग्रह अलग अलग स्थानों में दिखते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते-अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्त्तयो भगणाश्रिताः
शीघ्रोमन्दोच्च पातारुया ग्रहाणां गतिहेतवः । इति । ५ ।
(सूर्य सिद्धान्त से) भगण में स्थित शीघ्रोच्च, मंदोच्च और पात नामक काल
की अदृश्य मूर्तियां गृहों की गति के कारण हैं ।
तत्र मध्यम मार्तण्डः परितो मण्डलं भुवः
भ्रमन् तारा खेचराणां कक्षा मध्यस्थ ऊच्यते । ६ ।
मध्यम रवि भगण में पृथ्वी से चारों तरफ नक्षत्र और ग्रहों की कक्षा के मध्य
भाग में परिक्रमा करते हैं ।