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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४६ सिद्धान्त दर्पण
(योग) तथा पश्चिम दिशा की गति ऋणात्मक होती है । (सूर्य सिद्धान्त उद्धरण
समाप्त) ।
मन्दस्फुट महान् पाताश्चन्द्रादीन् याम्यसौम्ययोः
विक्षेपन्त्वेषु विक्षेपः स्वक्रान्त्यन्ता कलात्मकः । २८ ।
ग्रह कक्षा क्रान्ति वृत्त से कोण बनाती है, ग्रह बिम्ब से क्रान्ति वृत्त पर लम्ब
का मूल ही क्रान्ति पर ग्रह की स्पष्ट स्थिति है । लम्ब की दूरी को शर या विक्षेप
कहते हैं । ग्रह कक्षा और क्रान्ति वृत्त जिन दो विन्दुओँ पर मिलते हैं । (विक्षेप
शून्य होता है) उसे पात कहते हैं । ग्रह कथा का आधा भाग क्रान्तिवृत्त के उत्तर
और आधा दक्षिण होता है । अतः पात को उत्तर या दक्षिण विक्षेप का कारण
माना जाता है जो मन्दस्फुट ग्रह को उत्तर या दक्षिण की तरफ खींचता है । विक्षेप
को कला में नापा जाता है ।
सूर्यसिद्धान्ते-उत्तराभिमुखं पातो विक्षिपत्य परार्द्धगः ।
ग्रहं प्राग् भगणार्धस्थो याम्या यामपकर्षति । इति । २९ ।
ग्रह से पश्चिम (पीछे) १८० (अर्द्धवृत्त) में पात उत्तर की तरफ ग्रह को खींचता
है । तथा ग्रह के पूर्व (पहले) १८० कक्षा में पात दक्षिण दिशा में विक्षेप करता
है ।
पूर्वा पर गतः पातो बुध भार्गव शीघ्रयोः ।
पूर्ववद् विक्षिपत्येतौ न्यस्ते तच्छक्ति रुष्णगौ । ३० ।
बुध और शुक्र का भगण सूर्य भगण होता है । उनका शीघ्रोच्च ही बुध और
शुक्र हैं । अतः उनके पात शीघ्रोच्च से पूर्व १८० के अन्दर हों तो दक्षिण शर, नहीं
तो उत्तर शर होता है ।
स्वपात सम खेटस्य पात चक्रार्धगस्य च
विक्षेपो नौजपादान्ते परमोऽसौशराभिधः । ३१ ।
ग्रह और पात के बीच युग्म पादान्तर (एक साथ या १८०° अन्तर होने पर )
शर या विक्षेप नहीं होता है (ग्रह क्रान्ति वृत्त पर होता है), ओज (विषम पादान्तर
-९०° या २७०° अन्तर) रहने पर शर सर्वाधिक (परम) होता है ।
मध्येषु लिप्ता परमा विधोर्नव ख वह्नयः (३०९)
कुजस्य कुहरा (१११) ज्ञस्य कृतभूपा (१६४) बृहस्पते । ३२ ।
ग्रहों का मध्यम परमशर मान-चन्द्रमा ३०९ लिप्ता
मंगल १११ लिप्ता, बुध १६४ लिप्ता, (बृहस्पति का....)
गजाद्रये (७८)ऽथ शुक्रस्य वसुवेद निशाकराः (१४८)
शने र्गोमनव (१४९) स्तासां पश्चाद् वक्षे स्फुटीकृतिम् । ३३ ।
वृहस्पति का ७८ लिप्ता, शुक्र का १४८ लिप्ता, तथा शनि का १४९ लिप्ता