सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रह स्फुटी करणम् ५९
बुध का मन्द केन्द्र जिस पाद में हो उस पाद की गत और भोग्य कला में
जो कम हो उसकी ज्या को ९ से भाग कर लब्धि कला को मन्द परिधि (२७)
से घटाने पर बुध की स्फुट मन्द परिधि होगी ।
शुक्रस्य मन्द परिधिः केन्द्र दोर्ज्याक्षि (२) घाततः ।
त्रिज्या (३४३८) भक्तात् फलांशादि रहित, स्फुट उच्यते । ११२ ।
शुक्र की मन्द केन्द्र भुजज्या को २ से गुणा कर त्रिज्या (३४३८) से भाग देने
पर प्राप्त अंश आदि को मन्द परिधि में ( १२ अंश) से घटाने पर शुक्र की स्फुट
मन्द परिधि होगी ।
सूर्य सिद्धान्ते-तद्गुणे भुज कोटिज्ये भगणांश (३६०) विभाजिते ।
तद् भुजज्याफल धनुर्मान्द्यं लिप्तादिकं फलम् । इति । ११३ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार संस्कृत मन्द परिधि को मन्द केन्द्र की भुजज्या से
और मन्द केन्द्र कोटिज्या से गुणा कर (३६०) से भाग देने पर क्रमशः मन्द भुजफल
और मन्द की कोटिफल होता है ।
तत्व नेत्रो (२२५) न लिप्तानां समभावात् धनुक्रिया ।
नेष्यते बहुतायातु ततस्तत्कर्म युज्यते । ११४ ।
२२५ कला (३° ४५') चाप में और ज्या में अन्तर नहीं होने से कारण द्वितीय
से छोटे चाप की ज्या या ज्या का चाप निकालने की आवश्यकता नहीं है ।
उससे अधिक होने पर ही ज्या और धनु निकालना, जाहिये ।
सूर्य सिद्धान्ते-शैघ्रं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम्
सशोध्यन्तु त्रि जीवा (३४३८) या कर्क्या दौ कोटिजं फलम् । इति । ११५ ।
श्लोक ११३ के अनुसार शीघ्र कोटिफल निकाल कर शीघ्र केन्द्र मकरादि ६
राशि में रहने पर उसको त्रिज्या (३४३८) में जोड़े अन्य राशियों में त्रिज्या से
घटायेंगे ।
सैवोक्ता संस्कृत त्रिज्या ज्यारूपं भुजकोटिजम्
फलमैत्रैव गृह्णेत धनर्ण कृत कर्मणि । ११६ ।
इस फल का नाम कोटिज भुजफल है और त्रिज्या में जोड़ने घटाने काम में
इन्हें ज्या रूप (चाप रूप नहीं) ही देखना चाहिये ।
सूर्य सिद्धान्ते-तद् बाहु फलवर्गे ज्यान्मूलं कर्णश्चलाधिपः
त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चल कर्ण विभाजितम् । ११७ ।
इन ज्या चाप भुज और कोटि के वर्ग को जोड़कर उसका वर्गमूल निकालने
से शीघ्र कर्ण आता है । भुजफल को त्रिज्या (३४३८) से गुणनकर शीघ्र कर्ण से
भाग देने पर