सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
३० सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र ,, ,, ,, रा. १०।२२।३४।५९।४
महीज मन्दस्य कृता (४) हया (७) विधू (१)
भुजाब्धयः (४२) पावक शीतमानवः (१३)
मृदोर्विदः स्यु गिरयो (७) ऽङ्ग भूमयः (१६)
पयोधय (४) पूर्णविधू (१०) रसेन्दवः (१६) । ६४ ।
मंगल मन्दोच्च का करणाब्द ध्रुव रा. ४।७।१।४२।१३
बुध मन्दोच्च ,, ,, रा. ७।१६।४।१०।१६
सुरेज्य मन्दस्य शरा (५) नगेन्दवो (१७) नगेन्दवो
(१७) विष्णुपदं (०) शरेन्दवः (१५) भृगोर्मृदूच्चस्य भुजो
(२) शिवोमुखा (५) नवाग्नयः (३९) सर्पगुणाश्च (३८)
गोभुजाः (२) । ६५ ।
गुरु मन्दोच्च का करणाब्द ध्रुव रा ५।१७।१७।०।१५
शुक्र ,, ,, रा. २.५।३९।३८।२९
शनेर्मृदूञ्चस्य मता मतंगजा (८)
नवां (९) ङ्क चन्द्रा (१९) श्रतुरब्धयो (४४) दिशः (१०) ।
सुधाकरादेरथ पातज ध्रुवा
भचक्रशुद्धाः करणाब्द वक्त्रजाः । ६६ ।
शनि मन्दोच्च का कारणाब्द ध्रुव रा. ८।९।१९।४४।१०
चन्द्रमा आदि के पात का ध्रुव चक्र शुद्ध कर के करणाब्द के समय दिये हुए
हैं । (विलोम गति के कारण १२ राशि से घटाया हुआ है )
हिमांशु पातस्य गुणा (३) महीभुजा (२१)
नगेन्दवो (१९) नाग भुवो (१८) ऽष्ट बाहवः (२८)
कुजन्म पातस्य ख (०) मष्टबाहवः (२८)
सितांशु बाणा (५१) स्त्रिभुजाः (२३) कु सिन्धवः (४१) । ६७ ।
चन्द्र पात का करणाब्द ध्रुव रा. ३।२१।१९।१८।२८
मंगल ,, ,, रा. ०.२८।५१।२३।४१
बुधस्य पातस्य ख (०) मंक बाहवो (२९)
नगेन्दवो (१७) नागभुजा (२८) गजेशवः (५८)
बृहस्पते स्तद् ध्रुव ईक्षणे (२) शिवा (११)
गुणाः (३) पृषत्केन्दुमिता (१५) नवेषवः (५९) । ६८ ।
बुधपात का करणाब्द ध्रुव रा. ०।२९।१७।२८।५८
गुरुपात ,, ,, रा. २।११।३।१५।५९
ग्रहानयन वर्णनम् ३१
सितस्य पातस्य धरा (१) ब्धि बाहवो (२४)
गुणा (३) निशानाथ गुणाश्च (३१) पुष्करम् (०)
शनेर्गुणाः (३ ) ख (०) त्रिभुवो (१३) ऽद्रिबाहवः
(२७) कृतेक्षणानि ( २४) ध्रुव एव पातजः । ६९ ।
शुक्र पात का करणाब्द ध्रुव रा. १।२४।२।३१।०।
शनि ,, ,, रा. ३।०.१३।२७।२४
इतीरिताः खेट तदुच्च पातजध्रुवा कृतैतद् भगणानुपातजाः ।
सुधांशुपातः स्फुट राहुरुच्यते तदीय भार्धं किल केतु रादिभिः । ७० ।
भगण के अनुपात से यह ध्रुव निकाले गये हैं । चन्द्रपात को राहु (उत्तर पात)
तथा उससे १८०° पर केतु पात विद्वान् लोग मानते हैं ।
मन्दोच्च पातानयनं दिनेभ्यं पुरोदितं तद् वदिदं समाभ्यः ।
अब्दास्तु तत्तद् भगणै र्विनिघ्ना लक्ष द्वयाप्ता फल मत्र लिप्ताः । ७१ ।
मन्दोच्च और पात अतीत दिवस में लाने की विधि कही जा चुकी है । वर्ष
सम्बन्धीय मन्दोच्च और पात निकालने के लिये वर्षा संख्या को कल्पभगण से
गुणा कर २,००,००० से भाग दें, लिप्ता आदि में वह गति का मान होगा ।
ध्रुवेषु युक्ता वियुताः क्रमेण स्फुटा ग्रहाणादय एव ते स्युः
किं वा सुखार्थं हरणैः स्वकीये र्नानेतु मर्हामृदुतुंग पाताः । ७२ ।
इस फल को करणाब्द ध्रुव में जोड़ने (पात में घटायें) अभीष्ट पात और उच्च
आयेगा । इसके बदले अपने अपने अनुपात से भी गति का मान निकाला जा
सकता है ।
मृदूच्च पातपर्ययैः ख खाभ्र खाभ्र पक्षका (२,००,०००)
हृताः फलानि हारकाः स्वकाः स्वकाः समात्मकाः । ७३ ।
कल्प भगण संख्या में २,००,००० से भाग देने पर हार आता है, गत वर्ष
संख्या से इसे गुणा करने पर कला आदि में इतने वर्ष की गति आती है ।
तदुद्धृताब्द वृन्दत कलादिभिः फलैर्ध्रुवाः
युतो निताः स्फुटाः क्रमान् मृदूच्चपातभादयः । ७४ ।
इस फल को पहले की तरह ध्रुव में जोड़ने (या पात में घटाने से ) उच्च ग्रह
और पात आयेगा ।
सुराराद्युच्चहारा नवनवकशरा (५९९) बाणवेदत्तं वो (६४५) ऽष्टा
ष्टाम्नाया (४८८) नागसिद्धा (२४८) नवशरशिखिनः (३५९)
सप्तपञ्चाष्ट पक्षाः (२८५७)
आरादेः पातहाराः क्षितिनगक्रतवः (६७१) पक्षषड् वीतिहोत्रा (३६२)
३२ सिद्धान्त दर्पण
धृत्याष्टक्ष्माश्च (१८१८) पक्ष क्षिति नयन मिताः (२९२)
सप्तषड् वह्नयः (३६७) स्युः । ७५ ।
इस प्रकार निकाले गये पात हार निम्न लिखित हैं-
रविमन्दोच्चहार ५९९
मंगल ,, ६४५ मंगल पात हार ६७१
बुध ,, ४८८ बुध ,, ३६२
बृहस्पति ,, २४८ वृहस्पति ,, १८१८
शुक्र ,, ३५९ शुक्र ,, २९२
शनि ,, २८५७ शनि ,, ३६७
प्राची प्रतीच्येः कुज सौम्य मन्द मन्दोच्च सञ्चार इहेष्यते यत् ।
तथाज्ञशीघ्रोच्च गतिश्च कार्या तत्संस्कृतः स्पष्ट खगाधिकारे । ७६ ।
मन्दोच्च और शीघ्रोच्च गति प्रायः पश्चिम से पूर्व की तरफ मानी जाती है ।
लेकिन ग्रन्थ कार के मत से मंगल, बुध और शनि के मन्दोच्च तथा बुध शीघ्रोच्च
की गति दोनों दिशाओं में होती है । इसकी चर्चा ग्रह स्फुट करने के योग्य समय
की जायेगी ।
प्राच्यं काञ्चन भूधरा सुरपुरी सम्पृक्त सूत्रायितु-
र्दन्तिक्षमा (१८४) मित योजनान्त मिलिते व्यक्षोत्तरस्यामपि ।
अब्धेरोधसि सिन्धु सिन्धुर भुजें (२८४) यो योजनै राजते
नित्यं शित्यवनी धरेन्द्र शिखरे तस्मै परस्मै नमः । ७७ ।
पाठान्तर (प्राच्यां काञ्चन भूधरा सुरपुरी सम्पृक्त सूत्रायितु
दन्तिक्षमा (१८४) मितयोजनान्त वसते व्यक्षोत्तरस्याम् द्यतात्
वेदाहीक्षण (२८४) योजनान्त जयतो देशस्य जिष्णोर्दिशि
भ्राजिष्णुर्विभुरुष्ण धृष्णि जनुषो भीष्मत्व मस्मद् गतिम् )
जो परमात्मा (जगन्नाथ) नीलाचल शिखर पर नित्य विराजमान हैं उनको
मेरा प्रणाम । नीलाचल (पुरी) भारतीय माध्यन्दिन रेखा से १८४ योजन पूर्व और
विषुव रेखा से २८४ योजन उत्तर समुद्र कूल में है ।
इत्युत्कलोज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत श्री चन्द्रशेखरकृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे यात स्तृतीय मध्य खगः प्रकाशः ।७८।
इस प्रकार उड़ीसा के उत्तम राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा दृग्गणितैक्य
और बालबोध के लिए रचित सिद्धान्त दर्पण में मध्यम ग्रह सम्बन्धी तृतीय अध्याय
समाप्त हुआ ।
चतुर्थः प्रकाशः
नानाविध संस्कार वर्णन
अथोच्यते स्वदेशादि संस्कारार्थं समासतः
भूमान मुत्तरे भागे विस्तराद् वक्ष्यते पुनः । १ ।
अब अपने स्थान में मध्य ग्रह संस्कार करने की विधि दी जाती है । (तृतीय
अध्याय में लंका के मध्यम ग्रह का साधन था । इस संस्कार के लिए पृथ्वी का
परिमाण संक्षेप में कहा जाता है, उत्तरार्द्ध में विस्तार से कहा गया है ।
मध्यव्यासो भुवः खाभ्रभूप (१६००) योजनसम्मितः
भचक्रे कलिकार्द्ध (१०,८००) घ्न स्त्रिborder(३४३८) भ्तः परिधिर्भवेत् । २ ।
पृथ्वी का मध्यम व्यास (विषुव रेखा पर) १६०० योजन है । इस संख्या को
१०८०० (वृत्त ३६०° की कलाओं ३६० x ६० का आधा ) से गुणा कर त्रिज्या
३४३८ (१०८०० लम्बी अर्द्ध परिधि की त्रिज्या ) से भाग देने पर पृथ्वी की परिधि
(५०२६।१० योजन) आती है ।
षष्ठांशाभ्यधिकं खां गाक्षि गग नाशुग (५०२६।१०) योजनम्
भूमध्य वेष्टनं स्वीयं लम्बज्याघ्नं त्रिज्यवया (३४३८) । ३ ।
(पृथ्वी की परिधि) ५०२६। १० योजन हैं । मध्यम भूपरिधि को लम्बज्या
(केन्द्र से ज्यार्द्ध की दूरी) से गुणा कर त्रिज्या (३४३८-२१६०० कला वाले वृत्त
की त्रिज्या ) से भाग देने पर स्पष्ट भूपरिधि मिलती है ।
हतं स्वदेशवसुधा परिधिः स्फुट मुच्यते ।
किंवार्क (१२) घ्नः सपरिधि र्विषुवत्कर्ण भाजितः । ४ ।
अथवा मध्यम भूपरिधि को १२ से गुणा कर विषुव कर्ण से भाग देने पर भी
स्पष्ट भूपरिधि आती है । विषुव दिन मध्याह्न में १२ अंगुल के शंकु की छाया
पलभा, शंकु उच्चबिन्दु से उसकी छाया की दूरी विषुव कर्ण या पल कर्ण है ।
लंका रोहित का वन्ती कुरुक्षेत्रादिनीवृतः ।
स्पृष्टा मेरुगतं सूत्रं मध्यरेखोंच्यते भुवः । ५ ।
. लंका, रोहितक, अवन्ती, कुरुक्षेत्र स्थान आदि होकर जाती हुई दोनों ध्रुवों
(मेरु) के बीच का वृत्त (देशान्तर) ही प्रधान माध्यन्दिन रेखा है । (अभी जिस
प्रकार ग्रीन विच की माध्यन्दिन रेखा को ०° (प्रधान) माना जाता है, भारत में
उज्जैन की रेखा को प्रधान मानते थे । उस रेखा पर विषुव रेखा पर का स्थान
लंका कहलाता है ।)
स्वीय देश समानोऽक्षो रेखायां विषयोऽस्तियः ।
तन्निजस्थानयो र्मध्य मानं देशान्तरं मतम् । ६ ।
३४ सिद्धान्त दर्पण
(स्फुट परिधि पर) समान अक्षांश वाले दो स्थानों के बीच की दूरी (पूर्व से
पश्चिम) को देशान्तर कहते हैं ।
तद्योजनैः षष्टि (६०) हतैः स्फुट भू वेष्टनोद्धतैः
अथवा विषुवत्कर्ण लिप्तिका भिश्च ताड़ितै । ७ ।
इस देशान्तर योजन को ६० से गुणा कर स्पष्ट भूपरिधि योजन से भाग देने
पर, अथवा देशान्तर योजन को पल कर्ण से गुणा कर ....
मनु रामाभ्रषड् (६०३१४) भक्तैः स्युर्देशान्तर नाड़िकाः ।
रेखायाः पूर्व देशेषु निशार्द्धों परि योजिताः । ८ ।
...(६०३१४) से भाग देने पर दण्ड आदि देशान्तर समय आता है । रेखा के
पूर्व देशों में अपने देश की अर्द्धरात्रि में जोड़ने से....
पश्चिमेषूनिता वारा मासाब्दैश प्रवृत्तयः ।
लंकार्ध रात्रतां यत्तत् प्रवृत्तिं सर्वदेशके । ९ ।
या पश्चिम के स्थानों में घटाने से लंका की अर्ध रात्रि का समय आता है
क्योंकि दिन, मास और वर्ष आदि का प्रारम्भ लंका की अर्धरात्रि से ही सभी देशों
में होता है ।
वदन्ति केचिदा चार्या लंकाकोंदय कालतः
वार प्रवृत्ति मत्रेयं व्यवस्था क्रियते मया । १० ।
कुछ आचार्य लंका के सूर्योदय काल से बार आदि का आरम्भ मानते हैं ।
सन्देह दूर करने के लिए इस सम्बन्ध में मेरा निर्णय है-
वारे यस्मिन्नुदेत्यर्कः स्वदेशे समयात्ततः ।
तदीशितुरहोरात्रे बलाधिकं प्रवर्त्तते । ११ ।
जहां पर जिस समय सूर्योदय हो वहाँ सूर्योदय से ६० दण्ड तक उसी
वाराधिपति का अधिक बल होता है ।
दिवा रात्रौ यथा भागं याम यामार्धजं बलम्
गृह्यते क्वापि देशेषु न तत्सि द्धान्त सम्मतम् । १२ ।
कई देशों में याम और या मार्द्ध का भी बल कहा जाता है । (पर यह फलित
का विचार है) । इससे सिद्धान्त का कोई सम्पर्क नहीं है ।
यदाह भास्करः सर्व्वारम्भो लंकोदयादिति ।
तदुक्ता हर्गणानां हि संख्या सिद्धान्ततः पृथक् । १३ ।
भास्कराचार्य ग्रहगति आदि का आरम्भ लंका के सूर्योदय से मानते हैं अतः
उनका अहर्गण अन्य सिद्धान्तों से अलग है ।
३
नानाविध संस्कार वर्णन ३५
भिन्नत्वेऽपि यदिदानीं तदानीता र्यमादय
दृक् सम अभिविष्यं यस्तद्ग्रहीष्यत तन्मतम् । १४ ।
इस भिन्न अहर्गण को भी स्वीकार किया जा सकता है। यदि उसके द्वारा
साधित ग्रह प्रत्यक्ष वहीं पर दिखाई दे।
ग्रहाणां स्वस्व गतयो देशान्तर घटी हताः
षष्ट् याप्ता स्तत् फलं प्राच्या मृणं पश्चाद् घनं ग्रहे । १५ ।
लंका अर्ध रात्रि के ग्रह को अपने देश की अर्ध रात्रि का ग्रह बनाने के लिये
ग्रह की दैनिक गति को देशान्तर घटी से गुणा कर ६० से भाग देते हैं। तथा
लब्धि को जोड़ते (लंका से पश्चिम स्थानों के लिए) या घटाते (पूर्व के स्थानों के
लिए) है।
किं वा तद्गतयः क्षुण्णाः स्वदेशान्तर योजनैः
स्फुट भूमिं परिध्याप्ताः संस्कारा मध्यमेषुताः । १६ ।
अथवा, दैनिक गति को देशान्तर योजन गुणा कर स्फुट भूपरिधि से भाग देने
से भी देशान्तर गति आती है। इसी भी पहले के समान जोड़ते या घटाते हैं।
समये सम्भवेद् यत्र सर्व ग्रस्त विधुग्रहः
तदा संसाधिते तस्मिन् मध्यरेखामधिष्ठिते । १७ ।
(देशान्तर निकालने की विधि) - गणना द्वारा मध्य रेखा के स्थान पर होने
वाले किसी पूर्ण ग्रास चन्द्र ग्रहण का साधन करें।
स्वसमानाक्षके देशे तदुन्मीलन कालतः
एष्यद् गत समालोक्य स्वदेशो न्मिलनं क्रमात् । १८ ।
अपने स्थान में उसी पूर्ण ग्रह का समय देखें। ग्रहण के स्पर्श, पूर्ण ग्रास या
उन्मीलन से भी यह विचार हो सकता है।
प्राक् पश्चिम गतं बुद्ध्वा स्वस्थान मध्य सूत्रतः ।
तयोरन्तर नाड़ीभिर्हन्या भूपरिधिं स्फुटम् । १९।
यदि गणना काल से पहले ग्रहण होता है तो अपना स्थान मध्य रेखा (सूत्र)
से पश्चिम है (पीछे होने पर पूर्व)। इन दोनों का अन्तर देशान्तर काल हुआ।
इसके दण्ड आदि को स्पष्ट भूपरिधि से गुणाकर-
षष्ट्या विभज्य लब्धानि योजनान्यव गच्छतु ।
किं वा निमीलनात् साध्यं मानं देशान्तरस्य च । २० ।
(६०) से भाग दे, देशान्तर का योजन आदि आता है। निमीलन काल से
भी इसी प्रकार होता है।
३६ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते-इष्ट नाड़ि हता भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम् ।
गते शोध्यं युतं गम्ये कृत्वा तात्कालिको भवेत् । इति । २१ ।
(सूर्य सिद्धान्त से उद्धृत) किसी समय का (तात्कालिक) ग्रह लाने के लिए
दैनिक ग्रह गति (कलादि) में इष्ट समय (अर्ध रात्रि के बाद उस समय का दण्ड
आदि) से गुणा करते हैं । तथा ६० (६० दण्ड का दिन ) से भाग देते हैं । लब्ध
कला आदि को मध्य रात्रि ग्रह में जोड़ने से इष्ट काल का ग्रह आता है ।
दिनानां गणना यस्मात् सूर्योदय इष्यते
तत्तस्तात्कालिकेषु विधेय चर संस्कृति । २२ ।
चर संस्कार -इस प्रकार देशान्तर स्कार करने से लंका का सूर्योदय कालिक
ग्रह अपने स्थान के निरक्षोदय (अपनी माध्यन्दिन या देशान्तर रेखा का विषुव
वृत्त पर सूर्योदय) काल का ग्रह होगा । लंका और अपने स्थान के बीच अक्षांश
दूरी· (उत्तरं दिक्षण दिशा में दूरी) के कारण चर संस्कार की आवश्यकता है (क्योंकि
सूर्योदय का समय दूसरा होगा ।
स्फुटार्कापक्रमनिता देश कालोत्थिता स्वकाः ।
चरनाड्यः स्वभुक्तिघ्न्यः षष्ठि भक्ताः फलं ग्रहे । २३० ।
उदय कालिक स्फुट सूर्य की क्रान्ति से चर दण्ड निकाल कर उसे ग्रह की
दैनिक गति से गुणा कर ६० से भाग देते हैं ।
धनर्णं क्रमशॊ भानौ दक्षिणोत्तर गोलगे ।
अस्त कालिकं खेटेषु वैपरीत्येन संस्कृतः । २४ ।
सूर्य दक्षिण-अयन (सायन तुला से मीन) में रहने पर फल (चर संस्कार को
जोड़ते हैं, उत्तरायण (मेष से कन्या) में रहने पर उदयकालिक ग्रह से इसे घटाते
हैं । अस्तकालिक ग्रह के लिए उल्टा करते हैं (उत्तरायण सूर्य के लिए चर संस्कार
जोड़ते हैं । अन्यथा घटाते हैं ।
गताब्दे स्फुट सूर्यस्य यत्रांशे यदभूच्चरम् ।
तत्तत्र वर्तमानाब्दे ग्राह्यां मध्यार्यमादिषु । २५ ।
स्फुट सूर्य पिछले वर्ष अंश में रहने पर जितना चर दण्ड था इस वर्ष मध्यम
रवि का उतने ही अंश पर उसी के बराबर चरदण्ड होगा (बहुत कम अन्तर
होगा) ।
रविमान्द्यफलव्यक्ष लग्न माना यनांशकैः
वंक्षमाणैः क्रिया मन्यां वच्मि मध्य ग्रहोचिताम् । २६ ।
रवि के मन्दफल, निरक्ष लग्नमान और अयनांश आदि द्वारा और एक मध्य
ग्रह संस्कार की क्रिया कहता हूँ ।
नानाविध संस्कार वर्णन ३७
अर्द्धरात्रान्मध्यभानोः स्फुटार्कस्य निशादलम् ।
भिन्नं यद्युज्यते तस्मात् तद् भुजान्तर संस्कृति । २७ ।
मध्य रवि के अनुसार जब अर्द्ध रात्रि होनी चाहिये, स्फुट (वास्तविक) रवि
के अनुसार उससे भिन्न समय में अर्द्ध रात्रि होती है । अतः स्फुट अर्धरात्रि का
ग्रह लाने के लिए मध्य और स्फुट रवि के बीच भुजफल संस्कार किया जाता
है ।
चलांश संस्कृतादित क्रान्त्यराश्युदयासुभिः
निरक्ष देशजै र्निघ्ना रवि दोः फल लिप्ति काः । २८ ।
अयन संस्कृत (अयनांश जोड़कर) रवि के मन्द भुजफल को रवि की राशि
के उदय असु (उस राशि के विषुव रेखा के उदय काल प्राण) से गुणा करें
अष्टादश शतै (१८००) राप्ताः स्व स्व भुक्ति भिराहताः
मध्यार्क सावन दिन प्राणे राप्ता कलादयः । २९ ।
फल लिप्ता को (१८००) से भाग दें । फल को ग्रह की दैनिक गति से गुणा
कर मध्यम रवि सावन दिन के असु ((२१,६५९) से भाग दें तो कलादि भुजान्तर
संस्कार होगा ।
स्वमृणं सूर्य फलवत् कार्याः सूर्यादि खेचरे ।
शीघ्रेन्दुच्चेषुराहौतु व्यस्ताः संस्कृतयोऽखिलाः । ३० ।
इस भुजान्तर को ग्रह में रवि के मन्दफल की तरह जोड़ते हैं या घटाते हैं ।
लेकिन शीघ्र फल से भुजान्तर संस्कार करने पर या चन्द्र के मन्दोच्च या राहु के
भुजान्तर में उल्टा होगा ।
अल्पान्तरत्वादथवा रवि बाहु फलाहता
भुक्तिर्भचक्र कलिका (२१६००) भक्ता लिप्तादि तत्फलम् । ३१ ।
अथवा, (भुजान्तर करने के लिए) रवि के मन्दभुजफल को ग्रह की दैनिक
गति से गुणा कर (२१,६००) से भाग देने से लिप्ता आदि में फल होगा ।
किं वा भक्ताश्चक्रलिप्ता, (२१,६००) गत्याच्छेदस्तु तत्फलम् ।
तेनार्क दोः फलं भक्तं प्राग्व ल्लिप्तादि संस्कृतः । ३२ ।
अथवा (२१,६००) को ग्रह की दैनिक गति से भाग दें, लब्धि से रवि के
मन्दभुज फल में भाग दें ।
भुजान्तराक्ष कर्मोक्त मुद्यान्तर मुच्यते
क्रान्तिज्यार्क क्वहाल्पत्व भूमौत्थ फल कारणम् । ३३ । *
भुजान्तर संस्कार करने के बाद उद्यान्तर की विधि कही जाती है । क्रान्ति
वृत्तीय रवि और नाड़ी वृत्तीय (विषुव रेखा ) रवि (उभय मध्यम) के बीच अन्तर
३८ सिद्धान्त दर्पण
के कारण यह संस्कार होता है ।
संस्कृत सायनांशाद्यै र्मध्यमस्य विवस्वतः
लग्न भुक्तासवोऽतीत मेषादि प्राण संयुताः । ३४ ।
मध्यम रवि को सायन कर (अयनांश जोड़कर), उसकी राशि के बीते हुए
अंशों के निरक्ष देशीय भुक्त असु में मेष से आरम्भ कर पिछली राशियों के असु
(प्रत्येक राशि के १८०० असु) मिलायें ।
निरक्ष देशजायेस्यु र्यंश्च मध्यम भास्वतः
चलांश संस्कृत स्यैव लिप्तास्तद् विवराहताः । ३५ ।
तब सायन रवि की मेषादि भोग्य निकालेंगे और दोनों फलों का अन्तर करें ।
सूर्यादि मध्य चन्द्रोच्च पात शुक्रज्ञ शीघ्र जा ।
गति लिप्ता हता गोऽग्नि भूप दृग् भिः (२१६५९) कलात्मकम् । ३६ ।
अन्तर को ग्रह की गति लिप्ता से गुणा कर (२१,६५९) से भाग दें- लब्धि
उदयान्तर फल होगा ।
फलं तत्सूर्य युग्मैज पदयोः सुमृणं क्रमात्
(पाठान्तर-अत्रतत्सूर्य पदेनायनांश सूर्योव्यज्यतैः)
कार्यं मध्य ग्रहाद्येषु किं वा प्रोक्तं चरादिकम् । ३७ ।
सायन मध्यम रवि सम पद में रहने से उदयान्तर फल ग्रह में जोड़ा जायगा,
विषमपाद में रहने पर घटायेंगे । उच्च और पात में इसके विपरीत होगा ।
संस्कार त्रितयंस्पष्ट क्रियानिष्पत्यनन्तरम् ।
कर्तव्यं कृतिभिः स्व स्व स्फुट भुक्ति भिरेवतत् । ३८ ।
(चर, भुजान्तर और उदयान्तर) तीन संस्कार मध्य ग्रह में न कर स्पष्ट ग्रह में
भी किये जा सकते हैं ।
तदामध्येषु शीघ्रेषु मन्दोच्चे ऽपि न तत्क्रिया ।
कार्यास्फुट ग्रहेषे वयत्तेतैः प्राक् परिष्कृताः । ३९ ।
स्फुट ग्रह में यह संस्कार करने के समय मन्दोच्च चन्द्रोच्च और शीघ्रोच्च में यह
संस्कार पुनः नहीं किये जाते क्योंकि स्पष्ट ग्रह करते समय ये संस्कार हो जाते
है ।
यद्यर्क दोः फलं लग्न संस्कृतं तर्ह मध्यमात्
चलांश संस्कृतात् सूर्यात् साध्यं तदुदयान्तरम् । ४० ।
भुजान्तर करते समय यदि रवि के मन्दफल का असु लिया जाता है । तो
सायन मध्यम रवि से उदयान्तर संस्कार किया जाता है ।
नानाविध संस्कार वर्णन ३९
अन्यथा स्फुट मार्तण्डा दयनांश परिष्कृतात्
अभुजान्तर संस्काराद् यत्तत् फल युगं पृथक् । ४१ ।
यदि रवि मन्दफल की कला के बराबर लिया जाय तो भुजान्तर संस्कार रहित
रवि (मन्दस्फुट) से उदयान्तर संस्कार तथा भुजान्तर दोनों अलग अलग होंगे ।
भूगोल मध्य परिधिः स्वदे शाक्षकला हतः
भचक्रलिप्ति काप्तः स्याद् व्यक्षात् याम्योत्तरान्तरम् । ४२ ।
मध्य भूपरिधि को अपने स्थान के अक्षांश कला से गुणन कर २१, ६०० कला
(वृत्त ३६० की कला) से भाग देने से निरक्ष (विषुव) से उत्तर या दक्षिण अपने
स्थान की दूरी आती है । यह दूरी अपने स्थान के याम्योत्तर वृत्त पर होगी ।
प्राज्य श्रमेण यत्कार्या पर्यय ज्यादि मार्जना
कूचना चार्य वत्कुर्यां सूर्याद्य पदका द्यतः । ४३ ।
ग्रह निकालने में बहुत परिश्रम आवश्यक होने के कारण मैं कूचनाचार्य की
तरह यहाँ पदक तालिका दे रहा हूँ ।
तत्रादौ मध्यमार्कस्य मेषसंक्रमणादनू ।
एकादि वर्ष संख्योत्थ सावनाहर्गण क्रमात् । ४४ ।
मध्यमसूर्य के मेष संक्रमण से आरम्भ कर एक, दो.... आदि वर्ष पूरे होने तक
अहर्गण दिये गये हैं ।
पंक्तिभिः लेखनीयोऽस्य सञ्चयो वारशोधनात्
विषमश्चेन्निरे को वा सै को वा क्रियतामसौ । ४५ ।
जितने वर्षों में अहर्गण की आवश्यक है उतने आवश्यक स्थानों की संख्यायें
जोड़कर ७ से भाग दें । शेष द्वारा निर्धारित वार नहीं मिलने पर उसमें एक जोड़ने
या घटाने से वार शुद्धि होगी ।
एवमानीय दिवसं पञ्जिका मुख सम्मतम् ।
तत्प्राग् दिने स्वपदकैः कार्या राश्यादि सञ्चयः । ४६ ।
पञ्जिका प्रारम्भ दिवस का अहर्गण लाकर उसके पूर्व दिवस का ग्रह अपनी
अपनी सारणी के आवश्यक दिनों के संख्याओं को जोड़कर निकाला जायेगा ।
अत्राधोऽधः स्थराश्यादि पञ्चकाढ्याः कुवासराः
एकाद्यर्बुद पर्यन्ता, स्थाप्यस्तत् पदकान्ततः । ४७ ।
गतियों का योग राशि से आरम्भ ५ विभागों (परा) तक किया जाता है इस
प्रकार १ से १० करोड़ (अर्बुद) अहर्गण तक की गति निकलेगी)
कल्यादि करणाब्दादि ध्रुवाः खेटोङ्ग पालकाः ।
द्वेधा लेखा गतिच्छेद हार देशक लिप्तिकाः । ४८ ।
४० सिद्धान्त दर्पण
(ग्रह, उच्च, पात आदि के पदक लिखने के बाद) ग्रह, उच्च और पात के
कलि युगादि या करणाब्द आरम्भ के ध्रुव लिखे जायेंगे । (ग्रह, उच्च और पात
की) दैनिक गति भी लिखी जायेगी । भुजान्तर छेद, मन्दोच्च हार, पातहार और
देशान्तर काल लिखी जायेगी ।
पदकेषु त्रिसप्तत्या (७३) मूर्ध्वस्तैकादि संख्यया
दिनानां स्व स्व राश्याद्या मिश्रितश्चक्र शेषिताः । ४९ ।
७३ पदकों में ग्रहों से १,२ आदि क्रम से लिखे गये राशि अंशादि को जोड़ने
से फल यदि १२ राशि से अधिक हो तो उसमें १२ राशि (एक चक्र) घटाते हैं ।
स्वध्रुवाढ्य मध्य शिघ्रा श्वन्दोच्च सहिता ग्रहाः
लंकार्धरात्रे कल्यादेः करणाब्दा दिनोदये । ५० ।
ग्रह राशि में ध्रुवांक मिलाने पर भी योग १२ राशि से अधिक होने पर १२
राशि घटना चाहिये । कलि प्रारम्भ से लंका अर्धरात्रि का एवं करणाब्द आरम्भ
से करणाब्द के प्रथम दिन सूर्योदय समय के चन्द्रोच्च, मध्यम शीघ्रोच्च आदि रवि
आदि ग्रह होंगे ।
भवन्ति चन्द्र पातस्य ध्रुवस्त द्युक्ति वर्जितः
योज्यत् तद् ध्रुवे चक्रमधिके फल संचये । ५१ ।
चन्द्रपात राहु का मध्यमान निकालने के समय राशि आदि में ध्रुव घटाना
पड़ेगा, ध्रुव यदि ज्यादा हो तो १२ राशि जोड़ना होगा तब घटायेंगे ।
कुत्रचित्पदके नष्टे सन्दिग्धां के मषः सदाम् ।
तत्संख्याहर्गणो भुक्ति गुणितस्तत्पदं भवेत् । ५२ ।
यदि कहीं का पदक नष्ट होता है, उससे १० गुणी संख्या का पदक देखकर
१० से भाग दें । (या १० वीं संख्या के पदक में १० से गुणा करें)
एवमानीय रव्यादी स्ततो देशादि संस्कृतिम् ।
कृत्वा खण्डफलैः पश्चात् स्फुटीकरण माचरेत् । ५३ ।
इस प्रकार रवि आदि ग्रह लाकर देशान्तर आदि संस्कार होगा ।
उसके बाद दिये गये खण्डफलों की सहायता से ग्रह स्फुट होगा ।
लेख्ये स्व स्व प्रकाशेषु निवेश्यं पदकादिकम् ।
(अथ पदकानि परिशिष्टे द्रष्ट व्यान्रि । )
ग्रन्थ यन्त्रालयोत्थेतु सर्वान्तेऽत्र यथाक्रमम् । ५४ ।
लिखने के समय अपने अपने विभाग में पदक दिये गये हैं लेकिन प्रेस में
मुद्रित ग्रन्थ के अन्त में परिशिष्ट में क्रमानुसार दिया गया है ।
नानाविध संस्कार वर्णन ४१
सिद्धान्त क्रम संसिद्ध स्फुटीकरण लेखनात् ।
अनन्तरं फला न्येषां लेखिष्यन्ते यथाक्रमम् । ५५ ।
सिद्धान्त ग्रन्थ की परम्परा के अनुसार पहले पदक उसके बाद स्फुट ग्रह के
लिए खण्डफल लिखे गये हैं ।
इति खग भगणेभ्यः प्राक् फलैः संवद्धभ्यो
ध्रुवगति पद लेखा लेखि सौरूयार्थमेषा
खचर विषम भावे द्रक्षमाणेतु भुक्ति-
ध्रुव पदक कृति स्ताद् वक्ष माणोत्तरार्धे । ५६ ।
आसानी से ग्रह स्फुट करने के लिए फल ध्रुव गति आदि उनकी सारणी
सहित, १,२,३...दिन क्रम से लिखे गये हैं । पदकों के द्वारा ग्रह स्फुट करने पर
यदि उस स्थान में ग्रह प्रत्यक्ष नहीं हो तो ग्रन्थ के उत्तर भाग में दैनिक गति, ध्रुव
पदक कृति आदि देखकर उसे शुद्ध करें ।
यत्रोरान्ति चिरन्तनाः सभकलां वेदांगुला ।४।२७ मक्षभां
प्राग् देशान्तर साधितानि विपला न्यब्धि त्रिवेदद्विपान् (८४३४)
तां तान्यष्ट कलोनितां ।४।१९। फणिगुणक्ष्मांकां (९१३८) न्वास्ताद्गिरौ
राजन् राजतु राज राज सुहृदा गेयौ गिरीशः समे । ५७ ।
पूर्वाचार्यों के मत से अक्षपलभा ४।२७ और देशान्तर विलिप्ता ८४३४ तथा
आधुनिक मत से अक्ष पलभा ४।१९ और देशान्तर विलिप्ता ९१३८ पर स्थित
नीलाचल पर कुबेर मित्र शिव द्वारा पूजित श्री जगन्नाथ हमारे हृदय में विराजमान
हों ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
तुर्योययौ (४) सपद संस्कृतिमान प्रकाशः । ५८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के उज्ज्वल राजवंश में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणित
और प्रत्यक्ष में समानता तथा बाल बोध के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण का संस्कार
तथा पदक युक्त चतुर्थ प्रकाश समाप्त हुआ ।
अथ स्फुटाधिकारः
पञ्चमः प्रकाशः
ग्रह स्फुटी करणम्
अथोच्यते महीनिष्ठ दृष्टि तुल्या स्फुटी कृतिः ।
ग्रहाणां फल दातृत्वं न घटेत यया विना । १ ।
पृथ्वी के किसी स्थान से जिस राशि आदि में ग्रह दिखाई देते हैं, उसी
राशि आदि को गणना द्वारा लाने को ग्रह स्फुट करना कहते हैं । जिस स्थान पर
ग्रह दिखते हैं, उसी के अनुसार फल देते हैं . अतः ग्रह स्फुट करने की विधि
कही जाती है ।
प्रवाहाख्ये मरुद् भूमिं परिक्रामति सर्वदा
पश्चिमाभिमुख स्तेना कृष्टो ज्योतिर्गणोऽन्वहम् । २ ।
पृथ्वी के चारों तरफ प्रवह नामक पवन परिक्रमा कर रहा है । जिससे
आकर्षित हो ज्योतिर्मण्डल (ग्रह नक्षत्र आदि) -
याति यत्पश्चिमा माशा मुदिता साहिकी गतिः .
तां भित्वा यद्ग्रहगणः स्व स्व शक्त्यनुसारतः । ३ ।
पूर्व से पश्चिम की तरफ दिन में एक बार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं । जिसे
दैनिक गति कहा जाता है । नक्षत्रों की तुलना में (उनकी और प्रवह गति की
विरुद्ध दिशा में) ग्रह गण अपनी अपनी शक्ति के अनुसार -
स्तोकेन याति पूर्वाशां सोक्ता स्वाभाविकी गतिः
शीघ्रमन्द वशाद् भिन्ना दृश्यन्ते स्फुट खेचराः । ४ ।
बहुत कम गित से पश्चिम से पूर्व की तरफ चलते हैं । जिसे उस ग्रह की
स्वाभाविक गति कहते हैं । शीघ्र (उच्च) और मन्द ( उच्च) के वश होकर स्फुट
ग्रह अलग अलग स्थानों में दिखते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते-अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्त्तयो भगणाश्रिताः
शीघ्रोमन्दोच्च पातारुया ग्रहाणां गतिहेतवः । इति । ५ ।
(सूर्य सिद्धान्त से) भगण में स्थित शीघ्रोच्च, मंदोच्च और पात नामक काल
की अदृश्य मूर्तियां गृहों की गति के कारण हैं ।
तत्र मध्यम मार्तण्डः परितो मण्डलं भुवः
भ्रमन् तारा खेचराणां कक्षा मध्यस्थ ऊच्यते । ६ ।
मध्यम रवि भगण में पृथ्वी से चारों तरफ नक्षत्र और ग्रहों की कक्षा के मध्य
भाग में परिक्रमा करते हैं ।
ग्रह स्फुटी करणम् ४३
तं भ्रमन्तो महीजाद्या स्तत्संगेन भुवं पुनः
परिक्रामन्ति यत्तस्मात् स प्रोक्तः सर्वकर्षकः । ७ ।
उसी मध्यम रवि के साथ रहते हुये (रवि की परिक्रमा कक्षा में रह कर )
मंगल आदि गृह पुनः पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। अतः रवि को सबका आकर्षक
कहा गया है।
तथापि कुज जीवाकिं भुक्ति भ्यो महती यतः
तद् गतिः सततंस्तेषां शीघ्र तुंगो निगद्यते । ८ ।
मंगल, बृहस्पति और शनि को दैनिक गति से रवि की दैनिक गति अधिक
होती है और सदा वे रवि के आकर्षक में हैं। अत रवि को इन ग्रहों का शीघ्रोच्च
कहा जाता है।
बुध शुक्र स्वभुक्तिभ्या मल्पत्वाद् भास्वतो गतेः
तयोर्मध्य ग्रहो भानुः स्वयं तौ शीघ्र संज्ञ कौ । ९ ।
बुध, शुक्र से रवि की गति अल्प है तथा उनके बीच सदा रवि रहता है।
अतः बुध और शुक्र को ही उन ग्रहों का शीघ्रोच्च कहा जाता है।
बुधशुक्रावनीपुत्र वृहस्पति शनैश्चरकाः
सूर्यात् क्रमेण दूरस्थाः स्व स्व कक्षासु यान्ति यत् । १० ।
सूर्य से क्रमानुसार दूर की कक्षा में बुध, शुक्र, मंगल, वृहस्पति तथा शनि
चलते हैं। अतः
विधिना तत् क्रमेणैव यन्नाल्प गतयः कृताः
सुतरामेव दृश्यन्ते तथा भूगोल वासिभिः । ११ ।
पृथ्वी से उनकी गति उसी क्रम से अधिक धीमी दिखती है। (समान गति
होने पर भी दूरी के कारण कम दिखती है)।
चन्द्रस्यत्वर्क वद् भ्रान्ति भूमे र्निकट वर्तिनः
योजनात्म गतिर्न्यूना महति लिप्तिकात्मका । १२ ।
रवि की भांति चन्द्र की पृथ्वी की अत्यन्त निकट से परिक्रमा कर रहा है
अतः चन्द्रमा की योजनात्मक गति सबसे कम होते हुए भी उसकी कलनात्मक
गति अधिक होती है।
भूगोल पेक्षया भानोज्ञ शुक्रौ निकटौ यतः
तस्माङ्क्रान्तवद् दृश्यौ चक्रार्धेऽपि सहामुना । १३ ।
बुध और शुक्र पृथ्वी अपेक्षा रवि के निकटवर्ती हैं। अतः बारह राशि के
बाद जिसप्रकार रवि के साथ होते हैं, उसी प्रकार से ६ राशि दूर होने पर भी
साथ दिखते हैं।
४४ सिद्धान्त दर्पण
कुजेज्य शनयो यस्माद् दूरगा स्तद पेक्षयां
चक्रे स सूर्या दृश्यन्ते चक्रार्धे भिन्न दिश्यतः । १४ ।
रवि से पृथ्वी की तुलना में मंगल, वृहस्पति और शनि अधिक दूर होने के
कारण रवि से १२ राशि अन्तर पर रवि से मिले हुए दिखते हैं । तथा ६ राशि
अन्तर पर उल्टी दिशा में दिखते हैं ।
सूर्याद् भिन्न दिशोः स्थानं भूतारा ग्रहयोर्यदा
ऋज्वी गतिस्तदा तारा ग्रहस्य प्रेक्षते भुवि । १५ ।
रवि से एक दिशा में पृथ्वी और उसकी विपरीत दिशा में ताराग्रह (मंगल,
बुध, गुरु, शुक्र, शनि) कोई- हो तो उस ग्रह की सरल (मार्गी) गति दिखती है ।
यदै का दिगवस्थानं तयोर्भवति सूर्यतः ।
वक्रा गतिस्तदा तस्य मध्याशु गति भेदजा । १६ ।
यदि रवि से पृथ्वी और कोई तारा ग्रह एक ही दिशा में हो तो शीघ्र और
मध्यम गति के अन्तर के कारण उस ग्रह की उल्टी दिशा में गति (वक्रीगति)
दिखती है ।
मन्दापकर्षं हित्वा सदाकर्कात् समदूरगाः
यान्ति तारा ग्रहाः प्राचीं भचक्र मनुलक्षते । १७ ।
पांच तारा ग्रह हमेशा सूर्य से बराबर दूरी पर रह कर अपने मन्दोच्च और
शीघ्रोच्च रवि द्वारा आकर्षित हो उसकी पूर्व दिशा में परिक्रमा करते हैं । लेकिन
वे भचक्र में ही घूमते हुए देखे जाते हैं ।
भ चक्र मध्यगा भूमि भौमादिर्मध्यगा रविः ।
भार्क संगत सूत्रं तत् समंचक्रार्धचक्रयोः । १८ ।
पृथ्वी भचक्र (नक्षत्र गोल) के केन्द्र में तथा भौम आदि (पांच तारा ग्रहों)
केन्द्र में रवि है, अतः चक्र (१२ राशि ) और चक्रार्ध (६ राशि ) के बाद रवि
और नक्षत्र की गति का सूत्र (पृथ्वी से इनकी दिशा) अभिन्न हो जाती है ।
राशि त्रयान्ते भूसूत्र भार्कीगं चक्रितं यतः ।
तभेदः शीघ्रपरिधे रोजयुग्म पदान्तयोः । १९ ।
चक्र और चक्रार्ध से तीन राशि के बाद (ओज अर्थात् विषम पद में ) पृथ्वी
से नक्षत्र के विषम पदान्त का सूत्र और रवि से उसी पदान्त का सूत्र (रेखा) भिन्न
दिशा में होते हैं । अतः युग्म पदान्त और ओज की शीघ्र परिधि अलग होती है ।
क्ष्माक्रान्तर वियन्मानात् ख रसाग्नि (३६०) गुणाधिकः
भाना पन्थाहि दूरस्य स्तस्मिन्नर्क ,प्रथा हृते । २० ।
पृथ्वी और रवि के अन्तर योजन से पृथ्वी भकक्षा का अन्तर योजन ३६०
ग्रह स्फुटी करणम् ४५
गुणा होता है । भकक्षा में रवि कक्षा से भाग देने पर हार (३६०) होगा ।
फलं हरण मे तेन भगणांशा (३६०) विभाजिताः ।
लब्धोऽशः शीघ्रपरिधे योजयुग्मान्तरं गतः । २१ ।
इस हार में भगण अंश (३६०) से भाग देने पर जो १ अंश आता है वह विषम
(ओज) और युग्म पद का अन्तर है, यही शीघ्र की नीच और उच्च परिधिका अन्तर
होगा ।
कक्षा कथन कालेऽहं वक्ष्येपरिधि सम्भवम् ।
साक्षादनुभवादत्रा पेक्षा शास्त्रे निवर्तते । २२ ।
कक्षा के वर्णन में नीच और उच्च परिधि का अन्तर प्रत्यक्ष देखा जा सकता
है । अतः इस शास्त्र में अनुमान की आवश्यकता नहीं है ।
रव्यादेर्मन्द तुंगादा देवाये सन्ति दूरगाः ।
तद् वात रश्मि भिर्बद्धा ग्रहास्तै रूपकर्षिताः । २३ ।
रवि आदि ग्रह मन्दोच्च से दूर हों या निकट, वे अपने मन्दोच्च रूपी देवता
(अदृश्य विन्दु) द्वारा पवन रूपक रस्सी (अदृश्य या काल्पनिक दिशा) में आकर्षित
होते हैं . अतः (स्पष्ट) ग्रह हमेशा (मध्यम ग्रह से) उच्च की तरफ हटे रहते हैं ।
स्वादिसुखं तथा सन्नाः कृष्यन्ते बहुदूरगाः ।
स्वल्पत्वान् प्रवहः स्वांशैः पाशरूपैः प्रभञ्जनैः । २४ ।
अपने अपने उच्चो द्वारा आकर्षित ग्रह भी अपनी अल्प गति के अतिरिक्त प्रवह
पवन के पाशरूप आकर्षण में भी घूमते हैं . ( पूर्व में पश्चिम की तरफ । )
सूर्य सिद्धान्ते - स्वतुंगाभिमुखानेव प्रेरयत्य निशं दिवि
पूर्वापरापकृष्टास्ते गतिं यान्ति पृथग् विधाम् । २५ ।
अपने उच्च द्वारा दिन रात आकर्षित हो कभी पूर्व तथा कभी पश्चिम की तरफ
हटते हैं ।
ग्रहात् प्राग् भगणार्द्धस्थः प्राङ्मुखं कर्षति ग्रहम्
उच्च संज्ञोऽपरार्द्ध स्थ स्तद् वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् । २६ ।
.ग्रह से पूर्व वृत्तार्ध में उच्च रहने से उच्च ग्रह को पूर्व की तरफ आकर्षित
करता है । पश्चिम वृत्तार्द्ध में उच्च रहने से ग्रह पश्चिम की तरफ आंकर्षित होता
है । उच्च वृत्त की परिधि पर होने के कारण वह सभी बिन्दुओं से एक ही तरफ
है, लेकिन एक वृत्तार्द्ध में वह दिशा पूर्व और दूसरे वृत्तार्ध में पश्चिम कही जाती
है ।
स्वोच्चा पकृष्टा भगणैः प्राङ् मुखं यान्ति यद् ग्रहाः ।
तत्ते सुधन मित्युक्ति मृणं पश्चानु खेषुव । इति । २७ ।
अपने उच्च से आकृष्ट हो कर जब ग्रह सूर्य दिशा में जाते हैं । वह धन गति
४६ सिद्धान्त दर्पण
(योग) तथा पश्चिम दिशा की गति ऋणात्मक होती है । (सूर्य सिद्धान्त उद्धरण
समाप्त) ।
मन्दस्फुट महान् पाताश्चन्द्रादीन् याम्यसौम्ययोः
विक्षेपन्त्वेषु विक्षेपः स्वक्रान्त्यन्ता कलात्मकः । २८ ।
ग्रह कक्षा क्रान्ति वृत्त से कोण बनाती है, ग्रह बिम्ब से क्रान्ति वृत्त पर लम्ब
का मूल ही क्रान्ति पर ग्रह की स्पष्ट स्थिति है । लम्ब की दूरी को शर या विक्षेप
कहते हैं । ग्रह कक्षा और क्रान्ति वृत्त जिन दो विन्दुओँ पर मिलते हैं । (विक्षेप
शून्य होता है) उसे पात कहते हैं । ग्रह कथा का आधा भाग क्रान्तिवृत्त के उत्तर
और आधा दक्षिण होता है । अतः पात को उत्तर या दक्षिण विक्षेप का कारण
माना जाता है जो मन्दस्फुट ग्रह को उत्तर या दक्षिण की तरफ खींचता है । विक्षेप
को कला में नापा जाता है ।
सूर्यसिद्धान्ते-उत्तराभिमुखं पातो विक्षिपत्य परार्द्धगः ।
ग्रहं प्राग् भगणार्धस्थो याम्या यामपकर्षति । इति । २९ ।
ग्रह से पश्चिम (पीछे) १८० (अर्द्धवृत्त) में पात उत्तर की तरफ ग्रह को खींचता
है । तथा ग्रह के पूर्व (पहले) १८० कक्षा में पात दक्षिण दिशा में विक्षेप करता
है ।
पूर्वा पर गतः पातो बुध भार्गव शीघ्रयोः ।
पूर्ववद् विक्षिपत्येतौ न्यस्ते तच्छक्ति रुष्णगौ । ३० ।
बुध और शुक्र का भगण सूर्य भगण होता है । उनका शीघ्रोच्च ही बुध और
शुक्र हैं । अतः उनके पात शीघ्रोच्च से पूर्व १८० के अन्दर हों तो दक्षिण शर, नहीं
तो उत्तर शर होता है ।
स्वपात सम खेटस्य पात चक्रार्धगस्य च
विक्षेपो नौजपादान्ते परमोऽसौशराभिधः । ३१ ।
ग्रह और पात के बीच युग्म पादान्तर (एक साथ या १८०° अन्तर होने पर )
शर या विक्षेप नहीं होता है (ग्रह क्रान्ति वृत्त पर होता है), ओज (विषम पादान्तर
-९०° या २७०° अन्तर) रहने पर शर सर्वाधिक (परम) होता है ।
मध्येषु लिप्ता परमा विधोर्नव ख वह्नयः (३०९)
कुजस्य कुहरा (१११) ज्ञस्य कृतभूपा (१६४) बृहस्पते । ३२ ।
ग्रहों का मध्यम परमशर मान-चन्द्रमा ३०९ लिप्ता
मंगल १११ लिप्ता, बुध १६४ लिप्ता, (बृहस्पति का....)
गजाद्रये (७८)ऽथ शुक्रस्य वसुवेद निशाकराः (१४८)
शने र्गोमनव (१४९) स्तासां पश्चाद् वक्षे स्फुटीकृतिम् । ३३ ।
वृहस्पति का ७८ लिप्ता, शुक्र का १४८ लिप्ता, तथा शनि का १४९ लिप्ता
ग्रह स्फुटी करणम् ४७
है । स्फुट शर लाने का नियम कहा जाता है ।
भूलोक लोचन ग्राह्या भुक्तिः स्फुट गतिर्मता
सात्रिधा प्राग् गतिः पश्चाद् गतिः शून्येति भेदतः । ३४ ।
पृथ्वी की सतह से लोगों को ग्रह की जिस प्रकार गति दिखती है उसे स्फुट
गति कहते हैं । स्फुट गति तीन प्रकार की है आगे (प्राक् या मार्गी) गति, पीछे
(वक्री) गति तथा शून्य गति (गति का अभाव)
प्राग् गतिः पञ्चधा पश्चाद् गतिद्वैविध्यमागता
तृतीयैक विधेयत्वा भौमादि गतिरष्टधा । ३५ ।
आगे की गति पांच प्रकार की, पीछे की गति दो प्रकार की तथा शून्य गति
एक प्रकार की कुल आठ प्रकार की गति भौम आदि ग्रहों की होती है । (सूर्य
चन्द्र की वक्र गति नहीं होती)
सूर्य सिद्धान्ते-वक्रानुवक्रा विकला मन्दा मन्दतरा समा ।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा कथितेषा स्वनाम भिः । इति । ३६ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार इन आठ प्रकार की गतियों के नाम हैं- १. वक्र
२. अनुवक्र, ३. विकला, ४ मन्द, ५. मन्दतर, ६. सम, ७. शीघ्र, तथा ८. अतिशीघ्र ।
पश्चाद्रुति क्षीयमाणा वक्रेति गदिता बुधैः ।
वर्द्धमाना तु वक्रा सा तदन्ताद्येः क्रमेण या । ३७ ।
पीछे की गति समाप्त होते समय कम होने लगती है । उसे वक्र गति कहते
हैं । पीछे की गति आरम्भ होने पर बढ़ती है, उसे अनुवक्र गति कहते हैं ।
स्तम्भिता सैव विकला कला शून्यत्व हेतुतः
वक्रत्वाप्ति वियोगाभ्यां प्राक् पश्चादन्तवहं गतः । ३८ ।
वक्रगति आरम्भ होने से पहले तथा समाप्त होने पर ग्रह की गति शून्य होती
है, उसकी कोई कला नहीं होने के कारण विकला कहा जाता है ।
क्षीयमाणा वर्द्धमाना स्वल्पा मध्यगतेः क्रमात्
उक्ता मन्दतरा मन्दा मध्यतुल्याः गतिः समा । ३९ ।
. स्पष्ट गति मध्य गति से कम हो तथा घट रही हो तो उसे मन्दतर गति, बढ़
रही हो तो मन्द गति कहते हैं । स्पष्ट गति मध्यम गति के बराबर हो तो उसे सम
गति कहते हैं ।
मध्याधिका वर्द्धमाना क्षीयमाणा पुरो गतिः
भवेच्छिघ्रतरा शीघ्रा क्रमतश्चक्र सन्निधौ । ४० ।
स्पष्ट गति मध्यम गति से अधिक हो तथा बढ़ रही तो शीघ्र तर तथा घट
रही हो तो शीघ्र गति कहते हैं । ये गतियां सूर्य से १२ राशि दूर रहने पर होती
है ।
४८ सिद्धान्त दर्पण
रवीन्दोर्मन्दतुंगोत्था मन्दा मन्दतरा समा ।
शीघ्रा शीघ्रतरा भुक्तिः पूर्ववत् पञ्चधेतिसा । ४१ ।२०
रवि और चन्द्र की मन्दोच्च आकर्षण के कारण मन्द, मन्दतर, सम, शीघ्र और
शीघ्रतर ये पांच प्रकार की गतियां होती हैं, जिनका अर्थ पूर्ववत् है ।
सूर्य सिद्धान्ते-तत्तद्गति वशान्नित्यं यथा दृक् तुल्यतां ग्रहाः
प्रयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटी करण मादरात् । इति । ४२ ।
(सूर्य सिद्धान्त से) इन गतियों के कारण मध्यम ग्रह किस प्रकार देखे हुए
स्थान पर पहुंचते हैं (दृक् तुल्यता) उसे गणित द्वारा स्फुट ग्रह करने की विधि
आदर सहित बताता हूँ ।
आचार्यत्वं यया याति जगति ज्ञतया जनः
सतां हितायतां वच्मिज्या धनुष्कर्म पद्धतिम् । ४३ ।
अब मै ज्या और चाप गणना की विधि कहता हूँ जो कई विद्याओं में उपयोगी
है और जिसे जान कर लोग आचार्य पदवी प्राप्त करते हैं ।
ओत प्रोतै र्यथा वस्त्रं तन्तुभिः सन्ततं तथा
गोलः क्रमोत् क्रम ज्याभिः सन्दृब्धोऽयं समन्ततः । ४४ ।
वस्त्र जिस प्रकार धागे से ओतप्रोत से कर जड़ित होता है। उसी प्रकार गोल
भी क्रम ज्या से उसी प्रकार जड़ित होता है (किन्ही दो बिन्दुओं के बीच क्रमज्या
हो सकती है । इनकी अगणित संख्या है ।)
ज्यार्द्धाग्रे खेचरा मध्य सूत्रात् तिर्यक् स्थितायतः ।
ज्याद्धैः सकल कर्मेषां ज्यार्द्ध ज्येत्यत्र समन्ततः । ४५ ।
कक्षा में मध्य सूत्र (त्रिज्या ०° को) से ग्रह की तिर्यक स्थिति (कोण पर) की
ज्या निकालने के लिए मध्य सूत्र से ग्रह का और विपरीत दिशा का उतना ही
चाप की ज्या बनाते हैं । ग्रह ज्यार्द्ध के ऊपर होता है । ज्यार्द्ध से ही गणना (सहज
में) होती है । अतः उसी को ज्या भी कहते हैं ।
भचक्रे चक्र वालार्द्ध द्वय चापनिभं यतः ।
तद् व्यास रेखा मध्यस्था जीवारूपा तदुच्यते । ४६ ।
भचक्र रूपी वृत्त के दोनों आधे भाग चाप (धनु) की भाँति दीखते हैं । चक्र
को दो भाग में बांटने वाली केन्द्र से जाती हुयी रेखा को व्यास कहते हैं ।
त्र्यस्त्रयो गृहा ग्राह्या भुजकोटि तयायतः ।
तदो व्यास दलं त्रिज्या परमावृत्त मध्यतः । ४७ ।
तीन राशि (९०°) की ज्या और कोटिज्या का परममान होता है । तीन राशि
की ज्या व्यासार्द्ध के समान और केन्द्र से होकर जाती है । तब उसका सबसे
बड़ा मान होता है । कोटि का शून्य मान होता है (केन्द्र से ज्या की दूरी) ।
परिधेः षण्णवत्यंशः समोयस्मा न्नत स्ततः ।
राशि लिप्ता (१८००) ष्टमो भागः (२२५) प्रथमो ज्यार्धं उच्यते । ४८ ।
परिधि का १/९६ भाग सरल रेखा के समान होता है । अतः वह अपने ज्या
के बराबर (प्रायः) होगा । इसका कारण राशि लिप्ता (१८००) का १/८ भाग (जो
परिधि का १/९६ है ) २२५ प्रथम ज्यार्द्ध (या ज्या) के बराबर होता है ।
आद्य खण्डान्तरञ्चैतद् भक्तो ज्या पिण्ड आदिमः
लब्धोनमाद्यं द्वैतीय खण्डान्तर मिदं भवेत् । ४९ ।
पहली ज्या ही प्रथम खण्डान्तर है (०° की ज्या -० है) । द्वितीय खण्डान्तर
(पहली ज्या को दूसरी से घटाने पर फल) निकालने के लिए प्रथम खण्ड की
ज्या को उसी ज्या (पिण्ड) से भाग देकर लब्धि को ज्या पिण्ड से घटाते हैं ।
(२२५-२२५/२२५ ) यह फल (२२४) खण्डान्तर हुआ ।
तद्युक्तं प्रथमज्यार्धं द्वितीय ज्यार्द्ध मुच्यते ।
पुनराद्येन तद् भक्तं शेषः स्वाद्धीधिको यदि । ५० ।
द्वितीय खण्डान्तर को प्रथम ज्या में जोड़ने से द्वितीय ज्या (४४९) आता
है । पुनः इसको प्रथम खण्डान्तर से भाग देते हैं, शेष यदि अपने आधे से अधिक
(२२५/२ से अधिक) आता है ।
तल्लोपादेक युग् लब्धं कार्य मधौन एवलुक ।
द्वितीय खण्ड विवरं तल्लब्धोन तृतीयकम् । ५१ ।
तो शेष लोप कर देते हैं । (लब्धि में कुछ अन्तर नहीं ) इस लब्धि को द्वितीय
खण्डान्तर से घटाने पर तृतीय खण्डान्तर आता है ।
तद् युग द्वितीय जीवाद्धं तृतीय ज्यार्द्ध पिण्डकः
आद्यैनैवं क्रमात् पिण्डान् भक्ता लब्धोनिते युतैः । ५२ ।
तृतीय खण्डान्तर को द्वितीय जीवाद्धं में जोड़ने से तृतीय ज्यार्द्ध का पिण्ड
आता है । इस प्रकार क्रम से ज्या पिण्डों को प्रथम पिण्ड से भाग देकर खण्डान्त-
से घटाने पर अगला खण्डान्तर आता है, जिसे पिछले पिण्ड में जोड़कर अगल
पिण्ड आता है ।
चतुर्विंशति खण्डे स्युः क्रमज्या पिण्ड लिप्तिका
किन्तु ज्यापिण्डतः षष्ठात् सप्तमाद् द्वादशा दपि । ५३ ।
इस प्रकार क्रमानुसार १ से २४ ज्यापिण्ड (लिप्ताओं में) बनेगे किंतु ज्यापिण्ड
निकालते समय ६,७,१२....
एक विंशात् पञ्चद शाद् विंशात्सप्तदशा तथा
हार शेषांक लुक प्रोक्ता नारदीय स्वयम्भुवा । ५४ ।