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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

ग्रहानयन वर्णनम् ३१
सितस्य पातस्य धरा (१) ब्धि बाहवो (२४)
गुणा (३) निशानाथ गुणाश्च (३१) पुष्करम् (०)
शनेर्गुणाः (३ ) ख (०) त्रिभुवो (१३) ऽद्रिबाहवः
(२७) कृतेक्षणानि ( २४) ध्रुव एव पातजः । ६९ ।
शुक्र पात का करणाब्द ध्रुव रा. १।२४।२।३१।०।
शनि ,, ,, रा. ३।०.१३।२७।२४
इतीरिताः खेट तदुच्च पातजध्रुवा कृतैतद् भगणानुपातजाः ।
सुधांशुपातः स्फुट राहुरुच्यते तदीय भार्धं किल केतु रादिभिः । ७० ।
भगण के अनुपात से यह ध्रुव निकाले गये हैं । चन्द्रपात को राहु (उत्तर पात)
तथा उससे १८०° पर केतु पात विद्वान् लोग मानते हैं ।
मन्दोच्च पातानयनं दिनेभ्यं पुरोदितं तद् वदिदं समाभ्यः ।
अब्दास्तु तत्तद् भगणै र्विनिघ्ना लक्ष द्वयाप्ता फल मत्र लिप्ताः । ७१ ।
मन्दोच्च और पात अतीत दिवस में लाने की विधि कही जा चुकी है । वर्ष
सम्बन्धीय मन्दोच्च और पात निकालने के लिये वर्षा संख्या को कल्पभगण से
गुणा कर २,००,००० से भाग दें, लिप्ता आदि में वह गति का मान होगा ।
ध्रुवेषु युक्ता वियुताः क्रमेण स्फुटा ग्रहाणादय एव ते स्युः
किं वा सुखार्थं हरणैः स्वकीये र्नानेतु मर्हामृदुतुंग पाताः । ७२ ।
इस फल को करणाब्द ध्रुव में जोड़ने (पात में घटायें) अभीष्ट पात और उच्च
आयेगा । इसके बदले अपने अपने अनुपात से भी गति का मान निकाला जा
सकता है ।
मृदूच्च पातपर्ययैः ख खाभ्र खाभ्र पक्षका (२,००,०००)
हृताः फलानि हारकाः स्वकाः स्वकाः समात्मकाः । ७३ ।
कल्प भगण संख्या में २,००,००० से भाग देने पर हार आता है, गत वर्ष
संख्या से इसे गुणा करने पर कला आदि में इतने वर्ष की गति आती है ।
तदुद्धृताब्द वृन्दत कलादिभिः फलैर्ध्रुवाः
युतो निताः स्फुटाः क्रमान् मृदूच्चपातभादयः । ७४ ।
इस फल को पहले की तरह ध्रुव में जोड़ने (या पात में घटाने से ) उच्च ग्रह
और पात आयेगा ।
सुराराद्युच्चहारा नवनवकशरा (५९९) बाणवेदत्तं वो (६४५) ऽष्टा
ष्टाम्नाया (४८८) नागसिद्धा (२४८) नवशरशिखिनः (३५९)
सप्तपञ्चाष्ट पक्षाः (२८५७)
आरादेः पातहाराः क्षितिनगक्रतवः (६७१) पक्षषड् वीतिहोत्रा (३६२)