सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ सिद्धान्त दर्पण
धृत्याष्टक्ष्माश्च (१८१८) पक्ष क्षिति नयन मिताः (२९२)
सप्तषड् वह्नयः (३६७) स्युः । ७५ ।
इस प्रकार निकाले गये पात हार निम्न लिखित हैं-
रविमन्दोच्चहार ५९९
मंगल ,, ६४५ मंगल पात हार ६७१
बुध ,, ४८८ बुध ,, ३६२
बृहस्पति ,, २४८ वृहस्पति ,, १८१८
शुक्र ,, ३५९ शुक्र ,, २९२
शनि ,, २८५७ शनि ,, ३६७
प्राची प्रतीच्येः कुज सौम्य मन्द मन्दोच्च सञ्चार इहेष्यते यत् ।
तथाज्ञशीघ्रोच्च गतिश्च कार्या तत्संस्कृतः स्पष्ट खगाधिकारे । ७६ ।
मन्दोच्च और शीघ्रोच्च गति प्रायः पश्चिम से पूर्व की तरफ मानी जाती है ।
लेकिन ग्रन्थ कार के मत से मंगल, बुध और शनि के मन्दोच्च तथा बुध शीघ्रोच्च
की गति दोनों दिशाओं में होती है । इसकी चर्चा ग्रह स्फुट करने के योग्य समय
की जायेगी ।
प्राच्यं काञ्चन भूधरा सुरपुरी सम्पृक्त सूत्रायितु-
र्दन्तिक्षमा (१८४) मित योजनान्त मिलिते व्यक्षोत्तरस्यामपि ।
अब्धेरोधसि सिन्धु सिन्धुर भुजें (२८४) यो योजनै राजते
नित्यं शित्यवनी धरेन्द्र शिखरे तस्मै परस्मै नमः । ७७ ।
पाठान्तर (प्राच्यां काञ्चन भूधरा सुरपुरी सम्पृक्त सूत्रायितु
दन्तिक्षमा (१८४) मितयोजनान्त वसते व्यक्षोत्तरस्याम् द्यतात्
वेदाहीक्षण (२८४) योजनान्त जयतो देशस्य जिष्णोर्दिशि
भ्राजिष्णुर्विभुरुष्ण धृष्णि जनुषो भीष्मत्व मस्मद् गतिम् )
जो परमात्मा (जगन्नाथ) नीलाचल शिखर पर नित्य विराजमान हैं उनको
मेरा प्रणाम । नीलाचल (पुरी) भारतीय माध्यन्दिन रेखा से १८४ योजन पूर्व और
विषुव रेखा से २८४ योजन उत्तर समुद्र कूल में है ।
इत्युत्कलोज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत श्री चन्द्रशेखरकृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे यात स्तृतीय मध्य खगः प्रकाशः ।७८।
इस प्रकार उड़ीसा के उत्तम राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा दृग्गणितैक्य
और बालबोध के लिए रचित सिद्धान्त दर्पण में मध्यम ग्रह सम्बन्धी तृतीय अध्याय
समाप्त हुआ ।