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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३४ सिद्धान्त दर्पण
(स्फुट परिधि पर) समान अक्षांश वाले दो स्थानों के बीच की दूरी (पूर्व से
पश्चिम) को देशान्तर कहते हैं ।
तद्योजनैः षष्टि (६०) हतैः स्फुट भू वेष्टनोद्धतैः
अथवा विषुवत्कर्ण लिप्तिका भिश्च ताड़ितै । ७ ।
इस देशान्तर योजन को ६० से गुणा कर स्पष्ट भूपरिधि योजन से भाग देने
पर, अथवा देशान्तर योजन को पल कर्ण से गुणा कर ....
मनु रामाभ्रषड् (६०३१४) भक्तैः स्युर्देशान्तर नाड़िकाः ।
रेखायाः पूर्व देशेषु निशार्द्धों परि योजिताः । ८ ।
...(६०३१४) से भाग देने पर दण्ड आदि देशान्तर समय आता है । रेखा के
पूर्व देशों में अपने देश की अर्द्धरात्रि में जोड़ने से....
पश्चिमेषूनिता वारा मासाब्दैश प्रवृत्तयः ।
लंकार्ध रात्रतां यत्तत् प्रवृत्तिं सर्वदेशके । ९ ।
या पश्चिम के स्थानों में घटाने से लंका की अर्ध रात्रि का समय आता है
क्योंकि दिन, मास और वर्ष आदि का प्रारम्भ लंका की अर्धरात्रि से ही सभी देशों
में होता है ।
वदन्ति केचिदा चार्या लंकाकोंदय कालतः
वार प्रवृत्ति मत्रेयं व्यवस्था क्रियते मया । १० ।
कुछ आचार्य लंका के सूर्योदय काल से बार आदि का आरम्भ मानते हैं ।
सन्देह दूर करने के लिए इस सम्बन्ध में मेरा निर्णय है-
वारे यस्मिन्नुदेत्यर्कः स्वदेशे समयात्ततः ।
तदीशितुरहोरात्रे बलाधिकं प्रवर्त्तते । ११ ।
जहां पर जिस समय सूर्योदय हो वहाँ सूर्योदय से ६० दण्ड तक उसी
वाराधिपति का अधिक बल होता है ।
दिवा रात्रौ यथा भागं याम यामार्धजं बलम्
गृह्यते क्वापि देशेषु न तत्सि द्धान्त सम्मतम् । १२ ।
कई देशों में याम और या मार्द्ध का भी बल कहा जाता है । (पर यह फलित
का विचार है) । इससे सिद्धान्त का कोई सम्पर्क नहीं है ।
यदाह भास्करः सर्व्वारम्भो लंकोदयादिति ।
तदुक्ता हर्गणानां हि संख्या सिद्धान्ततः पृथक् । १३ ।
भास्कराचार्य ग्रहगति आदि का आरम्भ लंका के सूर्योदय से मानते हैं अतः
उनका अहर्गण अन्य सिद्धान्तों से अलग है ।
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