सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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के कारण यह संस्कार होता है ।
संस्कृत सायनांशाद्यै र्मध्यमस्य विवस्वतः
लग्न भुक्तासवोऽतीत मेषादि प्राण संयुताः । ३४ ।
मध्यम रवि को सायन कर (अयनांश जोड़कर), उसकी राशि के बीते हुए
अंशों के निरक्ष देशीय भुक्त असु में मेष से आरम्भ कर पिछली राशियों के असु
(प्रत्येक राशि के १८०० असु) मिलायें ।
निरक्ष देशजायेस्यु र्यंश्च मध्यम भास्वतः
चलांश संस्कृत स्यैव लिप्तास्तद् विवराहताः । ३५ ।
तब सायन रवि की मेषादि भोग्य निकालेंगे और दोनों फलों का अन्तर करें ।
सूर्यादि मध्य चन्द्रोच्च पात शुक्रज्ञ शीघ्र जा ।
गति लिप्ता हता गोऽग्नि भूप दृग् भिः (२१६५९) कलात्मकम् । ३६ ।
अन्तर को ग्रह की गति लिप्ता से गुणा कर (२१,६५९) से भाग दें- लब्धि
उदयान्तर फल होगा ।
फलं तत्सूर्य युग्मैज पदयोः सुमृणं क्रमात्
(पाठान्तर-अत्रतत्सूर्य पदेनायनांश सूर्योव्यज्यतैः)
कार्यं मध्य ग्रहाद्येषु किं वा प्रोक्तं चरादिकम् । ३७ ।
सायन मध्यम रवि सम पद में रहने से उदयान्तर फल ग्रह में जोड़ा जायगा,
विषमपाद में रहने पर घटायेंगे । उच्च और पात में इसके विपरीत होगा ।
संस्कार त्रितयंस्पष्ट क्रियानिष्पत्यनन्तरम् ।
कर्तव्यं कृतिभिः स्व स्व स्फुट भुक्ति भिरेवतत् । ३८ ।
(चर, भुजान्तर और उदयान्तर) तीन संस्कार मध्य ग्रह में न कर स्पष्ट ग्रह में
भी किये जा सकते हैं ।
तदामध्येषु शीघ्रेषु मन्दोच्चे ऽपि न तत्क्रिया ।
कार्यास्फुट ग्रहेषे वयत्तेतैः प्राक् परिष्कृताः । ३९ ।
स्फुट ग्रह में यह संस्कार करने के समय मन्दोच्च चन्द्रोच्च और शीघ्रोच्च में यह
संस्कार पुनः नहीं किये जाते क्योंकि स्पष्ट ग्रह करते समय ये संस्कार हो जाते
है ।
यद्यर्क दोः फलं लग्न संस्कृतं तर्ह मध्यमात्
चलांश संस्कृतात् सूर्यात् साध्यं तदुदयान्तरम् । ४० ।
भुजान्तर करते समय यदि रवि के मन्दफल का असु लिया जाता है । तो
सायन मध्यम रवि से उदयान्तर संस्कार किया जाता है ।