सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 132, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंनानाविध संस्कार वर्णन ३५
भिन्नत्वेऽपि यदिदानीं तदानीता र्यमादय
दृक् सम अभिविष्यं यस्तद्ग्रहीष्यत तन्मतम् । १४ ।
इस भिन्न अहर्गण को भी स्वीकार किया जा सकता है। यदि उसके द्वारा
साधित ग्रह प्रत्यक्ष वहीं पर दिखाई दे।
ग्रहाणां स्वस्व गतयो देशान्तर घटी हताः
षष्ट् याप्ता स्तत् फलं प्राच्या मृणं पश्चाद् घनं ग्रहे । १५ ।
लंका अर्ध रात्रि के ग्रह को अपने देश की अर्ध रात्रि का ग्रह बनाने के लिये
ग्रह की दैनिक गति को देशान्तर घटी से गुणा कर ६० से भाग देते हैं। तथा
लब्धि को जोड़ते (लंका से पश्चिम स्थानों के लिए) या घटाते (पूर्व के स्थानों के
लिए) है।
किं वा तद्गतयः क्षुण्णाः स्वदेशान्तर योजनैः
स्फुट भूमिं परिध्याप्ताः संस्कारा मध्यमेषुताः । १६ ।
अथवा, दैनिक गति को देशान्तर योजन गुणा कर स्फुट भूपरिधि से भाग देने
से भी देशान्तर गति आती है। इसी भी पहले के समान जोड़ते या घटाते हैं।
समये सम्भवेद् यत्र सर्व ग्रस्त विधुग्रहः
तदा संसाधिते तस्मिन् मध्यरेखामधिष्ठिते । १७ ।
(देशान्तर निकालने की विधि) - गणना द्वारा मध्य रेखा के स्थान पर होने
वाले किसी पूर्ण ग्रास चन्द्र ग्रहण का साधन करें।
स्वसमानाक्षके देशे तदुन्मीलन कालतः
एष्यद् गत समालोक्य स्वदेशो न्मिलनं क्रमात् । १८ ।
अपने स्थान में उसी पूर्ण ग्रह का समय देखें। ग्रहण के स्पर्श, पूर्ण ग्रास या
उन्मीलन से भी यह विचार हो सकता है।
प्राक् पश्चिम गतं बुद्ध्वा स्वस्थान मध्य सूत्रतः ।
तयोरन्तर नाड़ीभिर्हन्या भूपरिधिं स्फुटम् । १९।
यदि गणना काल से पहले ग्रहण होता है तो अपना स्थान मध्य रेखा (सूत्र)
से पश्चिम है (पीछे होने पर पूर्व)। इन दोनों का अन्तर देशान्तर काल हुआ।
इसके दण्ड आदि को स्पष्ट भूपरिधि से गुणाकर-
षष्ट्या विभज्य लब्धानि योजनान्यव गच्छतु ।
किं वा निमीलनात् साध्यं मानं देशान्तरस्य च । २० ।
(६०) से भाग दे, देशान्तर का योजन आदि आता है। निमीलन काल से
भी इसी प्रकार होता है।