सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते-इष्ट नाड़ि हता भुक्तिः षष्ट्या भक्ता कलादिकम् ।
गते शोध्यं युतं गम्ये कृत्वा तात्कालिको भवेत् । इति । २१ ।
(सूर्य सिद्धान्त से उद्धृत) किसी समय का (तात्कालिक) ग्रह लाने के लिए
दैनिक ग्रह गति (कलादि) में इष्ट समय (अर्ध रात्रि के बाद उस समय का दण्ड
आदि) से गुणा करते हैं । तथा ६० (६० दण्ड का दिन ) से भाग देते हैं । लब्ध
कला आदि को मध्य रात्रि ग्रह में जोड़ने से इष्ट काल का ग्रह आता है ।
दिनानां गणना यस्मात् सूर्योदय इष्यते
तत्तस्तात्कालिकेषु विधेय चर संस्कृति । २२ ।
चर संस्कार -इस प्रकार देशान्तर स्कार करने से लंका का सूर्योदय कालिक
ग्रह अपने स्थान के निरक्षोदय (अपनी माध्यन्दिन या देशान्तर रेखा का विषुव
वृत्त पर सूर्योदय) काल का ग्रह होगा । लंका और अपने स्थान के बीच अक्षांश
दूरी· (उत्तरं दिक्षण दिशा में दूरी) के कारण चर संस्कार की आवश्यकता है (क्योंकि
सूर्योदय का समय दूसरा होगा ।
स्फुटार्कापक्रमनिता देश कालोत्थिता स्वकाः ।
चरनाड्यः स्वभुक्तिघ्न्यः षष्ठि भक्ताः फलं ग्रहे । २३० ।
उदय कालिक स्फुट सूर्य की क्रान्ति से चर दण्ड निकाल कर उसे ग्रह की
दैनिक गति से गुणा कर ६० से भाग देते हैं ।
धनर्णं क्रमशॊ भानौ दक्षिणोत्तर गोलगे ।
अस्त कालिकं खेटेषु वैपरीत्येन संस्कृतः । २४ ।
सूर्य दक्षिण-अयन (सायन तुला से मीन) में रहने पर फल (चर संस्कार को
जोड़ते हैं, उत्तरायण (मेष से कन्या) में रहने पर उदयकालिक ग्रह से इसे घटाते
हैं । अस्तकालिक ग्रह के लिए उल्टा करते हैं (उत्तरायण सूर्य के लिए चर संस्कार
जोड़ते हैं । अन्यथा घटाते हैं ।
गताब्दे स्फुट सूर्यस्य यत्रांशे यदभूच्चरम् ।
तत्तत्र वर्तमानाब्दे ग्राह्यां मध्यार्यमादिषु । २५ ।
स्फुट सूर्य पिछले वर्ष अंश में रहने पर जितना चर दण्ड था इस वर्ष मध्यम
रवि का उतने ही अंश पर उसी के बराबर चरदण्ड होगा (बहुत कम अन्तर
होगा) ।
रविमान्द्यफलव्यक्ष लग्न माना यनांशकैः
वंक्षमाणैः क्रिया मन्यां वच्मि मध्य ग्रहोचिताम् । २६ ।
रवि के मन्दफल, निरक्ष लग्नमान और अयनांश आदि द्वारा और एक मध्य
ग्रह संस्कार की क्रिया कहता हूँ ।