सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनानाविध संस्कार वर्णन ३७
अर्द्धरात्रान्मध्यभानोः स्फुटार्कस्य निशादलम् ।
भिन्नं यद्युज्यते तस्मात् तद् भुजान्तर संस्कृति । २७ ।
मध्य रवि के अनुसार जब अर्द्ध रात्रि होनी चाहिये, स्फुट (वास्तविक) रवि
के अनुसार उससे भिन्न समय में अर्द्ध रात्रि होती है । अतः स्फुट अर्धरात्रि का
ग्रह लाने के लिए मध्य और स्फुट रवि के बीच भुजफल संस्कार किया जाता
है ।
चलांश संस्कृतादित क्रान्त्यराश्युदयासुभिः
निरक्ष देशजै र्निघ्ना रवि दोः फल लिप्ति काः । २८ ।
अयन संस्कृत (अयनांश जोड़कर) रवि के मन्द भुजफल को रवि की राशि
के उदय असु (उस राशि के विषुव रेखा के उदय काल प्राण) से गुणा करें
अष्टादश शतै (१८००) राप्ताः स्व स्व भुक्ति भिराहताः
मध्यार्क सावन दिन प्राणे राप्ता कलादयः । २९ ।
फल लिप्ता को (१८००) से भाग दें । फल को ग्रह की दैनिक गति से गुणा
कर मध्यम रवि सावन दिन के असु ((२१,६५९) से भाग दें तो कलादि भुजान्तर
संस्कार होगा ।
स्वमृणं सूर्य फलवत् कार्याः सूर्यादि खेचरे ।
शीघ्रेन्दुच्चेषुराहौतु व्यस्ताः संस्कृतयोऽखिलाः । ३० ।
इस भुजान्तर को ग्रह में रवि के मन्दफल की तरह जोड़ते हैं या घटाते हैं ।
लेकिन शीघ्र फल से भुजान्तर संस्कार करने पर या चन्द्र के मन्दोच्च या राहु के
भुजान्तर में उल्टा होगा ।
अल्पान्तरत्वादथवा रवि बाहु फलाहता
भुक्तिर्भचक्र कलिका (२१६००) भक्ता लिप्तादि तत्फलम् । ३१ ।
अथवा, (भुजान्तर करने के लिए) रवि के मन्दभुजफल को ग्रह की दैनिक
गति से गुणा कर (२१,६००) से भाग देने से लिप्ता आदि में फल होगा ।
किं वा भक्ताश्चक्रलिप्ता, (२१,६००) गत्याच्छेदस्तु तत्फलम् ।
तेनार्क दोः फलं भक्तं प्राग्व ल्लिप्तादि संस्कृतः । ३२ ।
अथवा (२१,६००) को ग्रह की दैनिक गति से भाग दें, लब्धि से रवि के
मन्दभुज फल में भाग दें ।
भुजान्तराक्ष कर्मोक्त मुद्यान्तर मुच्यते
क्रान्तिज्यार्क क्वहाल्पत्व भूमौत्थ फल कारणम् । ३३ । *
भुजान्तर संस्कार करने के बाद उद्यान्तर की विधि कही जाती है । क्रान्ति
वृत्तीय रवि और नाड़ी वृत्तीय (विषुव रेखा ) रवि (उभय मध्यम) के बीच अन्तर