सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
१२४ सिद्धान्त दर्पण
किस लग्न का कितना उत्कल (मध्य) में बीतता है यह लिखा जा रहा है ।
(२२) श्रवण-मेष ९४ पल, (२३) घनिष्ठा-मेष-२३० पल (२४) शतभिषा
वृष- २८० पल
प्राग् भाद्रे (२५) ऽब्धि दृशो (२४) ब्रजन्ति मिथुनात्
तस्माद् अहिर्बुध्न्यमे (२६) वेदाद्रिक्षतयो (१७४)ऽथ
कर्कटतनोः पौष्णे (२७) नवाम्भोधयः । (४९)
अश्विन्या (१) स्वरवासवा (१८७)
श्रयममे (२) ऽङ्गार्थ शिवनो (२५६) आग्निमे (३)
सिंहा दद्रि रसा (६७) स्वरघना (१७७)
श्चन्द्रो (१) स्त्रियालोचने (२) । ९० ।
भाद्र पद- मिथुन १७४ पल (२७) रेवती कर्क ४९ पल (१) अश्विनी कर्क
(१८७) पल (२) भरणी-कर्क २५६ पल (३) कृत्तिका सिंह ६७ पल (४)
रोहिणी-सिंह (१७७) पल (५) मृगशिरा-कन्या २ पल
रौद्रे (६) ऽस्याः करिमार्गणा (५८) अदितिभे (
त्रिप्रश्नाधिकारः १२५
यत् प्रश्नोत्तर विस्तरेण गणितं दिग्देश कालास्मये
तद् व्याख्या सहितं यतोऽस्ति हि मयातत् प्रोज्झि वाग् गौरवात् । ९३ ।
भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में इस त्रिप्रश्नाधिकार में बहुत प्रकार से
भुज, कोटि, कर्ण द्वारा अनेक प्रकार की घटनाओं का वर्णन किया है तथा प्रश्नोत्तर
द्वारा अनेक सन्देहों का निराकरण किया है । यह सब वासना भाष्य सहित सिद्धान्त
शिरोमणि में रहने के कारण मैं इस ग्रन्थ में विस्तार भय से पुनः नहीं लिखा रहा
हूँ ।
सिद्धान्त्यचयादलम्भि मय कायो यो विशेषो दृशा
तुल्यस्तल्लिखितं मदिष्ट मिहतत् तत्सांगता सिद्धये
सर्वग्रन्थ कृति र्वभूव गणिते गोलान्विते हृद्गते
क्षेत्राणा मुपपत्तयो हि सुलभा स्तत् किं वचो विस्तरैः । ९४ ।
अन्य ग्रन्थों की तुलना में जिन विषयों पर मेरा स्वतन्त्र विचार है । और जिन
घटनाओं (ग्रह स्थिति) को मैंने अपनी आंखों से देखा है, इस प्रकार के अनेक
विषयों की इस ग्रन्थ में विशेष चर्चा की गयी हैं । हृदय में गोल तथा गणित का
दृढ़ ज्ञान होने से ग्रन्थ आसानी से समझा जा सकता है, और गणित आदि नियमों
की उपपत्ति (प्रमाण) कठिन नहीं होगी। अतः उपपत्ति आदि लिखकर ग्रन्थ का
कलेवर बढ़ाना मैंने आवश्यक नहीं समझा ।
यत्राष्टाब्धि कलाढ्य नन्दकु (१९।४८) लवेरक्षः समक्षीकृतौ
व्यक्षात् सार्ध रसैर्क्ष कैः (२७६।३०) ख खं भुजै (२००) भूमध्य रेखांकतः
सिद्धं योजनकैः स्वदेश विवरं तत्रासिता दौशल-
ल्लोलेला कमला विलास्यल मलं कुर्यान् मदीयं मनः । ९५ ।
उत्तर अक्षांश (१९।४८) अर्थात् विषुवत् रेखा से (२७६ १/२) योजन उत्तर
तथा भारतीय मध्य रेखा से (२००) योजन पूर्व देशान्तर पर स्थित नीलाचल पर्वत
(पुरी) में चञ्चल नेत्र और हास्य वाली लक्ष्मी जी के साथ क्रीड़ा करते हुए श्री
जगन्नाथ मेरा मनोरथ पूर्ण करें ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृते गणिते ऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
त्रिप्रश्नवान् मुनिमतः शमितः प्रकाशः । ९६ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्रशेखर द्वारा गणना
तथा दृश्य में समता के लिए तथा बालबोध के लिखे सिद्धान्त दर्पण में तीन प्रश्नों
के मुनिमत से विचार सहित सातवां प्रकाश समाप्त हुआ है ।
अष्टमः प्रकाशः
चन्द्र ग्रहण वर्णनम्
स्मार्त्ताः सांहितिकाः पुराणनिपुणा स्तन्तेक्षका वैदिकाः
स्नानाङ्गा जाप मोह दान कृतिनां यस्मिन्ननन्तं फलम् ।
प्रा चुर्येश्च महाचमत्कृति करो लोकस्य तिथ्यादिके
विश्वासावह मिन्दु तिग्म महसो र्वक्ष्याम्यहं तं ग्रहम् । १ ।
ग्रहण के समय स्नान, जप होम और दानादि से अनन्त फल होता है। ऐसा
वैदिक तान्त्रिक, व पौराणिक, संहिताकार तथा स्मार्त लोगों का मत है। ग्रहण
की शुद्धता के कारण लोग चमत्कृत होते हैं, तथा तिथियों पर विश्वास करते
हैं। अतः इसके महत्व के कारण अब मैं ग्रहण (चन्द्र और सूर्य) का वर्णन करता
हूँ।
पक्षान्त साधित विपात विधोर्भुजांशा
विश्वा (१३) ल्पका यदितदा ग्रहसम्भवोऽस्य
तस्माद् विधौ शिखितमोन्यतरान्तिकस्थे
चिन्त्यो ग्रहेऽग्निकु (१३) लवा वधि पूर्णिमान्ते । २ ।
पूर्णिमान्त में चन्द्र राहु या चन्द्र केतु का साधन कर चन्द्र से राहु या चन्द्र से
केतु का अन्तर करें। इस चन्द्र (अन्तर) का भुजांश १३ से कम होने पर चन्द्र ग्रहण
की सम्भावना रहती है। अर्थात् पूर्णिमान्त चन्द्र का राहु या केतु से १३ अंश से
कम अन्तर होने पर ही चन्द्रग्रहण हो सकता है।
सूर्य ग्रहे धृति (१८) लवान्त समान्त जेऽङ्गे
ग्रस्तो मतोऽन्तिक वशात् शिखिनाच गुणिते
प्रत्यक् पुरोनत गुणांश (३) युतो न सूक्ष्म ।
दर्शान्त कालिक सुधाकर दिक् शरस्य । ३ ।
इसी प्रकार अमान्त (अमावस्या के अन्त ) में चन्द्र और चन्द्रपात का साधन
कर चन्द्रमा से पात (राहु या केतु) का अन्तर १८ अंश से कम होने पर सूर्य ग्रहण
की सम्भावना रहती है।
(पृथ्वी केन्द्र से) अमान्त निकालते हैं। इस अमान्त काल के चन्द्रमा की
पश्चिम नत नाड़ी का १/३ अमान्त काल से घटाने पर इस संस्कृत दर्शान्त काल में
पुनः स्फुट चन्द्र का साधन करते हैं।
तत्काल वित्रिभ तनूनत बाहुजीवा
षष्ठ्यंश कस्य च युते र्वियुते च शेषात्
दिक् साम्य भेद धनुषः क्रमशः स्फुटेषौ
न्युने कृताग्नित (३४) इन ग्रह सम्भवः स्यात् । ४ ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १२७
पुनः दर्शान्त काल का वित्त्रिभ (दशम) लग्न निकालते हैं। उसकी नतज्या
का १/६० कर इस स्फुट चन्द्र (दर्शान्त काल के) में जोड़ते हैं, जब चन्द्र और
नत एक दिशाओं में हो, या भिन्न दिशा में होने पर घटाते हैं। इसका परिमाण
भी ३४ से कम होने पर सूर्य ग्रहण की सम्भावना रहती हैं।
तत्क्वापि याम्यनति भूरितयोत्तरक्षौ
सार्द्धांशिके (१।३०) ऽपिस भवेदपि निःशरत्वे
न क्वाप्यथो नयन मण्डलगेऽपवर्ते
स स्याद् विपात शशिदोष्ण नगांश (७) तोऽल्पे । ५ ।
(इति ग्रहण सम्भवः) कभी कभी याम्य नति (याम्योत्तर वृत्त में नति) उत्तर
(१° ३०') अंश से कम हो तो सूर्य ग्रहण हो सकता है। जब दृग्वृत्र क्रान्ति वृत्त
होता है। तब चन्द्र से उसके पात (राहु या केतु) के अन्तर का भुजांश ७ अंश
से कम होने पर भी सूर्य ग्रहण हो सकता है।
पर्वान्त संस्कृति रवीन्दु शमीकृतीन
भू भा विधू प्रमिति बाणपि धान कालैः
स लम्ब नावति दिग् वलनां गुलाद्यै
शास्त्रान्तरादिह विशेष मवेत सन्तः । ६ ।
अन्य सिद्धान्तो से भिन्न विधि से इस ग्रन्थ में स्फुट अमान्त के लिए लम्बन
संस्कार, रवि और चन्द्र का राशि तथा अंशादि समीकरण, सूर्य, चन्द्र और छाया
का परिमाण, चन्द्र का ग्रास परिमाण, स्थिति, विमर्द आदि काल, वास्तव स्फुट
लम्बन, स्फुट नति, दिग्वलन और परिलेख आदि का वर्णन हुआ है। यह उपयोगी
होने के कारण इसे विद्वान लोग गलत न समझें।
राका मयो स्ववसिति प्रभवोद्यमध्ये
सिद्धे विधौ तपन भार्द्ध दिवाकराभ्याम्
न्यूनेऽधिकेऽन्तरपराः प्रथमेन्दु सूर्य
भुक्त्यन्तरे विहृता विघटी फलेन । ७ ।
अमान्त और पूर्णान्त समय निकाल कर उस समय चन्द्र और रवि स्फुट करेंगे
(पर्व के कारण चन्द्रमा में केवल मन्द फल संस्कार होगा) चन्द्र राशि से सूर्य
राशि का अन्तर (अमान्त में) तथा पूर्णान्त समय में सूर्य राशि में ६ राशि जोड़कर
अन्तर निकालेंगे। अन्तर राशि अंश आदि की परा (१/६० विकला) बनाकर उसमें
चन्द्र और सूर्य की गति का अन्तर (कला में) से भाग देंगे) फल पल (विघटी)
आदि होगा।
तिथ्यन्त्य आढ्य वियुतः सम पर्वकालः
स्तात्कालिकार्क भदलञ्च रविश्च सूक्ष्मः ।
· १२८ सिद्धान्त दर्पण
वेद्भूः शशी समकला विवितौ भवेतां
किञ्चोच्यते क्वचन पर्वणि तद्विशेषः । ८ ।
इस चल आदि समय को चन्द्र सूर्य से कम होने पर पर्वान्त समय में जोड़ेंगे
तथा ६ राशि युक्त रवि से अधिक होने पर घटायेंगे । तब पर्वान्त (दर्शान्त या
पूर्णान्त) समय स्फुट होगा । इस समय में पुनः चन्द्र और रवि को स्फुट किया
जायेगा तथा फिर उसके अनुसार पर्वान्त रवि चन्द्र स्फुट होगा । बार बार स्फुट
करने पर जब चन्द्र और सूर्य की कला (पूर्णिमा में सूर्य में ६ राशि जोड़कर)
समान हो जाय तब शुद्ध पर्वान्त निकलेगा । इसके बाद ही ग्रहण के लिए अन्य
साधन होगा ।
सूर्यस्य दोर्गति फलो उदयान्तरञ्च
यद्येकदा त्रितयमे तदृणं धनं स्यात् ।
तत्रोदयान्तर भुजान्तर के सुधांशो-
र्भास्वत् गतेः फलयुते र्विकला स्ततस्ताः । ९ ।
एक ही समय सूर्य का मन्दफल, गतिफल तथा उदयान्तर फल तीनों धन
या ऋण होने पर चन्द्र के उदयान्तर और भुजान्तर फल के योग से सूर्य गति फल
की विकला को जोड़ेंगे ।
शीतांशुदोः फल कला गुणिता विभक्ता
स्तद् व्यास योजन चयेन (४४४) च पूर्णिमायांन्
दर्शेंहतास्तु रवि योजनकै (७२,०००) र्विलिप्ता
लब्धाश्च ताः पुनरिनेन्दु गतान्तराप्ताः । १० ।
इस योगफल को चन्द्रमा के मन्द फल कला से गुणा करेंगे । पूर्णिमा के
समय इस गुणन फल में चन्द्रमा के बिम्ब व्यास योजन (४४४) से भाग देंगे ।
अमावास्था में गुणन फल में रवि बिम्ब व्यास योजन से भाग देकर विकला आदि
लब्धि निकालेंगे । इस विकला फल को सूक्ष्म रवि और चन्द्रमा के गति अन्तर
से भाग देगें ।
दण्डादि कै रिह फलैः समपर्व युक्ति-
मूनं पुरोदित फल त्रितयर्णतायाम् ।
स्व त्वेमाद् भवति दृक् सममत्रकार्या
सूर्याब्धयोः समकलोकृति रुक्त पूर्वा । ११ ।
लब्धि दण्ड आदि फल को सम पर्व काल होने पर पूर्व काल से घटायेंगे
और ऋण होने पर (मन्दफल, उदयान्तर और गतिफल तीनों ऋण होने पर) पर्व
काल में जोड़ेंगे) इससे दृक् सम पर्व काल होगा। समपर्वकाल और दृक् सम
पर्वकाल के अन्तर में सूर्य और चन्द्रमा की गति निकाल कर दृक् सम पर्व काल
का रवि और चन्द्र स्फुट होगा ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १२९
द्विसप्तति सहस्र (७२,०००) योजनामितार्क बिम्बायति
महापुरुष वाच्योत्यनुजगा वथर्वा श्रुतिः ।
मथैवदनुसारतो नयनगोचरक्षं ग्रह
प्रमाण परिधिग्रहादि क मकशमलं कल्प्यते । १२ ।
अथर्व वेद में ॐ (महापुरुष) का अर्थ निरूपण के प्रसंग में सूर्य बिम्ब का
व्यास (७२,०००) योजन कहा है । इस उक्ति के आधार पर मैने वेध और गणना
कर अन्य ग्रहों का बिम्बमान, ग्रहों की परिधि तथा ग्रहण में पृथ्वी और छाया
आदि का परिणाम शुद्ध रूप से निकाला है ।
विवस्वद् विष्कम्भद्विरस विधु (१६२) भागः समुदितो
विधोर्बिम्ब व्यासः कृत कृत चतुर्योजन (४४४) मित
भुवं प्राङ् निर्दिए (१६००) स च सवितुरर्धाम्बुधि (४५) लवो
लवो ऽन्तरीक्षे वक्ष्येऽहं श्रवण मथ भानो शशभृतः । १३ ।
चन्द्र व्यास = ७२,००० / १६२ = ४४४ से कुछ अधिक योजन
पृथ्वी व्यास = ७२,००० / ४५ = १६०० योजन
पृथ्वी का व्यास १६०० योजन प्राचीन ज्योतिषियों ने भी माना है ।
अब मैं इन व्यासों का आकाश में कलात्मक मान कहता हूँ ।
भू मध्यात् स्वदला वधि ग्रह पतेः कर्णारूय मार्गश्रुतु-
र्नन्द द्विद्विप्रपूर्ण तर्क धरणीभृद् (७६,०८,२९४) योजनो मध्यमः
शीताशोः शर पुष्कर क्षिति धर स्तम्बेरमा म्भोध्यो (४८,७०५)
मध्यस्य श्रुति योजनान्य पतयोः स्पष्टा भवेन्मन्दजा । १४ ।
पृथ्वी केन्द्र से सूर्य केन्द्र की मध्यम दूरी (७६,०८,२९४) योजन (सूर्य कर्ण),
तथा पृथ्वी केन्द्र से चन्द्र केन्द्र की मध्यम दूरी (४८,७०५) योजन (चन्द्र कर्ण)
है । इससे मन्द स्पष्ट कर्ण भीनिकाला जा सकता है ।
भास्वन्मण्डल योजनाभि (७२,०००) गुण मुपक्षाक्षि (२२१३) भक्तानते
दिग्व्यास कला (३२।३२) भवन्ति सवितुर्मध्य निशास्वामि नः ।
तान्येवर्तु (६) पञ्चकरिभि (८५) र्भक्तानि चन्मण्डल-
व्यास स्थायिकला (३१।२०) भवन्ति धरणी छाया कलाश्चन्द्र वत् । १५ ।
सूर्य का मध्य कोणीय बिम्ब = ७२,००० / २२१३ = ३२।३२।६ कला आदि
चन्द्रमा का मध्यम कोणीय बिम्ब = ४४४ x ६ / ८५ = ३१।२० कला
चन्द्र बिम्ब की कला की तरह भू छाया की बिम्ब कला भी निकलेगी (६।८५)
१३० सिद्धान्त दर्पण
से गुणा कर) क्यों कि चन्द्र ग्रहण के समय उसकी स्थिति चन्द्र गोल पर होती
है ।
मन्द कोटि फल युक्त दुनिता
नक्र कर्कि मुखमन्द केन्द्र के ।
त्रिज्यका भवति संस्कृता तया
वर्जिता द्विगुणित त्रिमौर्विका (६८७६) । १६ ।
(सूर्य या चन्द्र का ) मन्द केन्द्र मकर आदि ६ राशि में रहने पर त्रिज्या में
मन्द कोटिफल जोड़ेंगे । तथा कर्क आदि ६ राशि में रहने पर घटायेंगे । प्राप्त फल
को त्रिज्या को दो गुणा (६८७६) से घटा कर-
शेष केण बिहता त्रिभज्यका
वर्गः (११८,१९,८४४) फल कलात्मकः स्फुटः
मन्दकर्ण इन चन्द्रमाः क्षिते-
र्मध्यतोऽन्य स सदा रवे र्भवेत् । १७ ।
शेष से त्रिज्या के वर्ग में भाग देंगे । फल लिप्तादि रवि और चन्द्र का स्फुट
मन्द कर्ण होगा । इस विधि से यदि मंगल आदि ग्रहों का मन्द कर्ण निकाला
जाय तो वह सूर्य केन्द्र से उन ग्रहों की केन्द्रिक दूरी होगी ।
मन्द कर्ण हत योजना श्रुतिस्त्रि ज्या किल हृता भवेद् स्फुटः
मध्य कर्णहत बिम्ब लिप्तिका स्पष्ट कर्ण विहृताः परिस्फुटाः । १८ ।
कलात्मक स्फुट मन्द कर्ण को मध्य योजन कर्ण से गुणा कर त्रिज्या से भाग
देने पर वह योजनात्मक स्फुट मन्दकर्ण होगा । मध्यम बिम्ब कला को मध्य योजन
से गुणा कर स्फुट योजन से भाग देने पर स्फुट बिम्ब कला होगी ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मन्द श्रुतिर्द्राक् श्रुतिवत् प्रसाध्या
तया त्रिभज्या द्विगुणा विहीना (६८७६) त्रिज्याकृतिः
(१,१८ ,१९,८४४) शेष हृतास्फुटास्या लिप्ता श्रुतिस्तिग्म रुचे र्विधाश्च । १९ ।
(सिद्धान्त शिरोमणि से उद् धृत) शीघ्र कर्ण की तरह मन्द कर्ण निकालें ।
त्रिज्या के २ गुणा से उसे घटाकर शेष से त्रिज्या के वर्ग में भाग दें ।
कलात्मक फल चन्द्र या सूर्य का मन्द कर्ण होगा । यह भूकेन्द्र से सूर्य या
चन्द्र की दूरी का मान है (कला में) ।
लिप्ता श्रुतिघ्न स्त्रिगुणेन भक्तः
स्पष्टो भवेद् योजन कर्णएवम्
बिम्ब रवे द्विं द्विशरर्तु (६५२२) संख्या
नीन्दोः ख नागाम्बुधि (४८०) योजनानि । इति । २० ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३१
स्फुट योजन कर्ण = $\frac{पलात्मक कर्ण x मध्य योजन कर्ण}{त्रिज्या}$
सूर्य बिम्ब (६५२२) योजन तथा चन्द्र बिम्ब (४८०) योजन है (भास्कराचार्य
के मत से, इस ग्रन्थ के अनुसार नहीं )
भास्करोक्त मृदु कर्ण साधनं यद्यपि स्फुटतमं तथाप्यहंम्
प्राहकोटिफलं तो भुजान्त बिम्बमध्य समतार्थ मेव हि । २१ ।
भास्करा चार्य मत से भी स्फुट कर्ण का साधन सूक्ष्म मान देता है । तथापि
मैंने कोटिफल से स्फुट कर्ण का साधन किया है । क्योंकि मन्दोच्च और स्फुट ग्रह
तीन राशि होने पर कोटि और मन्दस्फुट कर्ण समान होते हैं ।
मध्यमार्क शशि बिम्बजाः कलाः
सूक्ष्मतत् प्रथम भुक्ति ताड़िताः ।
मध्यभुक्ति (५९/८-७९०।३५) विहृताः स्वमण्डल
द्वन्द्व विस्तृतिरदः फलानिवा । २२ ।
मध्यम रवि और चन्द्र बिम्ब कला को उनकी दैनिक सूक्ष्मकला से गुणा कर
उनकी दैनिक मध्यम गति से भाग देने पर क्रमानुसार रवि और चन्द्र की स्पष्ट
बिम्बकला आयेगी ।
किं वा बिम्बा स्त्रिगुणा (३४३८) गुणिता योजनै स्वैर्भिंनानां
स्वश्रुत्याप्ताः स्फुटतरकला भानु भू भा विधूताम्
यद्वा भास्वद् गतिफल ख रुद्रांश युक्तो (११०) नितास्तु
मध्याः (३२।३२) स्पष्टाः स्युरिन कलिकाः कर्कि नक्रादि केन्द्रे । २३ ।
अथवा योजनात्मक बिम्ब व्यास की त्रिज्या से गुणा कर स्पष्ट कर्ण योजना
से भाग देने पर रवि, चन्द्र या भू भा (पृथ्वी की छाया) बिम्ब व्यास का कलात्मक
स्फुट मान आयेगा ।
सूर्य का कलात्मक स्फुट बिम्ब व्यास
= $\frac{मध्य बिम्बकलाव्यास + सूर्य गतिफल}{११०}$
मध्यकेन्द्र २ य तथा ३ य पाद में रहने पर योग (गतिफल का) या प्रथम
और ४र्थ पाद में रहने पर घटाव होगा ।
मध्यं मानं (३१।२०) गद्विफलं कला पञ्चविंशां शकस्य
त्यागाद् योगात् स्फुट विधु मिटर्नक्र कर्क्यादिके स्यात्
रुद्रा (११) घ्नीवा स्फुट रवि गतिः खाक्षि भक्तार्कमान
सप्तोनेन्दु स्फुट गतिकला स्तत्व (२५) भक्ता स्वमानम् । २४ ।
१३२ सिद्धान्त दर्पण
इसी प्रकार स्पष्ट चन्द्र बिम्ब व्यास की कला
मध्य चन्द्र व्यास कला ± चन्द्रगति फल
= -------------------------------------------
२५
सूर्य चन्द्र का स्पष्ट बिम्ब कला के लिए एक और सूत्र है-
दैनिक स्पष्ट रवि गति x ११
स्पष्ट रवि बिम्ब व्यास कला = ------------------------------
२२
दैनिक स्पष्ट चन्द्र गति -७
स्पष्ट चन्द्र बिम्ब व्यास कला = ----------------------------
२५
भूव्यास (१६००) निघ्नः स्फुट सूर्य कर्णे
भूव्यास हीनार्क तन (७०,४००) विभक्तः
फलंतदामूल शिखान्त दैर्घ्यं सुचो
निभायाः पृथिवी प्रभायाः । २५ ।
पृथ्वी सूच्याकार छाया, की लम्बाई स्पष्ट सूर्य कर्ण x भू व्यास
(पृथ्वी केन्द्र से) = ----------------------------
सूर्य व्यास - भूव्यास
सिद्धान्त शिरोमणौ-भूव्यास हीनं रवि
बिम्ब मिन्दु कर्णाहतं भास्कर कर्णभक्तन्
भू विस्तृति लब्ध फलेन हीना भवेत्
कुमाविस्तृति रिन्दुमार्गे । २६ । इति
चन्द्र गोल (कक्षा) में भूभाव्यास
(रवि व्यास - भूव्यास) चन्द्रव्यास
= भू छाया - -------------------------------
रवि व्यास
तन्मानलिप्ताः शशिवत् प्रसाध्याः किं
वानागांशः (७) शशि भृद् गतैर्यः
सोऽष्टाद्रि (७८) निघ्नेषुमनु (१४५)
धृतार्क गत्यूनितः स्यात्तमसः प्रमाणम् । २७ ।
चन्द्रमा की तरह भूछाया व्यास का भी (चन्द्र कला में ) कलात्मक मान
निकाला जाता है । (क्योंकि चन्द्र कला में ही चन्द्र ग्रहण के समय इसका उपयोग
है ) ।
भू भांव्यास (चन्द्र कक्षा में ) कला
दैनिक चन्द्र स्पष्ट गति दैनिक स्पष्ट रवि गति x ७८
= ------------------------ - ------------------------------
७ १४५
भू भा विधुं चन्द्र इनं विधते यदा तदैव ग्रहणं भयोः स्यात् ।
पातारूय राहोर्रुज सन्ति कर्णात् तस्या सुर ग्रास इति प्रशस्तिः । २८ ।
पृथ्वी छाया में चन्द्रमा का बिम्ब आने पर चन्द्र ग्रहण तथा चन्द्रबिम्ब द्वारा
सूर्य ढकने के कारण सूर्य ग्रहण होता है । सूर्य, चन्द्र तथा भू भा (पृथ्वी की
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३३
छाया) का चन्द्रपात के निकट रहने के समय ही ग्रहण होने के कारण राहु (चन्द्रपात
का नाम) असुर द्वारा ग्रास होने की कथा प्रसिद्ध है ।
सिद्धान्तशिरोमणै-दिग्देश काला वरणादि भेदान्नच्छादकोराहुरिति ब्रवन्ति ।
यन्मानितः केवल गोल विज्ञा तत्संहिता वेद पुराण बाह्यम् । २९ ।
सिद्धान्तशिरोमणि में भी भास्कर ने लिखा है कि यदि एक ही राहु द्वारा ग्रास
होता तो ग्रहण में दिग् भेद (कभी पूर्व, कभी पश्चिम में), काल भेद (कम या
अधिक समय के लिए) तथा ग्रास भेद (पूर्ण या खण्ड ग्रहण) कैसे होता है ?
अत रांहु ग्रास द्वारा ग्रहण मानने वाले केवल अपने गोल ज्ञान का अभिमान करते
हैं । वस्तुतः वे मूढ और वेद, संहिता तथा पुराण के विरोधी हैं ।
राहुः कुभामण्डलगः शशांकं शशांक गच्छादयतीन बिम्बम्
तमोमयः शम्भुवर प्रदानात् सर्वागमा नाम विरुद्ध मेतत् । इति । ३० ।
राहु अन्धकार (छाया) मय है वह पृथ्वी छाया मण्डल में प्रवेश कर चन्द्रमा
को ग्रास करता है । फिर चन्द्र में प्रवेश कर सूर्य को ढंकता है । इस प्रकार ग्रास
करने के लिए ही सूर्य ने उसे ऐसा वर दिया है । इस प्रकार का समाधान शास्त्र
विरोधी नहीं है। (उद्धरण समाप्त)
प्रभाभुवो भ्राम्यति भानु भार्द्धे तद्
गर्भमप्रे यदि शुभ्र भानुः
जम्बद् विषद् भिङ् मुख एति वेगात्
तत् तद् ग्रहः सा तप बिम्ब लोपात् । ३१ ।
सूर्य के कारण पृथ्वी की छाया सूर्य से विपरीत दिशा में होती है । यह भी
क्रान्तिवृत्त में पूर्व दिशा में घूमती हैं । पूर्णिमान्त में जब चन्द्र भी सूर्य से विपरीत
दिशा में (६ राशि अन्तर पर) होता है, तब उसकी गति छाया की गति से अधिक
होने के कारण वह छाया में प्रवेश कर उसे पार कर जाता है । छाया में प्रवेश
करने पर चन्द्रमा की किरण (प्रकाश) का लोप होता है । इस कारण चन्द्र ग्रहण
होता है ।
भू भानु मध्ये यदि शीतभानु र्गच्छन् रविं छादयति प्रतीज्या -
भास्वद् ग्रहस्तद्वितीयस्य पूर्व यानेऽपि शुभ्रांशु गते र्महत्वात् । ३२ ।
अमान्त के समय जब पृथ्वी से चन्द्र और सूर्य एक ही दिशा में (एक राशि
में) होते हैं । तब चन्द्रमा पूर्व दिशा में बढ़ते हुए सूर्य को ढंग लेता है । तथा
गति अधिक होने के कारण फिर सूर्य बिम्ब से आगे (पूर्व दिशा में ) निकल
जाता है । सूर्य अत्यन्त प्रकाश मान होने के कारण लोग उसे नहीं देख पाते हैं
सूर्य को ढंकते समय प्रकाश हीन चन्द्रमा को ही देखते हैं ।
१३४ सिद्धान्त दर्पण
कुजादि पातेषु यथा तुरीय फलस्य वाच्यो धन हीन भावः
तथा दिगंशारुय फलेन राहुः सूक्ष्मः स्फुट स्सूर्य शशीव कार्यः । ३३ ।
मंगल आदि तारा ग्रहों के पात में जिस प्रकार चतुर्थफल जोड़ा या घटाया
जाता है उसी प्रकार राहु के दिगंश फल को भी जोड़ने या घटाते हैं । दिगंशफल
चन्द्रमा में जिस प्रकार संस्कार किया जाता है । उसी प्रकार राहु का दिगंश फल
भी निकाला जाता है तथा संस्कार होता है ।
पातोन तात्कालिक चन्द्र दोर्ज्या स्वाष्टाग्नि (३८) भागेन युताद्धिंतात ।
चापीकृता षड् विहता फलं स्यात् कलादिकं स्पष्ट शरं सुधांशो । ३४ ।
स्फुट पर्वान्त कालिक चन्द्र निकाल कर उससे चन्द्र स्फुट पात घटाते हैं ।
फल की भुजज्या निकालते हैं । यह विक्षेप केन्द्र ज्या है । इसमें उसका १/३०
भाग जोड़ते हैं । फल को आधा कर उसका चाप निकालते हैं । इस चाप को ६
से भाग देने पर चन्द्र का कलादि स्पष्ट शर निकलता है ।
विपातचन्द्रस्य षषट्क आद्ये सौम्ये द्वितीये सच दक्षिणः स्यात् ।
क्षिति प्रभारोपण तो विलोम श्चन्द्र ग्रहे दिक शर एव वेद्यः । ३५ ।
पात हीन चन्द्र मेष आदि ६ राशि में रहने पर चन्द्र शर उत्तर दिशा में होता
है, पात हीन चन्द्र तुलादि ६ राशि में हनि पर चन्द्र शर दक्षिण दिशा में होता
है । ग्रहण परिखेख के समय इस शर को भू स्थान में उल्टे तरफ दिया जाता है ।
चापं बिना कोटिफलं तथास्य युत्याहतं पात शशांक गत्योः
त्रिज्याहतं बाणगति स्फुटा स्यात् तत् संस्कृतेः क्रान्ति गतेः स्फुटत्वम् । ३६ ।
(शर की अन्य विधि) चाप करने के बदले, शर के कोटिफल को चन्द्र और
उसके पात की गति योग से गुणा करते हैं । गुणन फल को त्रिज्या से भाग देने
पर शर (चन्द्र शर) की स्फुट गति होगी । इस गति में क्रान्ति गति का संस्कार
करने से वह स्फुट शर गति होगी ।
लेख्यं विपातेन्दु भुजाब्धि पक्ष (२४)
खण्डै शरांशादि सहान्तरं वा
कोटिफलं तद् गति योग निघ्नान्तरं
गतिस्तत्व यमा (२२५)प्ता मिष्या । ३७ ।
चन्द्र से चन्द्र पात घटाकर उसका भुज निकालेंगे । उस भुजांश से शर आदि
निकाला जा सकता है । इसके लिए ९० अंश के वृत्त पाद से ज्या निकालने की
तरह २४ ज्या (भुजज्या) कर प्रत्येक खण्ड का शर, शरान्तर, कोटिफल भुजफल
आदि निकालना परिशिष्ट के विक्षेप खण्ड में दिया गया है ।
उस विपात भुजांश से शर आदि निकालना सुविधा जनक है । यह सब
२२५ कला के अन्तर पर दिया हुआ है ।
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३५
यद्वा विपादेन्दु भुजोत्थ लिप्ता नृपां (१६) श हीना गिरिशै (११) र्विभक्ताः ।
फलं शरः पात विहीन चन्द्रः बाहोर्गृहाद्धार्द्ध वधि कल्पनीयः । ३८ ।
अथवा चन्द्र से पात घटाकर उसेक भुज की कला बनायेंगे । उसमें उसका
१/१६ जोड़कर ११ से भाग देंगे । फल शर होगा । इस प्रकार शर विपात चन्द्र का
१५ अंश तक भुजांश होने पर निकाला जा सकता है । भुजाश ज्यादा होने पर
इस विधि से भूल होगी ।
छाद्य छादक मान योगय दलतो न्यूनः शर श्चेत्तदा
ग्रासः स्यान्न शरेऽधिके स्फुटतरे तन्मान यो गार्द्धतः ।
प्रोज्झ्ये षष्ठ शरंच शिष्ट कलिकाच्छन्ना भवन्त्येव ता-
श्छायाद्याद्य धिका स्तदैव सकल ग्रासोऽम्बर व्यापकः । ३९ ।
ग्राह्य (छात्र) और ग्राहक (छादक) बिम्ब मान जोड़कर उसके आधा से शर
कम होने पर ग्रास होता है । शर इस से ज्यादा होने पर ग्रहण नहीं होता है ।
बिम्ब योग का आधा से शर घटाने पर जो शेष है वही ग्रास होता है । ग्रास का
मान ग्राह्य (छाद्य) से अधिक होने पर पूर्ण ग्रास होता है । ग्रास से ग्राह्य घटाने
पर जो बचता है, उतना आकाश का ग्रास होता है ।
स्पर्शश्चन्द्रमसः पुरोदिशि रखेः पश्चाद् मिवोक्षो न्यदिक-
प्रायः स्यान्न निमीलनं हि सकलं ग्राह्या पिधान क्षणः
तत्रोन्मीलन मेव किञ्चि दुदिते स्वच्छादकान्मण्डले
तन्मध्ये दृग्गोचरांश्रु रुदितो ग्रासो विमर्दाभिधे । ४० ।
चन्द्र ग्रहण का स्पर्श प्रायः पूर्व दिशा में तथा मोक्ष प्रायः पश्चिम दिशा में
होता है इस नियम से गणना होती है । लेकिन सूर्यग्रहण प्रायः पश्चिम दिशा में
स्पर्श तथा पूर्व दिशा में मोक्ष की गणना की जाती है । पूर्व पश्चिम गणना के
बदले कभी कभी दक्षिण उत्तर की भी गणना होती है । अतः पूर्व पश्चिम के साथ
प्रायः शब्द का प्रयोग हुआ है ।
जिस समय ग्राहक बिम्ब ग्राह्य बिम्ब को ढंग कर रखता है उसे निमीलन
समय कहते हैं । ग्राह्य बिम्ब ग्राहक बिम्ब से बाहर निकलने के समय को उन्मीलन
समय कहते हैं । निमीलन से उन्मीलन तक का समय मर्द काल कहते हैं । कोई
कोई इसे विमर्द काल भी कहते हैं ।
पर्वान्तः समलिप्ति केन्द्र रवि जो भार्द्धे च चक्रे क्रमा
चान्द्रस्य ग्रहणस्य मध्य समय सौरस्य सल्लंबनः
मानैक्यार्द्ध कृतेः स्फुटाशुगकृतिं प्रोज्झ्यावशेषात्पदं
षष्ठ्या सं गुणितं दिनेश शशिनोः सूक्ष्म स्व भुक्त्यन्तरा । ४१ ।
रवि और चन्द्र की राशि, अंश और कला तक समान होने पर जो पर्वान्त
निकलता है । उसी को सम पर्वान्त (अमान्त या पूर्णान्त) कहते हैं । इस अवस्था
१३६ सिद्धान्त दर्पण
(समकाल) में चन्द्र और सूर्य का अन्तर ६ राशि होने पर चन्द्र ग्रहण का मध्य
काल होता है ।
ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब मान को जोड़कर उसके आधे के वर्ग को स्फुट शर
के वर्ग से घटाते हैं और शेष का मूल निकालते हैं । उसको ६० से गुणा कर
सूक्ष्म चन्द्र और रवि की गति के अन्तर से (भाग देते हैं)
भक्त तत्फल नाड़िकाः सपलका स्थित्यर्द्धजा मध्यमा
ग्राह्य प्रोज्झित मान योग दलत, स्वाध्या वियुक्तादिषोः ।
कृत्य शेषपदात् पुरेवघटिका मध्या विमर्दार्द्धजाः
पर्वान्तः स्थिति मर्दखण्ड वियुतस्तद् युक् क्रमा दुत्क्रमात् । ४२ ।
भागफल ग्रहण स्थिति का आधा समय (नाड़ी में ) होता है । इसका दो
गुणा करने पर ग्रहण का पूर्ण समय आता है ।
इसी प्रकार ग्राह्य और ग्राहक बिम्ब का अन्तर कर उसके आधे के वर्ग को
उस समय के शर वर्ग से घटाते हैं । अब शेष का मूल निकाल कर उसमें ६०
से गुणा कर उसमें चन्द्र और सूर्य के गति अन्तर से भाग देते हैं । फल विमर्द
आधे का घटी आदि होता है । इसको दो में गुणा करने पर मर्द काल आता है ।
समपर्वान्त काल में स्थित्यर्द्ध तथा मर्दार्द्ध काल घंटाने पर क्रमशः स्पर्श और
निमीलन का समय आता है ।
मध्ये स्पर्श निमीलने च भवति श्रोन्मीलने न्मोक्षकौ
तत्तकालिक पात सूक्ष्म शशिजे बाणैः पुनः साधिताः ।
स्पर्शाद्या असकृत् क्रिया स्थिरतराः स्पष्टास्यु रिन्दो रवे -
स्वेते स्व स्व विलम्बनैः सह परिस्पष्टाः मुहुः संस्कृताः । ४३ ।
समपर्वान्त काल में स्थिति अर्ध तथा मर्दार्ध जोड़ने से मोक्ष तथा उन्मीलन
समय आता है । इस मोक्ष तथा उन्मीलन आदि समय में पात और सूक्ष्म चन्द्र
साधन कर उससे शर निकाल कर पुनः स्पर्श मोक्ष आदि समय निकालना चाहिये ।
इस प्रकार ग्रहण का स्थिरतर मान आता है । सूर्यग्रहण में स्फुट स्पर्श आदि काल
आने पर उसमें बार बार लम्बन संस्कार कर स्पष्ट समय निकाला जाता है ।
वक्ष्याम्यत्र विशेष मीश (११) गुणितं मध्य ग्रहेषोर्दलम्
सूर्येन्द्वन्त्य गत्यन्तरोद्धतमिषौ स्याद् वर्द्धमाने फलम्
नाड् याद्यं वियुतं युतं त्वितरथा पर्वण्यतः तत् स्फुटं
तुत्कालेन्दु शरा द्य पर्व शरयो रन्तर्विलिप्ता कृते । ४४ ।
बार बार संस्कार की जरूरत नहीं पड़े ऐसी विधि, अब मैं बताता हूँ । समपर्व
काल का शर निकाल कर उसके आधे को चन्द्र और रवि को गति के अंतर से
भाग दें । लब्धि दण्ड आदि को समपर्व काल शर से घटाते हैं, यदि बढ़ रहा
हो, अन्यथा जोड़ते हैं । इससे पर्व स्पष्ट होगा । इस पर्व काल से फिर पात, सूक्ष्म
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३७
चन्द्र तथा उससे शर निकालेंगे। इस शर और समपर्वकालिक शर के अन्तर का
विकला का वर्गकर
अर्द्धान् मूल मिहादि पर्व शरतः संशोध्य शेषः स्फुटः
स्याद् बाण स्तत आगते स्थिति दले स्यानां समेविस्फुटे
ग्रासो दृक् समता मुपैतित ततः स्पर्शादयःस्युः सकृत्
पश्चाद् या कथमिष्यते धरणीभा सा दृक् समा गृह्यताम् । ४५ ।
उसका आधा करते हैं और वर्ग मूल निकालते हैं। इस मूल को समपर्व
कालीन शर से घटाने पर स्फुट शर होता है। इससे पहले की तरह स्थिति काल
निकालते हैं। इस शर से जो ग्रास आदि का समय आता है वह दृक् सिद्ध होता
है। इस शर से स्पर्श आदि समय एक ही बार में स्फुट हो जाते हैं। अब जो
भूछाया कही जा रही है वह दृक् सिद्ध छाया है। (पहले की भूछाया स्थूल थी।)
अथेष्ट कालाद् ग्रसनं प्रमाणं ग्रासाद भीष्टात्समयं प्रवक्षे ।
पूर्वत्रभागे ग्रहणेष्ट नाड़ी स्थित्यर्द्धतः प्रोज्भ्य ततोऽवशिष्टैः । ४६ ।
अब इष्ट काल से ग्रास तथा ग्रास को देख कर समय निकालने की विधि
कही जाती है। मध्य ग्रहण से पूर्व का समय होने से उसको स्पर्श स्थिति अर्द्ध
से घटाते हैं।
दण्डैर्निहन्याद् ग्रहकाल हारं षष्ट्यां भजेत्कोटिकलाविधोः स्युः
भानोर्ग्रहे कोटि कलाश्च मध्य स्थित्यर्द्ध निघ्ना स्फुट लम्बनोत्थैः । ४७ ।
शेष दण्ड आदि को ग्रहकाल हार (सूर्य ग्रहण में ग्रह काल का हार वर्णित
है) से गुणा कर ६० से भाग दें। यह चन्द्र ग्रहण में कोटि कला होगी। सूर्य
ग्रहण में इसको पुनः मध्य स्थिति अर्द्ध से गुणा कर स्फुट स्थिति अर्द्ध से भाग
देने पर स्फुट कोटि कला आती है।
स्थित्यर्द्धदण्डै र्विहताः स्फुटाः स्युः तत्काल विक्षेप कला भुजोऽत्रे
दोः कोटि वर्गैक्य पदञ्च कर्णस्तदून मानैक्य दलं पिधानम् । ४८ ।
उस समय के शर के भुज की कला बनायेंगे। कोटि और भुजकला के वर्ग
का योग कर उसका वर्ग मूल निकालें। यह कर्ण होगा। उसे बिम्ब मान योग
के आधे से घटाने पर ग्रास मान निकलेगा।
भागे परस्मिन् ग्रहणस्य मोक्ष स्थित्यर्द्धतः स्वेष्ट घटी विशोध्या
शेषो रवीन्दु स्फुट सूक्ष्म भुक्त्यन्त राहतः षष्ठिहतः सकोटिः । ४९ ।
मध्य ग्रहण के बाद मोक्ष स्थिति अर्द्ध में यदि इष्ट काल लिया जाय तो मोक्ष
स्थिति अर्द्ध से इस इष्ट काल को घटा कर रवि और चन्द्र के सूक्ष्म गति अन्तर
से गुणा कर ६० से भाग देने पर कोटि होगा।
:
स् + थ + ि = स्थि
त = त
त् + य = त्य
र् + ध = र्ध
Yes, it literally has an extra 'त': "स्थितत्यर्ध"!
And look at "सन्ताड़ित":
स + न् + त + ा + ड़/द? + ि + त
It has 'ड़' with a dot: "सन्ताड़ित" or "सन्ताडित"?
It looks like "सन्ताड़ित" (or सन्ताडित, in modern Hindi fonts ड़/ड). In Devanagari: "सन्ताड़ित".
Let's check Line 16:
"मध्य स्थितार्द्धेन हताः स्फुटाः स्युः षष्ट्या हताः कोटि कलारवेन्दोः । ५२ ।"
Look at "स्थितार्द्धेन":
स् + थ + ि + त + ा + र् + द्ध + े + न = स्थितार्द्धेन.
Yes!
"कलारवेन्दोः" - कला-रवेन्दोः.
Let's check Line 20:
"भुक्त्यन्तराप्ता फल नाड़िकाभिः स्थित्यर्द्धमूनं सद धीष्ट नाड्यः."
Wait, look at "सद धीष्ट":
स + द (sad) space ध + ी + ष + ् + ट (dhīṣṭa) -> "सद धीष्ट" or "यदभीष्ट"?
Wait!
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३९
सूर्य ग्रहण में वलन (संशोधन) कला के बारे में कहता हूँ । इन दोनों प्रभावों के
कारण आकाश के पूर्व पश्चिम कपाल (क्षितिज के ऊपर आकाश गोलार्द्ध के
याम्योत्तर वृत्त द्वारा दो भाग) में ग्रहण के स्पर्श, मध्य और मोक्ष की दिशा का
ज्ञान होता है ।
चलांश संस्कार वदर्क चन्द्रयोः स्वकोटि
लिप्ता खमहीन्द्र (१४१०) ताड़िताः ।
खखाब्धि बाणै (५४००) विहृता स्ततः
फलं कलात्मकं स्याद्वलनं स्वमायनम् । ५६ ।
चन्द्र ग्रहण में अयन संस्कृत चन्द्र और सूर्य ग्रहण में अयन संस्कृत सूर्य की
कोटि कला को परम क्रान्ति (१४१०) से गुणा कर तीन राशि की कला (५४००)
से भाग देने प्राप्त फल कला आयन वलन होता है । जिस दिशा (पूर्व या पश्चिम
कपाल) में यह ग्रहण होता है । उसी दिशा में यह वलन होता है ।
हिमांश भान्वोः स्वदिनार्द्धतोनतं पलात्मकं खांक (९०) हतं दिनार्द्धजै
निजैः पलै र्भाजितमंश कादिकं नतः पुरः पश्चिमजं दिनार्द्धयोः । ५७ ।
(सूर्य ग्रहण में रवि और चन्द्र समान होने के कारण केवल चन्द्र द्वारा दोनों
ग्रहों का आयन वलन निकाला जा सकता है ।)
चन्द्र ग्रहण में चन्द्र दिनार्द्ध से नत और सूर्य ग्रहण में सूर्य दिनार्द्ध से नत
निकाल कर उसका पल बनायेंगे । उसको ९० से गुणा कर अपने अपने दिनार्द्ध
पल से भाग देने पर अंशादि फल आता है । यह पूर्व पश्चिम दिनार्द्ध के अनुसार
पूर्व या पश्चिम दिशा में नत होगा ।
निजाक्ष भागा गत भाग ताड़िता नवत्य (९०) वाप्ताः फलमेष सम्भवम्
पुरो नतेस्याद् वलनं तदन्तरं गते च पश्चाजनितेहि दक्षिणम् । ५८ ।
इस नत को अपने देश के अक्षांश से गुणा कर ९० से भाग देकर जो फल
आयेगा वह पूर्वनत में उत्तर और पश्चिम नत में दक्षिण अक्ष वलन होगा ।
तयोः पलोत्थायनयोः समांशयोर्युते वियोगात्तु विभिन्नकोष्ठयोः ।
स्वकं भवे दिग्वलनांशकादिकं तदंगुलाज्यं परिलेख इष्यते । ५९ ।
अक्ष और आयन वलन दोनों एक दिशा में होने पर योग और भिन्न दिशा
में होने पर अन्तर किया जाता है । फल चन्द्रग्रहण में चन्द्र का और सूर्य ग्रहण
का सूर्य का अंशादि दिग्वलन होगा । यह स्पष्ट वलन हुआ । स्पर्श, मोक्ष, आदि
किस दिशा से किस प्रकार होगा । इससे मालूम होगा । इसका अंगुल आदि
मान परिलेख में कहा गया है ।
सुरोदितं सूर्य दिनं विधूदया स्तयोस्तु मध्ये दिनमस्य सम्मतम् ।
दिनान्त सिद्धावयनांश संस्कृतौ विधायभास्वच्छशि नौ तु दृक्षयोः । ६० ।
१४० सिद्धान्त दर्पण
सूर्य का दिन परिणाम कहा जा चुका है । चन्द्रम के उदय से उसके अस्त
तक का समय चन्द्र दिन होता है । सूर्य के दिनान्त में रवि और चन्द्रस्फुट कर
उसमें अयनांश जोड़ते हैं । रवि और चन्द्र की अपनी अपनी शशि के
रवे भुक्ताः शशिनो गता लवा निजोदयाघ्नाः खगुणे (३०) हृता फले
तदन्तरो त्थास्त नवश्वषट् शरा (५६) सवश्व युक्ता घटिका ऽह्वये । ६१ ।
रवि का भाग्यांश तथा चन्द्रमा भुक्त अंश उन राशियों के उदयासु से गुणा
कर ३० से भाग देंगे । जो दो उदयासु आयेंगे उनमे रवि राशि से चन्द्रमा की
राशि के बीच की राशियों के उदयासु जोड़ेंगे । योगफल में ५६ असु जोड़कर
३६० से भाग देकर घटिका बनायेंगे ।
दिनादिवस्तत्र भवेद् विधूदय पदद्युर र्कोदय कालिकौ स्तया
विधाय सूर्यस्य सषड्भ शीतगो समेग्रह भुक्त लवोदयन्तरम् । ६२ ।
सूर्योदय से इतनी घटिका के बाद चन्द्रमा का उदय होगा । चन्द्र अस्त काल
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४१
याम्यायनान्त हरति ध्रुवतो यदेव
स्थानं दलोन कृत बाहु (२३।३०) तवान्तरस्थम् ।
तत्प्रोदितं ध्रुव कदम्ब इति ग्रहाणां
क्रान्ते स्तदुत्तर दिशो निरचापि चिह्नम् । ६६ ।
उत्तर की ध्रुव से दक्षिण अयन को तरफ अयन प्रोत वृत्त (वृहद् वृत्त जो
क्रान्ति वृत्त के सबसे दक्षिणी विन्दु तक जाता है ) पर (२३° ३०') दक्षिण की
तरफ ग्रहों का (क्रान्ति वृत्त जिसमें ग्रह घूमते हैं) ध्रुव कदम्ब होता है । यह क्रान्ति
वृत्त का उत्त दिशा में पृष्ठ केन्द्र है ।
तद् व्यस्त दिग् विनिहितो समदिक् कदम्ब
स्तर्क्यः कदम्ब दनुजादिशिखः कलम्बः ।
तत्पार्श्व को ह्यपम सम्मुख एव बिम्ब
प्राग् याति सर्वस्व शशिनेऽविलम्बः । ६७ ।
क्रान्ति वृत्त से उल्टी (दक्षिणी) दिशा में पृष्ठ केन्द्र जो दक्षिणी ध्रुव से अयन
प्रोत वृत्त पर उतना (२३° ३
[१४२] [सिद्धान्त दर्पण]
और नत अंश द्वारा क्रमश आयन और अक्ष वलन करना चाहिये ।
अष्टादशांगुल गुण प्रमणेन वृत्त द्वन्द्वं
पुरन्दर जलेश दिशोर्विलिख्य
अन्याऽन्य लग्नमनतोन्नत भूप्रदेशे
तत्केन्द्रयोः प्रतिदिशंञ्च दिशैव बिन्दून । ७० ।
परिलेख लिखने के स्थान को समतल (जल के समान) कर उसमें एक वृत्त
(१८ अंगुल व्यासार्द्ध का) बना कर वृत्त परिधि में दिशा ज्ञान विधि से दो बिन्दु
देते हैं । (पूर्व और पश्चिम) इन बिंदुओं से १८ अंगुल व्यासार्द्ध का परस्पर सटे
हुए दो वृत्त खींचते हैं । इन दोनों वृत्तों के प्रति दिशा और कोण का विन्दु देते
हैं ।
मध्ये पुरः पर गतां निद धीत रेखां
प्राङ् मण्डलात् बहिरुदग् दिशि चांगुलान्ते
बिन्दून्तथा वरुण दिग्गत मण्डलस्य बाह्येऽ
ङ्गुलान्तरित दक्षिण भाग केऽन्यम् । ७१ ।
दोनों वृत्तों के केन्द्र से होकर पूर्वा पर (पूर्व पश्चिम) रेखा खींचते हैं । पूर्व
बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के उत्तर बिन्दु से और उत्तर एक अंगुल की दूरी पर
एक बिन्दु तथा पश्चिमी वृत्त के दक्षिण बिन्दु से १ अंगुल दक्षिण एक बिन्दु देते
हैं ।
बाह्यस्थ दक्षिण गविन्दुत एव पश्चात्
पुरश्चरम बिन्दुग कोटि युग्मम् ।
षष्ठांश संयुत रसाक्षि (१६।१०) मितांगुलेन
सूत्रेण चाप मथ पूर्वग बिम्बमध्ये । ७२ ।
ग्रह बिम्ब पश्चिम कपाल में रहने पर दक्षिण बिन्दु से १६।१० अंगुल व्यासार्द्ध
का पश्चिम वृत्त में तथा पूर्व कपाल में रहने पर पूर्व वृत्त के बाहर उत्तर बिन्दु से
१६।१० अंगुल का चाप पश्चिम वृत्त में खींचतेहैं ।
तद् वद् वहि र्विलिखतोत्तर बिन्दुतो ऽपि चापं लिखेत्परपुरोगतविन्दुलग्नम्
चापद्वयं भवति सम्मिलितं कपाल-द्वन्द्व स्थिता पम पथप्रतिम द्वयान्तः । ७३।
इन दोनों चापों से पूर्व और पश्चिम कपाल में क्रान्तिवृत्त का आकार बनेगा ।
प्रत्यग् दिशो हरिदिगन्त मथार्क (१२)
संख्यैश्चिह्नः क्रियादिनिलयान्कलयेन्निजांशैः
तत्रार्द्ध खण्डिततनुं शशिनं निवेश्य
तच्छृंगयुग्म परिलग्न गुणेन भूयः । ७४ ।
दोनों चापों के मिलन के जो क्रान्ति वृत्त बनता है । उसमें पश्चिम से पूर्व १२
चन्द्र ग्रहण वर्णनम् १४३
भाग कर मेष आदि राशियों का चिन्ह देंगे । क्रान्तिवृत्त से चन्द्र केन्द्र उस राशि
में रखकर अर्द्ध खण्डित चन्द्र बिम्ब बनाते हैं । इसके दोनों श्रृंगों को मिलाते हुए
एक रेखा खींचते हैं ।
बाह्यास्थ बिन्दु परिवेष्टन कं विदध्यादित्थं
निजापमपथा भिमुखः खगः स्यात्
प्राग् वृत्त केन्द्र यमदि गोत्तर रेखिकाया
पश्चाद् भ्रमं प्रवहजं विषुवद्दिनोत्थम् । ७५ ।
श्रृंगों को मिलाने वाली रेखा (चन्द्र व्यास) के बराबर व्यास से दोनों बाहरी
बिन्दुओं के केन्द्र से वृत्त खींचेंगे । इससे चन्द्रमा अपने क्रान्ति मार्ग पर चलता
हुआ लगेगा । पूर्व बिन्दु केन्द्र से खींचे गये वृत्त के केन्द्र से जाती दक्षिणोत्तर
रेखा पर (याम्योत्तर वृत्त पर )
व्यक्षोत्तरे वसुभुजानल (३२८) योजनस्थे देशेऽगच्छत धनः पथ सम्मुखीनम् ।
तस्मान्नतस्य पलजेवलनेन जीवा ग्राह्यानोत्थ वलनेऽपिन कोटि जीवा ।७६।
निरक्ष (विषुव रेखा) से ३२८ योजन उत्तर (२३° २७' अक्षांश - कर्क रेखा)
के स्थान पर क्रान्ति वृत्त की पूर्व से पश्चिम गति चाप आकार में ही (विषुव दिन
को) दिखाई देगी । यह वास्तव में सीधी रेखा (गोल पर) है जो समतल के चित्र
में वक्र दिखायी देती है अतः अक्ष या आयन वलन में ज्या या कोटिज्या की
जरूरत नहीं है ।
मध्यसूत्रादुदिग् दक्षिणान्तावधि ज्यात्मकं मानमेवात्र निश्चीयते ।
मध्यसूत्रादवः क्रान्तिमार्गान्तरं क्रान्ति जीवाक्ष जीवातु के न्द्रोद् भवेत् ।७७।
पूर्व पश्चिम वृत्तों की ज्या रूप रेखा, वृत्त की परिधि तथा दोनों ध्रुवों के बीच
सभी याम्योत्तर रेखाओं पर लम्ब है । अतः इस रेखा पर पूर्व से पश्चिम (मध्य सूत्र
से दूरी से क्रान्ति ज्या का मान होता है (यह अक्षांश वृत्त हुआ) अतः क्रान्ति ज्या
पूर्व पश्चिम रेखा (वृत्त केन्द्र से) की दूरी से निकाली जाती है । इसी प्रकार अक्षज्या
उत्तर दक्षिण रेखा (देशान्तर रेखा) पर की दूरी से निकाली जाती हैं ।
स्फुरति धरणी भाया बिम्ब बाह्ये समन्ता
द् वलय सदृश मस्या अञ्चलं पञ्च लिप्तम्
तद वतमस संज्ञयं तत्कुभाक दिक् (१०) कलाढ्या
मलिनयति सितांशो रन्तम ग्रस्तमूर्तेः । ७८ ।
(चन्द्र कक्षा में ) पृथ्वी की छाया के चारों ओर ५ कला अवतमस (कम
अन्धकार वाली छाया) होती है । इसको जोड़ने पर भूभा (पृथ्वी की छाया) का
व्यास १० कला अधिक होता है । १० कलायुक्त भूछाया चन्द्रमा को (ग्रहण के
अतिरिक्त) अन्य समय भी ढंकती है (इस समय ग्रहण नहीं दिखता है पर चन्द्रमा
का प्रकाश कुछ मन्द होगा)