सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्र ग्रहण वर्णनम् १२९
द्विसप्तति सहस्र (७२,०००) योजनामितार्क बिम्बायति
महापुरुष वाच्योत्यनुजगा वथर्वा श्रुतिः ।
मथैवदनुसारतो नयनगोचरक्षं ग्रह
प्रमाण परिधिग्रहादि क मकशमलं कल्प्यते । १२ ।
अथर्व वेद में ॐ (महापुरुष) का अर्थ निरूपण के प्रसंग में सूर्य बिम्ब का
व्यास (७२,०००) योजन कहा है । इस उक्ति के आधार पर मैने वेध और गणना
कर अन्य ग्रहों का बिम्बमान, ग्रहों की परिधि तथा ग्रहण में पृथ्वी और छाया
आदि का परिणाम शुद्ध रूप से निकाला है ।
विवस्वद् विष्कम्भद्विरस विधु (१६२) भागः समुदितो
विधोर्बिम्ब व्यासः कृत कृत चतुर्योजन (४४४) मित
भुवं प्राङ् निर्दिए (१६००) स च सवितुरर्धाम्बुधि (४५) लवो
लवो ऽन्तरीक्षे वक्ष्येऽहं श्रवण मथ भानो शशभृतः । १३ ।
चन्द्र व्यास = ७२,००० / १६२ = ४४४ से कुछ अधिक योजन
पृथ्वी व्यास = ७२,००० / ४५ = १६०० योजन
पृथ्वी का व्यास १६०० योजन प्राचीन ज्योतिषियों ने भी माना है ।
अब मैं इन व्यासों का आकाश में कलात्मक मान कहता हूँ ।
भू मध्यात् स्वदला वधि ग्रह पतेः कर्णारूय मार्गश्रुतु-
र्नन्द द्विद्विप्रपूर्ण तर्क धरणीभृद् (७६,०८,२९४) योजनो मध्यमः
शीताशोः शर पुष्कर क्षिति धर स्तम्बेरमा म्भोध्यो (४८,७०५)
मध्यस्य श्रुति योजनान्य पतयोः स्पष्टा भवेन्मन्दजा । १४ ।
पृथ्वी केन्द्र से सूर्य केन्द्र की मध्यम दूरी (७६,०८,२९४) योजन (सूर्य कर्ण),
तथा पृथ्वी केन्द्र से चन्द्र केन्द्र की मध्यम दूरी (४८,७०५) योजन (चन्द्र कर्ण)
है । इससे मन्द स्पष्ट कर्ण भीनिकाला जा सकता है ।
भास्वन्मण्डल योजनाभि (७२,०००) गुण मुपक्षाक्षि (२२१३) भक्तानते
दिग्व्यास कला (३२।३२) भवन्ति सवितुर्मध्य निशास्वामि नः ।
तान्येवर्तु (६) पञ्चकरिभि (८५) र्भक्तानि चन्मण्डल-
व्यास स्थायिकला (३१।२०) भवन्ति धरणी छाया कलाश्चन्द्र वत् । १५ ।
सूर्य का मध्य कोणीय बिम्ब = ७२,००० / २२१३ = ३२।३२।६ कला आदि
चन्द्रमा का मध्यम कोणीय बिम्ब = ४४४ x ६ / ८५ = ३१।२० कला
चन्द्र बिम्ब की कला की तरह भू छाया की बिम्ब कला भी निकलेगी (६।८५)