सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्द्र ग्रहण वर्णनम् १३१
स्फुट योजन कर्ण = $\frac{पलात्मक कर्ण x मध्य योजन कर्ण}{त्रिज्या}$
सूर्य बिम्ब (६५२२) योजन तथा चन्द्र बिम्ब (४८०) योजन है (भास्कराचार्य
के मत से, इस ग्रन्थ के अनुसार नहीं )
भास्करोक्त मृदु कर्ण साधनं यद्यपि स्फुटतमं तथाप्यहंम्
प्राहकोटिफलं तो भुजान्त बिम्बमध्य समतार्थ मेव हि । २१ ।
भास्करा चार्य मत से भी स्फुट कर्ण का साधन सूक्ष्म मान देता है । तथापि
मैंने कोटिफल से स्फुट कर्ण का साधन किया है । क्योंकि मन्दोच्च और स्फुट ग्रह
तीन राशि होने पर कोटि और मन्दस्फुट कर्ण समान होते हैं ।
मध्यमार्क शशि बिम्बजाः कलाः
सूक्ष्मतत् प्रथम भुक्ति ताड़िताः ।
मध्यभुक्ति (५९/८-७९०।३५) विहृताः स्वमण्डल
द्वन्द्व विस्तृतिरदः फलानिवा । २२ ।
मध्यम रवि और चन्द्र बिम्ब कला को उनकी दैनिक सूक्ष्मकला से गुणा कर
उनकी दैनिक मध्यम गति से भाग देने पर क्रमानुसार रवि और चन्द्र की स्पष्ट
बिम्बकला आयेगी ।
किं वा बिम्बा स्त्रिगुणा (३४३८) गुणिता योजनै स्वैर्भिंनानां
स्वश्रुत्याप्ताः स्फुटतरकला भानु भू भा विधूताम्
यद्वा भास्वद् गतिफल ख रुद्रांश युक्तो (११०) नितास्तु
मध्याः (३२।३२) स्पष्टाः स्युरिन कलिकाः कर्कि नक्रादि केन्द्रे । २३ ।
अथवा योजनात्मक बिम्ब व्यास की त्रिज्या से गुणा कर स्पष्ट कर्ण योजना
से भाग देने पर रवि, चन्द्र या भू भा (पृथ्वी की छाया) बिम्ब व्यास का कलात्मक
स्फुट मान आयेगा ।
सूर्य का कलात्मक स्फुट बिम्ब व्यास
= $\frac{मध्य बिम्बकलाव्यास + सूर्य गतिफल}{११०}$
मध्यकेन्द्र २ य तथा ३ य पाद में रहने पर योग (गतिफल का) या प्रथम
और ४र्थ पाद में रहने पर घटाव होगा ।
मध्यं मानं (३१।२०) गद्विफलं कला पञ्चविंशां शकस्य
त्यागाद् योगात् स्फुट विधु मिटर्नक्र कर्क्यादिके स्यात्
रुद्रा (११) घ्नीवा स्फुट रवि गतिः खाक्षि भक्तार्कमान
सप्तोनेन्दु स्फुट गतिकला स्तत्व (२५) भक्ता स्वमानम् । २४ ।