सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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से गुणा कर) क्यों कि चन्द्र ग्रहण के समय उसकी स्थिति चन्द्र गोल पर होती
है ।
मन्द कोटि फल युक्त दुनिता
नक्र कर्कि मुखमन्द केन्द्र के ।
त्रिज्यका भवति संस्कृता तया
वर्जिता द्विगुणित त्रिमौर्विका (६८७६) । १६ ।
(सूर्य या चन्द्र का ) मन्द केन्द्र मकर आदि ६ राशि में रहने पर त्रिज्या में
मन्द कोटिफल जोड़ेंगे । तथा कर्क आदि ६ राशि में रहने पर घटायेंगे । प्राप्त फल
को त्रिज्या को दो गुणा (६८७६) से घटा कर-
शेष केण बिहता त्रिभज्यका
वर्गः (११८,१९,८४४) फल कलात्मकः स्फुटः
मन्दकर्ण इन चन्द्रमाः क्षिते-
र्मध्यतोऽन्य स सदा रवे र्भवेत् । १७ ।
शेष से त्रिज्या के वर्ग में भाग देंगे । फल लिप्तादि रवि और चन्द्र का स्फुट
मन्द कर्ण होगा । इस विधि से यदि मंगल आदि ग्रहों का मन्द कर्ण निकाला
जाय तो वह सूर्य केन्द्र से उन ग्रहों की केन्द्रिक दूरी होगी ।
मन्द कर्ण हत योजना श्रुतिस्त्रि ज्या किल हृता भवेद् स्फुटः
मध्य कर्णहत बिम्ब लिप्तिका स्पष्ट कर्ण विहृताः परिस्फुटाः । १८ ।
कलात्मक स्फुट मन्द कर्ण को मध्य योजन कर्ण से गुणा कर त्रिज्या से भाग
देने पर वह योजनात्मक स्फुट मन्दकर्ण होगा । मध्यम बिम्ब कला को मध्य योजन
से गुणा कर स्फुट योजन से भाग देने पर स्फुट बिम्ब कला होगी ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मन्द श्रुतिर्द्राक् श्रुतिवत् प्रसाध्या
तया त्रिभज्या द्विगुणा विहीना (६८७६) त्रिज्याकृतिः
(१,१८ ,१९,८४४) शेष हृतास्फुटास्या लिप्ता श्रुतिस्तिग्म रुचे र्विधाश्च । १९ ।
(सिद्धान्त शिरोमणि से उद् धृत) शीघ्र कर्ण की तरह मन्द कर्ण निकालें ।
त्रिज्या के २ गुणा से उसे घटाकर शेष से त्रिज्या के वर्ग में भाग दें ।
कलात्मक फल चन्द्र या सूर्य का मन्द कर्ण होगा । यह भूकेन्द्र से सूर्य या
चन्द्र की दूरी का मान है (कला में) ।
लिप्ता श्रुतिघ्न स्त्रिगुणेन भक्तः
स्पष्टो भवेद् योजन कर्णएवम्
बिम्ब रवे द्विं द्विशरर्तु (६५२२) संख्या
नीन्दोः ख नागाम्बुधि (४८०) योजनानि । इति । २० ।