सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः प्रकाशः
चन्द्र ग्रहण वर्णनम्
स्मार्त्ताः सांहितिकाः पुराणनिपुणा स्तन्तेक्षका वैदिकाः
स्नानाङ्गा जाप मोह दान कृतिनां यस्मिन्ननन्तं फलम् ।
प्रा चुर्येश्च महाचमत्कृति करो लोकस्य तिथ्यादिके
विश्वासावह मिन्दु तिग्म महसो र्वक्ष्याम्यहं तं ग्रहम् । १ ।
ग्रहण के समय स्नान, जप होम और दानादि से अनन्त फल होता है। ऐसा
वैदिक तान्त्रिक, व पौराणिक, संहिताकार तथा स्मार्त लोगों का मत है। ग्रहण
की शुद्धता के कारण लोग चमत्कृत होते हैं, तथा तिथियों पर विश्वास करते
हैं। अतः इसके महत्व के कारण अब मैं ग्रहण (चन्द्र और सूर्य) का वर्णन करता
हूँ।
पक्षान्त साधित विपात विधोर्भुजांशा
विश्वा (१३) ल्पका यदितदा ग्रहसम्भवोऽस्य
तस्माद् विधौ शिखितमोन्यतरान्तिकस्थे
चिन्त्यो ग्रहेऽग्निकु (१३) लवा वधि पूर्णिमान्ते । २ ।
पूर्णिमान्त में चन्द्र राहु या चन्द्र केतु का साधन कर चन्द्र से राहु या चन्द्र से
केतु का अन्तर करें। इस चन्द्र (अन्तर) का भुजांश १३ से कम होने पर चन्द्र ग्रहण
की सम्भावना रहती है। अर्थात् पूर्णिमान्त चन्द्र का राहु या केतु से १३ अंश से
कम अन्तर होने पर ही चन्द्रग्रहण हो सकता है।
सूर्य ग्रहे धृति (१८) लवान्त समान्त जेऽङ्गे
ग्रस्तो मतोऽन्तिक वशात् शिखिनाच गुणिते
प्रत्यक् पुरोनत गुणांश (३) युतो न सूक्ष्म ।
दर्शान्त कालिक सुधाकर दिक् शरस्य । ३ ।
इसी प्रकार अमान्त (अमावस्या के अन्त ) में चन्द्र और चन्द्रपात का साधन
कर चन्द्रमा से पात (राहु या केतु) का अन्तर १८ अंश से कम होने पर सूर्य ग्रहण
की सम्भावना रहती है।
(पृथ्वी केन्द्र से) अमान्त निकालते हैं। इस अमान्त काल के चन्द्रमा की
पश्चिम नत नाड़ी का १/३ अमान्त काल से घटाने पर इस संस्कृत दर्शान्त काल में
पुनः स्फुट चन्द्र का साधन करते हैं।
तत्काल वित्रिभ तनूनत बाहुजीवा
षष्ठ्यंश कस्य च युते र्वियुते च शेषात्
दिक् साम्य भेद धनुषः क्रमशः स्फुटेषौ
न्युने कृताग्नित (३४) इन ग्रह सम्भवः स्यात् । ४ ।