श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
महावीरी व्याख्या चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे
कारण आगन्तुकको बहुत क्षुब्ध किया करते हैं। इस विषयकी स्पष्टताके
लिए भागवतके तृतीय स्कन्धका जय-विजय-उपाख्यान द्रष्टव्य है।
सनकादिक एक बार भगवान् मधुसूदनके दर्शनार्थ श्रीवैकुण्ठ धाम पधारे।
छः द्वारोंको सहजतया लाँघकर वे सप्तम द्वारको भी लाँघनेकी चेष्टा कर रहे
थे कि उनका यह स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार भगवान्के प्रिय द्वारपाल जय-
विजयको नहीं भाया। सन्तोंका व्यक्तित्व चमत्कार-शून्य तथा नमस्कार-
प्रधान हुआ करता है। उनकी रहनीमें संसारका दिखावा तथा आडम्बर नहीं
होता। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमारको यह आशा भी न थी कि
उन जैसे विधि-निषेधसे बहिर्भूत परम अन्तरङ्गतम भगवत्प्रेमी महात्माओंके
साथ भी द्वारपालसे आदेश-रूप निरर्थक सांसारिक औपचारिकताकी अपेक्षा
की जाएगी। जय-विजयने उन पञ्चवर्षीय दिगम्बर मुनिकुमारोंको बिना
अनुमतिके ही भगवन्मन्दिरमें प्रवेश करते देख ईषत् क्रोधजडीभूत होकर
परिहासपूर्वक अपने बेंतका प्रहार कर नीचे गिरा दिया। जय-विजयका
यह स्वभाव भगवान् तथा भगवान्के भक्त दोनोंके लिए प्रतिकूल था।
भागवतकारने वेत्रेण चास्खलयताम्का प्रयोग किया है। स्खलनका अर्थ
होता है गिरना। अस्खलयताम् प्रेरणार्थक णिजन्त रूप है, जिसका अर्थ
होता है 'उन दोनोंने गिरा दिया'। यथा—
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्
वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।
वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ
तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥
—भा.पु. ३-१५-३०
इस उद्दण्डताकी पराकाष्ठासे वीतराग महर्षियोंका भी हृदयसागर क्रोधकी
लहरसे कुछ क्षुब्ध-सा हो गया। तथा वे बोल पड़े, “तुम सर्वान्तर्यामी परम
कृपालु प्रभु भगवान् विष्णुके पार्षद होनेके योग्य नहीं हो। आज भी तुम्हारा
५५
चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
हृदय महत्त्वाकाङ्क्षाकी आगसे जल रहा है। अतः इस अपराधका उचित
दण्ड ही तुम्हारे लिए उपयुक्त है। तुम काम, क्रोध, लोभ इन तीनोंसे पीड़ित
हो। इसलिए तीन पापिष्ठ लोकोंमें जाओ।” अर्थात् प्रथम जन्ममें क्रोध-प्रधान
दैत्य बनो (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष), द्वितीय जन्ममें काम-प्रधान राक्षस
बनो (रावण और कुम्भकर्ण), एवं तृतीय जन्ममें लोभ-प्रधान दानव-रूप
मानवताहीन मानव (शिशुपाल और दन्तवक्र) बनो। यहाँ तीन जन्म पर्यन्त
पापिष्ठ लोकोंमें जानेका शाप भी साभिप्राय था। सनकादि महर्षियोंने जय-
विजयको तीन जन्मके लिए इस कारण शाप दिया कि जय-विजयने उन्हें
तीन-तीन बेंत लगाये थे। यही त्रय इमे शब्दके प्रयोगका कारण प्रतीत होता
है, यथा—
तद्धाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः
कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम्।
लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या
पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र॥
—भा.पु. ३-१५-३४
गोस्वामीजी भी इस प्रसंगकी चर्चा मानसजीमें बड़े ही रोचक ढंगसे करते
हैं—
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ।
जय अरु विजय जान सब कोऊ॥
बिप्र-शाप तें दूनउ भाई।
तामस असुर-देह तिन पाई॥
—रा.च.मा. १-१२२-४,५
मुक्त न भये हते भगवाना।
तीनि जनम द्विज-बचन प्रमाना॥
— रा.च.मा. १-१२३-१
५६
अन्तिम भाग: चौपाई ३१ से ४०, समापन दोहा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक
महावीरी व्याख्या चौ. २१: राम-दुआरे तुम रखवारे
अर्थात् अन्य द्वारपाल अप्रत्याशित रूपमें स्वामीके यहाँ जानेवालोंको
बेंतके प्रहारसे निरस्त करते हैं, किन्तु श्रीहनुमान्जी महाराज रावणके द्वारा
कृत चरण-प्रहारसे पीड़ित विभीषणको भी भगवान्के श्रीचरणारविन्दका
शरणागत बना देते हैं। श्रीराघवकी शरणमें समागत विभीषणके प्रति जब
सुग्रीव नाना प्रकारके आक्षेप-प्रत्याक्षेप करने लगे, तब आञ्जनेयको बहुत
दुःख हुआ, पर श्रीराघवने मम पन शरनागत-भयहारी (रा.च.मा. ५-
४३-८) कहकर विभीषणको स्वीकारनेका निश्चय किया। तब हनुमान्जी
अत्यन्त प्रसन्न हुए, यथा—
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना।
शरनागत-वत्सल भगवाना॥
—रा.च.मा. ५-४३-९
इस प्रकार अन्य द्वारपालकी अपेक्षा आगन्तुकको प्रभुके चरणोंमें जोड़नेकी
श्रीहनुमान्जीमें विलक्षण क्षमता है।
५७
चौ. २२: सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥ २२ ॥
शब्दार्थ—शरना ▸ शरण में। लहहिं ▸ प्राप्त करते हैं।
अर्थ—हे हनुमान्जी महाराज! आपकी शरणमें आकर साधक जन
समस्त सुख प्राप्त कर लेते हैं। आप रक्षक हैं, अतः अब किसीका डर नहीं
है।
व्याख्या—जय-विजयकी भाँति आप किसी आगन्तुकको भगवान्के
दर्शनसे वञ्चित नहीं करते, अपितु उनसे पूछे बिना भी अपनी कृपालुतासे
आप श्रीराघवका दर्शन करा देते हैं। अब हम निर्भीक हो गए हैं। यथा—
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह
लोकपाल-पालन को फिर थिर थल भो।
—ह.बा. ६
५८
महावीरी व्याख्या चौ. २३: आपन तेज सम्हारो आपे
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
आपन तेज सम्हारो आपे।
तीनों लोक हाँक ते काँपे॥ २३ ॥
शब्दार्थ—सम्हारो ▸ स्मरण करें।
अर्थ—हे प्रभो! जब आप अपने तेजको स्मरण कर लेते हैं, तब आपकी
हाँकसे ही त्रैलोक्य कम्पित हो उठता है।
व्याख्या—सम्हारो शब्दका अर्थ है स्मरण। यथा—दीन दयाल बिरद
संभारी (रा.च.मा. ५-२७-४)। क्योंकि ऋषियोंके शापसे इन्हें अपना तेज
विस्मृत रहता है, इसलिए जाम्बवान्को स्मरण दिलाना पड़ा। यथा—
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥
—रा.च.मा. ४-३०-५
अतः आज भी भक्त लोग विरुदावली गाकर हनुमान्जीके तेजका उद्बोधन
करते हैं।
तीनों लोक हाँक ते काँपे—इनकी हाँकका वर्णन कवितावलीके
युद्धकाण्डमें इस प्रकार है—
मत्तभट-मुकुट-दशकंध-साहस-सइल-
सृंग-बिद्दरनि जनु बज्र टाँकी।
दसन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज कमठ
शेष संकुचित संकित पिनाकी।
५९
चौ. २३: आपन तेज सम्हारो आपे महावीरी व्याख्या
चलित महि मेरु उच्छलित सागर सकल
बिकल बिधि बधिर दिसि बिदिसि झाँकी।
रजनिचर-घरनि घर गर्भ-अर्भक स्त्रवत
सुनत हनुमान की हाँक बाँकी॥
—क. ६-४४
६०
महावीरी व्याख्या चौ. २४: भूत पिशाच निकट नहिं आवै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
भूत पिशाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥
शब्दार्थ— भूत पिशाच ▸ अकाल मृत्युको प्राप्त उग्र आत्मा अथवा
निम्न देवयोनि।
अर्थ—जब भावुक भक्त महावीर नाम सुना-सुना कर कीर्तन करते हैं,
उस समय भूत पिशाच उनके निकट नहीं आते।
व्याख्या—अब महावीर नाम विशेषकी महत्ता कहते हैं। यह भूत-
पिशाचोंका त्रासक है। यथा—पूतना पिशाची जातुधानी जातुधान वाम
रामदूत की रजाइ माथे मान लेत हैं (ह.बा. ३२)।
६१
चौ. २५: नासै रोग हरै सब पीरा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ २५ ॥
शब्दार्थ—निरंतर ▸ नित्य, सदा।
अर्थ—सदैव भक्तोंके द्वारा जपके विषय-भूत होनेपर वीर हनुमान्जी
रोगोंको नष्ट कर देते हैं एवं समस्त पीड़ाओंको हर लेते हैं।
व्याख्या—रोग यहाँ शारीरिक रोगोंका वाचक है। पीरा शब्दका
कामादि आध्यात्मिक पीड़ाओंसे तात्पर्य है। भाव यह है कि गुरुदीक्षालब्ध
श्रीहनुमन्मन्त्रका जप करनेसे साधकके शरीरके रोग तथा आध्यात्मिक ताप
नष्ट हो जाते हैं।
६२
महावीरी व्याख्या चौ. २६: संकट तें हनुमान छुड़ावै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥
शब्दार्थ—संकट ▸ विपत्ति।
अर्थ—जो मन, कर्म, और वचनसे एकाग्र होकर हनुमान्जीको ध्यानमें
ले आते हैं, उन्हें श्रीहनुमान्जी सभी संकटोंसे मुक्त कर देते हैं।
व्याख्या—इनका नाम ही संकटमोचन है। यथा—को नहिं जानत है
जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो (सं.ह.अ. १,२,३,४,५,६,७,८)
और गुण गनत नमत सुमिरत जपत समन सकल संकट बिकट (ह.बा.
१)।
६३
चौ. २७: सब-पर राम राय-सिरताजा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
सब-पर राम राय-सिरताजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥
शब्दार्थ—सब-पर ▸ सर्वोपरि। सब-पर शब्द सर्वपरका तद्भव है। यहाँ
सर्वत्र लवराम् (प्रा.प्र. ३-३) इस प्राकृत व्याकरण के सूत्रसे रका लोप
हुआ।
अर्थ—श्रीराम परब्रह्म और राजाओंके मुकुटमणि हैं। उनके भी संपूर्ण
कार्योंको आपने ही संपन्न किया।
व्याख्या—श्रीरामजी सर्वोपरि हैं। यथा—
शंभु बिरंचि बिष्णु भगवाना।
उपजहिं जासु अंश ते नाना॥
—रा.च.मा. १-१४४-६
अर्थात् श्रीराम राजाधिराज हैं फिर भी उनके संपूर्ण कार्योंको आपने ही संपन्न
किया। भाव यह है कि सर्वोपरि परब्रह्म राजाधिराज भगवान् श्रीरामको भी
जिनकी निरन्तर अपेक्षा रहती है, तो हम जैसे जीवोंकी उनके बिना कैसी
स्थिति होगी? यथा—
संकट-समाज असमंजस भो रामराज
काज जुग पूगनि को करतल पल भो।
—ह.बा. ६
६४
महावीरी व्याख्या चौ. २८: और मनोरथ जो कोइ लावै
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और मनोरथ जो कोइ लावै।
तासु अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥
शब्दार्थ—मनोरथ ▸ अभिलाषा। अमित ▸ असीम।
अर्थ—हे प्रभो! और जो आपके समक्ष कोई भी मनोरथ लेकर आता
है, उस मनोरथका अपने इसी जीवनमें असीम फल पाता है।
व्याख्या—सोइ अमित जीवन फल पावै यह पाठ माननेपर "वह
व्यक्ति इसी जीवनमें उस इच्छाका असीम फल पा लेता है" अर्थ होगा।
भाव यह है कि मानवकी इच्छाएँ प्रायः पूर्ण नहीं होतीं, यदि होती भी
हैं तो शरीरान्तके पश्चात्। परन्तु हनुमान्जीके समक्ष इसी जीवनमें समस्त
इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यथा—नाम कलि-कामतरु केसरी-कुमार को
(ह.बा. ९)।
६५
चौ. २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
चारिउ जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत-उजियारा॥ २९ ॥
शब्दार्थ—उजियारा ▸ उजाला।
अर्थ—हे प्रभो! आपका प्रताप कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, एवं
कलियुग—इन चारों युगोंमें प्रसिद्ध है। इससे जगत्में उजाला छाया हुआ
है।
व्याख्या—श्रीराम सार्वकालिक हैं। अतः प्राकट्यके पहले स्वायम्भुव
मन्वन्तरके कृतयुगमें मनु-शतरूपाको द्विभुज रूपमें ही दर्शन दिया। यथा—
भृकुटि बिलास जासु जग होई।
राम बाम दिशि सीता सोई॥
—रा.च.मा. १-१४८-४
उसी प्रकार इनका नाम भी चारों युगोंमें प्रसिद्ध है, यथा—चहुँ जुग चहुँ
श्रुति नाम प्रभाऊ (रा.च.मा.१-२२-८)। अतः कृतयुगमें प्रह्लाद भी रामनाम
जपते थे। यथा—राम कहाँ सब ठौर हैं खम्भ में हाँ सुनि हाँक नृकेहरि
जागे (क. ७-१२८)। प्रह्लाद दैत्य-बालकोंसे स्वयं कहते हैं—
रामनामजपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना॥
तद्वत् श्रीरामजीके परिकर श्रीहनुमान्जी भी चारों युगोंमें रहते हैं। वैवस्वत
मन्वन्तरके २४वें त्रेतायुगके अन्तमें प्रभुका प्राकट्य हुआ। पश्चात् प्रभुने
आञ्जनेयको तब तकके लिए अमरत्व प्रदान किया, जब तक श्रीराम-
कथाका प्रवाह धराधामपर अक्षुण्ण रहे। अतः उस समयसे अद्यावधि
६६
महावीरी व्याख्या चौ. २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा
श्रीराम-कथाके साथ आञ्जनेयका स्वस्थ रहना सुस्पष्ट है। यह २८वाँ
कलियुग है। प्रभुके प्राकट्यसे आज तक चार चतुर्युगियाँ बीत ही गईं।
अतः हनुमान्जीके अमरत्वमें किमपि संदेह नहीं है।
कृते साकेतलोके स्यात्रेतायामवधे तथा।
द्वापरे पार्थकेतौ तु कलौ राज्यं करिष्यति ॥
जगत-उजियारा—प्रतापकी उपमा सूर्यसे दी जाती है। यथा—प्रभु-
प्रताप-रबि छबिहिं न हरिही (रा.च.मा. २-२०९-३)। इसलिए इससे
जगत्में उजाला कहना उचित है।
६७
चौ. ३०: साधु संत के तुम रखवारे महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर-निकंदन राम-दुलारे ॥ ३० ॥
शब्दार्थ—असुर-निकंदन ▸ राक्षसोंको मारने वाले।
अर्थ—हे राक्षसोंको नष्ट करने वाले श्रीरामजीके दुलारे श्रीहनुमान्जी
महाराज! आप साधु तथा सन्तोंके रक्षक हैं।
व्याख्या—यहाँ साधु शब्द साधनारत भक्तोंकी ओर संकेत करता है
एवं संत शब्द साधनसंपन्न भक्तको सूचित करता है। दोनोंको हनुमान्जीकी
अपेक्षा है। साधु सुग्रीव तथा सन्त विभीषण दोनों हनुमान्जीसे रक्षित हैं।
यथा—दुर्जन को काल सो कराल पाल सज्जन को (ह.बा. १०)।
राम-दुलारे—हनुमान्जी राघवजीके दुलारे हैं। यथा—राम को दुलारो
दास (ह.बा. ९)।
६८
महावीरी व्याख्या चौ. ३१: अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥
शब्दार्थ—दाता ▸ देने वाले।
अर्थ—आप अष्ट सिद्धियों एवं नव निधियोंके देने वाले हैं। जनकनन्दिनी
श्रीसीता माताने आपको ऐसा वरदान दिया है।
व्याख्या—अशोकवाटिकामें जब श्रीआञ्जनेयके वाक्चातुर्यसे माँ मैथिली
भली-भाँति संतुष्ट हो गईं, तब इन्होंने आञ्जनेयको आशीर्वाद-पुष्पोंसे विभूषित
कर दिया। यहाँ मायाकी सीता अविद्या अथवा विद्या रूपमें नहीं हैं, अपितु
श्रीराघवकी लीलाशक्ति ही माया सीताके रूपमें वर्तमान हैं, अन्यथा मायाके
मिथ्यात्वसे आञ्जनेयको दिए हुए आशीर्वाद भी प्रामाणिक न हो पाएँगे। इस
प्रसंगका संकेत भावी किसी ग्रन्थमें किया जाएगा। अथ प्रकृतमनुसरामः।
यथा—
आशिष दीन्ह राम प्रिय जाना।
होहु तात बल शील निधाना॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहु बहुत रघुनायक छोहू॥
करिहिं कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
—रा.च.मा. ५-१७-२,३,४
सिद्धियाँ आठ हैं—
६९
चौ. ३१: अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता महावीर व्याख्या
अणिमा गरिमा चैव महिमा लघिमा तथा।
प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः ॥
—अ.को. १-१-३५क
अर्थात् अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, और
वशित्व आठ सिद्धियाँ हैं। निधियाँ नौ हैं—महापद्म, पद्म, शङ्ख, मकर,
कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील, और खर्व। यथा—
महापद्मश्च पद्मश्च शङ्खो मकरकच्छपौ।
मुकुन्दः कुन्दनीलौ च खर्वश्च निधयो नव ॥
— अ.को. १-१-७१क
७०
महावीरी व्याख्या चौ. ३२: राम-रसायन तुम्हरे पासा
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
राम-रसायन तुम्हरे पासा।
सादर हौ रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥
शब्दार्थ—राम-रसायन ▸ श्रीरामरसका भाण्डागार (भण्डार)।
अर्थ—हे पवननन्दन! रामप्रेमरसका भण्डार आपके ही पास है एवं
आप निरन्तर आदरपूर्वक रघुपति श्रीरामभद्रजूके दास्य भावमें रहते हैं।
यद्वा, हे आदरणीय रघुपति श्रीरामभद्रजूके दास हनुमान्जी! आपके पास
रामप्रेमरसका भवन अर्थात् राघवचरित्र निरन्तर निवास करता है।
व्याख्या—श्रीहनुमान्जी रामभक्ति-रसके आचार्य ही हैं। अत एव इन्होंने
श्रीराघवसे अनपायनी भक्ति माँगी—
नाथ भगति तव अति सुखदायिनि।
देहु कृपा करि सो अनपायनि ॥
—रा.च.मा. ५-३४-३
इन्हें गोस्वामीजीने रसाइनी (संस्कृत: रसायनी) शब्दसे संबोधित किया है।
यथा—राम की रजाइ तें रसाइनी समीरसूनू (क. ५-२५)।
७१
चौ. ३३: तुम्हरे भजन राम को पावै महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥
शब्दार्थ— भजन ▸ सेवा, शरणागति।
अर्थ— हे कपिकुल-तिलक! आपके भजनसे साधक श्रीरामभद्रजूको पा
जाता है और प्रभुको पाकर वह अनेक जन्मोंके दुःखोंको भूल जाता है।
व्याख्या— आपका भजन भगवत्प्राप्तिमें साधन है क्योंकि भगवद्भक्ति
दर्शनके लिए ज्ञान और वैराग्य इन दो नेत्रोंकी आवश्यकता होती है।
यथा—ज्ञान बिराग नयन उरगारी (रा.च.मा. ७-१२०-१४)। और आप
स्वयं ज्ञान-वैराग्य-रूप हैं। यथा—ज्ञानिनामग्रगण्यम् (रा.च.मा. ५-
मङ्गलाचरण श्लोक ३) और बिरागी पवनकुमार सो (क. ५-१)। अतः
आञ्जनेयके भजनसे निश्चित श्रीरामरूपकी प्राप्ति हो जाती है। राघव सुखसिन्धु
हैं, अतः उन्हें प्राप्त कर व्यक्ति अनेक जन्मोंके दुःखोंको उन्हीं आनन्द-
सिन्धुकी एक लहरमें विलीन कर देता है, जैसे जटायु—निरखि राम
छबि-धाम मुख बिगत भई सब पीर (रा.च.मा. ३-३२)।
७२
महावीरी व्याख्या चौ. ३४: अंत-काल रघुबर-पुर जाई
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
अंत-काल रघुबर-पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भगत कहाई॥ ३४ ॥
शब्दार्थ—रघुबर-पुर ▸ श्रीसाकेतलोक।
अर्थ—हे राम-दूत! आपके भजनके प्रतापसे वह साधक इसी भौतिक
शरीरसे भगवान् श्रीरामभद्रका दर्शन करके शरीरावसान (अन्तकाल)के
समय श्रीसाकेतलोक जाकर पुनः मर्त्यलोकमें जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ
श्रीहरिका भक्त ही कहलाता है। अर्थात् पुनर्जन्ममें भी उसके भक्तिके संस्कार
धूमिल नहीं होते।
व्याख्या—इसी शरीरसे साधक इसी लोकमें इन्हीं चक्षुओंसे श्रीरामजूके
कोटि-कोटि-कन्दर्प-दर्प-दलन सगुण साकार नीलनीरधरश्याम लोकाभिराम
श्रीविग्रहका दर्शन करता है और अन्तकालमें वह मोक्ष नहीं चाहता।
क्योंकि—सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं (रा.च.मा. ६-११२-७)। फिर
प्रारब्धका क्षय करके शरीरको विसर्जित कर अपनी इच्छानुसार
श्रीसाकेतलोकमें विश्राम कर पुनः भगवल्लीलारसकी अनुभूतिकी लालसासे
भगवान् श्रीराघवके अवतार-कालमें संसारमें आकर किसी भाग्यशालिनी
माँकी कोखको पवित्र कर रघुनाथजीकी प्रतीक्षामें निरत रहता है। यथा—
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोक्ष सुख त्यागि॥
—रा.च.मा. ४-२६
७३
चौ. ३५: और देवता चित्त न धरई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ ३५ ॥
शब्दार्थ—सर्ब सुख ▸ लौकिक एवं पारलौकिक अनुकूलता।
अर्थ—जो भक्त किसी अन्य देवताको अपने चित्तमें न धारण कर केवल
हनुमान्जीकी सेवा करता है, वह समस्त सुखोंको प्राप्त कर लेता है। यद्वा, जो
अन्य किसी देवताको अपने चित्तमें नहीं धारण करता, वह भी हनुमान्जीकी
सेवा करके समस्त सुखोंकी प्राप्ति कर लेता है।
व्याख्या—देवता-विमुखको नास्तिक कहा जाता है, तथा उसे सुखकी
प्राप्ति नहीं होती क्योंकि इष्ट भोगोंको देने वाले देवता ही हैं। यथा—इष्टान्
भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः (भ.गी. ३-१२)। पर वह
भी हनुमत्कृपासे सर्वसुखका अधिकारी हो सकता है क्योंकि समस्त देव
उन्हींकी कृपाकी अपेक्षा रखते हैं। यथा—देवी देव दानव दयावने ह्वै
जोरैं हाथ बापुरे बराक कहा और राजा राँक को (ह.बा. १२)। अथवा,
अनन्य निष्ठासे सेवा करनेपर हनुमान्जी समस्त सुख प्रदान करते हैं।
७४