श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौ. ३५: और देवता चित्त न धरई महावीरी व्याख्या
॥ श्रीराम ॥
मूल (चौपाई)—
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥ ३५ ॥
शब्दार्थ—सर्ब सुख ▸ लौकिक एवं पारलौकिक अनुकूलता।
अर्थ—जो भक्त किसी अन्य देवताको अपने चित्तमें न धारण कर केवल
हनुमान्जीकी सेवा करता है, वह समस्त सुखोंको प्राप्त कर लेता है। यद्वा, जो
अन्य किसी देवताको अपने चित्तमें नहीं धारण करता, वह भी हनुमान्जीकी
सेवा करके समस्त सुखोंकी प्राप्ति कर लेता है।
व्याख्या—देवता-विमुखको नास्तिक कहा जाता है, तथा उसे सुखकी
प्राप्ति नहीं होती क्योंकि इष्ट भोगोंको देने वाले देवता ही हैं। यथा—इष्टान्
भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः (भ.गी. ३-१२)। पर वह
भी हनुमत्कृपासे सर्वसुखका अधिकारी हो सकता है क्योंकि समस्त देव
उन्हींकी कृपाकी अपेक्षा रखते हैं। यथा—देवी देव दानव दयावने ह्वै
जोरैं हाथ बापुरे बराक कहा और राजा राँक को (ह.बा. १२)। अथवा,
अनन्य निष्ठासे सेवा करनेपर हनुमान्जी समस्त सुख प्रदान करते हैं।
७४